मोती कभी पलकों से गिराए नहीं हमन

गजलः १४
सपने कभी आंखों मे बसाए नहीं हमने
बेकार के ये नाज़ उठाए नहीं हमने.

दौलत को तेरे दर्द की रक्खा सहेज कर
मोती कभी पलकों से गिराए नहीं हमने.

आई जो तेरी याद तो लिखने लगी गज़ल
रो रो के गीत औरों को सुनाए नहीं हमने.

है सूखा पड़ा आज तो, कल आयेगा सैलाब
ख़ेमे किसी भी जगह लगाए नहीं हमने.

इतने फ़रेब खाए हैं ‘देवी’ बहार में
जूड़े में गुलाब अब के लगाये नहीं हमने.

चराग़े-दिल/ ४०

बाकी न तेरी याद की परछाइयां रहीं

गजलः १३
बाकी न तेरी याद की परछाइयां रहीं
बस मेरी ज़िंदगी में ये तन्हाइयां रहीं.

डोली तो मेरे ख़्वाब की उठ्ठी नहीं, मगर
यादों में गूंजती हुई शहनाइयां रहीं.

बचपन तो छोड़ आए थे, लेकिन हमारे साथ
ता- उम्र खेलती हुई अमराइयां रहीं.

चाहत, ख़ुलूस, प्यार के रिश्ते बदल गए
जज़बात में न आज वो गहराइयां रहीं.

अच्छे थे जो भी लोग वो बाक़ी नहीं रहे
‘देवी’ जहां में अब कहां अच्छाइयां रहीं.
चराग़े-दिल/ ३९

रब्बा, मेरे नसीब में ऐसी बहार दे.

गजलः१२
अपने जवान हुस्न का सदक़ा उतार दे
दर्शन दे एक बार मुकद्दर संवार दे.

जो खिल उठें गुलाब मेरे दिल के बाग़ में
रब्बा, मेरे नसीब में ऐसी बहार दे.

अच्छा तो मेरे क़त्ल में मेरा ही हाथ था
आ सारी तुहमतें तू मेरे सर पे मार दे.

इक जामे-‍बेख़ुदी की है दरकार आजकल
हर ग़म को भूल जाऊँ मैं, ऐसा ख़ुमार दे.

मोहलत ज़रा सी दे मुझे लौटूं अतीत में
दो चार पल के वास्ते दुनियां संवार दे.

चराग़े-दिल/ ३८

तारों का नूर लेकर ये रात ढल रही ह

गजलः 11

तारों का नूर लेकर ये रात ढल रही है
दम तोड़ती हुई इक शम्अ जल रही है.

नींदों की ख्वाहिशों में रातें गुज़ारती हूं
सपनों की आस अब तक दिल में ही पल रही है.

ऐसे न डूबते हम पहले जो थाम लेते
मौजों की गोद में अब कश्ती संभल रही है.

तुम जब जुदा हुए तो सब कुछ उजड़ गया था
तुम आ गए तो दुनियां करवट बदल रही है.

इस जिंदगी में रौनक कम तो नहीं है ‘देवी’
बस इक तेरी कमी ही दिन रात खल रही है.

चराग़े-दिल/ ३७

लबों पर गिले यूं भी आते रहे हैं

गजलः १०
लबों पर गिले यूं भी आते रहे हैं
तुम्हारी जफ़ाओं को गाते रहे हैं.

कभी छाँव में भी बसेरा किया था
कभी धूप में हम नहाते रहे हैं.

रहा आशियां दिल का वीरान लेकिन
उम्मीदों की महफ़िल सजाते रहे हैं.

लिये आँख में कुछ उदासी के साये
तेरे ग़म में पलकें जलाते रहे हैं.

ज़माने से ‘देवी’ न हमको मिला कुछ
ज़माने से फिर भी निभाते रहे हैं.
चराग़े-दिल/ ३६

आज हम धूप खाने आए हैं

गज़ल: 9
बारिशों में बहुत नहाए हैं
आज हम धूप खाने आए हैं.

अश्क जिनके लिये बहाए हैं
आज वो खु़द ही मिलने आए हैं.

लेके मां की दुआ मैं निकली हूं
दूर तक रास्तों में साए हैं.

घिर गई हूं न जाने किनके बीच
लोग अपने लगे पराए हैं.

दिल की बाज़ी लगाई है अक्सर
गो कि हर बार मात खाए हैं.

हौसले देखिये हमारे भी
आंधियों में दिये जलाए हैं.

