सर पटकते हैं आशियानों में

 

गज़लः 4

उड़ गए बालो-पर उड़ानों में
सर पटकते हैं आशियानों में.

 

जल उठेंगे चराग़ पल भर में
शिद्दतें चाहिये तरानों में.

नज़रे बाज़ार हो गए रिश्ते
घर बदलने लगे दुकानों में.

 

धर्म के नाम पर हुआ पाखंड
लोग जीते हैं किन गुमानों में.

 

कट गए बालो-पर, मगर हमने
नक्श छोड़े हैं आसमानों में.

 

वलवले सो गए जवानी के
जोश बाक़ी नहीं जवानों में.

 

बढ़ गए स्वार्थ इस क़दर ‘देवी’
एक घर बंट गया घरानों में.

चराग़े-दिल/30

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6 टिप्पणियाँ

  1. paramjitbali said,

    अगस्त 20, 2007 at 6:10 अपराह्न

    एक अच्छी गजल प्रेषित की है। बधाई।

    कट गए बालो-पर, मगर हमने
    नक्श छोड़े हैं आसमानों में.

    वलवले सो गए जवानी के
    जोश बाक़ी नहीं जवानों में.

  2. अगस्त 21, 2007 at 1:39 अपराह्न

    आदरणीय देवी जी ,
    नमस्कार ,

    जल उठेंगे चराग़ पल भर में
    शिद्दतें चाहिये तरानों में.

    धर्म के नाम पर हुआ पाखंड
    लोग जीते हैं किन गुमानों में.

    सभी शेर अच्छे लगे ।
    सादर
    हेम ज्योत्स्ना

  3. अगस्त 21, 2007 at 1:42 अपराह्न

    आदरणीय देवी जी ,
    नमस्कार ,

    सभी शेर अच्छे लगे ।
    सादर
    हेम ज्योत्स्ना

  4. divyabh said,

    अगस्त 21, 2007 at 3:37 अपराह्न

    बहुत सुंदर गज़ल है कुछ भी और ज्यादा कहना मेरे जैसे अदने व्यक्ति के ठीक नहीं…।

  5. अगस्त 21, 2007 at 4:10 अपराह्न

    Divyabh

    Yahi jeet hai haar bhi to yahi hai
    dein kis ka hum vasta ab kisiko.

    wishes
    Devi

  6. अगस्त 21, 2007 at 4:15 अपराह्न

    हेम ज्योत्स्ना ji

    जल उठेंगे चराग़ पल भर में
    शिद्दतें चाहिये तरानों में.

    नाम लेकर के लोगों का हम तुम
    बात करते हैं बस बहानों में

    सस्नेह
    देवी नागरानी


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