लबों पर गिले यूं भी आते रहे हैं

गजलः १०
लबों पर गिले यूं भी आते रहे हैं
तुम्हारी जफ़ाओं को गाते रहे हैं.

कभी छाँव में भी बसेरा किया था
कभी धूप में हम नहाते रहे हैं.

रहा आशियां दिल का वीरान लेकिन
उम्मीदों की महफ़िल सजाते रहे हैं.

लिये आँख में कुछ उदासी के साये
तेरे ग़म में पलकें जलाते रहे हैं.

ज़माने से ‘देवी’ न हमको मिला कुछ
ज़माने से फिर भी निभाते रहे हैं.
चराग़े-दिल/ ३६

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4 टिप्पणियाँ

  1. सितम्बर 16, 2007 at 2:13 पूर्वाह्न

    बहुत जबरदस्त,,,,गा कर देखा…समा जम गया..वाह वाह!!

  2. सितम्बर 16, 2007 at 5:49 अपराह्न

    sundar rachna

    sadar
    hem

  3. सितम्बर 16, 2007 at 10:18 अपराह्न

    बहुत खूब देवी जी.

  4. सितम्बर 18, 2007 at 3:07 पूर्वाह्न

    Sameer ji
    kaash aapki awwaz yahan tak pahunch paati.
    Canada se New jersey tak.
    thanks for tuning it.

    wishes
    Devi


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