मुस्कराकर भी देखिये ‘देवी’
अश्क तो उम्र भर बहाए हैं.
चराग़े-दिल/ ३५

चराग़े-दिलः देवी नागरानी

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हेम ज्योत्स्ना पाराशर दीप

देवी नागरानी जी का ग़ज़ल संग्रह “चराग़े-दिल” जब हाथ आया तो पढ़ने का सिलसिला रुकने का नाम ही न ले सका.समीक्षा करने की योग्यता तो नहीं है परन्तु जो इस गज़ल संग्रह को पढ़ कर लगा वही बता रही हूँ । एक के बाद एक बेहतरीन गज़ल पढ ने को मिली । हर गज़ल को पढ़ कर एक अलग ही आनन्द प्राप्त हुआ।
देवी जी कहती हैं –

आस्माँ पर है चांद तारे सब ,
इस ज़मीं पर फक़त पडी हूँ मैं।

पर ये तो धरती की खुशनसीबी है कि देवी जी जैसे शाइर है यहाँ । देवी जी तो एक नायाब नगीना है जो देवी जी का ये शेर खुद बंया करता है-

मैं तो नायाब इक नगीना हूँ,
अपने ही सांस में जडी हूँ मैं।

जिन्दगी के हर पहलू को एक अलग ही अन्दाज़ में बँया करने का हुनर है देवी जी में-

कभी साहिलों से भी उठते है तूफाँ ,
कभी मौजे-तुफाँ में पाया किनारा।

तूफाँ में किनारा पाने वाली देवी जी कहती है –

विश्वास कर सको तो करो वरना छोड दो,

इस दम समय बुरा है मिला , मैं बुरा नहीं।
मेरी फितरत अजीब है ‘ देवी ‘

कोई तडपे तो मैं तडपती हूँ।

औरों के दर्द में तडपने वाली देवी जी के इस गज़ल संग्रह से बहुत कुछ मिलता है। गज़ले तो अच्छी हैं ही साथ ही उनमें छिपे संदेश ही अच्छे हैं जैसे –

मुश्किलें जब भी सामने आई,
जिन्दगी हौसला बढ़ाती है।

चिराग़े-दिल की गज़लें बार बार पढ़ने का दिल करता है –

फिक्र क्या बहर क्या, क्या गजल गीत क्या,
मैं तो शब्दों के मोती सजाती रही।

सच ही तो है चिराग़े-दिल सजे हुए शब्दों के मोती है।

सारा आकाश नाप लेता है ,
कितनी उँची उडान है तेरी ।

उनकी गज़लें पढ़ने के बाद अब तो उनसे रु-ब-रू सुनने की तमन्ना है।

फूल झड़ते है उनकी बातों से ,
लफ्ज़ जितने है सब सुनहरे है।

उम्मीद है देवी जी जल्द ही अपनी आवाज़ में अपनी कुछ गज़लें हम सभी तक पहुचायेंगी।

तुझको पढ़ते रहे , तभी जाना,
‘देवी’ दिलकश जुबान है तेरी।

सादर
हेम ज्योत्स्ना पाराशर ‘दीप’
http://hemjyotsana.wordpress.com

डर उसे फिर न रात का होगा

गजलः ८
डर उसे फिर न रात का होगा
जब ज़मीर उसका जागता होगा.

क़द्र वो जानता है खुशियों की
ग़म से रखता जो वास्ता होगा.

बात दिल की निगाह कह देगी
चुप जुबां गर रहे तो क्या होगा ?

क्या बताएगा स्वाद सुख का वो
ग़म का जिसको न ज़ायका होगा.

सुलह कैसे करें अंधेरों से
रौशनी से भी सामना होगा.

दूर साहिल से आ गए देवी
अब तो मौजों पे रास्ता होगा.

चराग़े-दिल /34

या बहारों का ही ये मौसम नहीं

 

गज़लः

या बहारों का ही ये मौसम नहीं

या महक में ही गुलों के दम नहीं.

 

स्वप्न आँखों में सजाया था कभी

आंसुओं से भी हुआ वह नम नहीं.

हम बहारों के न थे आदी कभी
इसलिये बरबादियों का ग़म नहीं.

आशियाना दिल का है उजड़ा हुआ
जिंदगी के साज़ पर सरगम नहीं.

जश्न खुशियों का भी अब बेकार है
ग़म का भी कोई रहा जब ग़म नहीं.

मौत का क्यों ख़ौफ़ देवीदिल में हो
जीने से बेहतर कोई मौसम नहीं.

 

चराग़े-दिल / 33

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