“चराग़े- दिल”- इला प्रसाद की दृष्टि में

“चरागे- दिल”

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इला प्रसाद

चरागे दिल देवी नांगरानी का हिन्दी में पहला ही गजल संग्रह है जिसके माध्यम से उन्होंने बतला दिया है कि उनकी लेखनी का चराग बरसों बरस जलता रहने वाला है. उनकी सोच का फ़लक विस्तृत है और उनकी गजलें जीवन के तमाम पहलुओं को छूती हैं. उन्होंने औरों के काँधों पर चढ़कर विकास नहीं किया. वे अपने पैरों से चली हैं , जिन्दगी की धूप – बारिश झेली है और आग में तप कर निकली हैं. उन्हीं के शब्दों में

कोई नहीं था ‘देवी’ गर्दिश में मेरे साथ
बस मैं, मिरा मुकद्दर और आसमान था.

जब जीवन-डगर कठिन हो और मन सम्वेदनशील, तो अभिव्यक्ति का ज़रिया वह खुद ढूढ़ लेता है. इस संग्रह में ढेरों ऐसी गजले हैं जो पाठकों को अपनी अनुभूतियों के करीब लगेंगी. आज चाहे देवी जी कहती हों कि

“शोहरत को घर कभी भी हमारा नहीं मिला”

मैं समझती हूँ कि उनकी गजलों का यह संग्रह पाठकों की पसन्द बन कर रहेगा।

देवी जी को इस सुन्दर कृति के लिए बधाई !

इला प्रसाद

ila_prasad1@yahoo.com

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ताज़गी कुछ नहीं हवाओं में

गजलः 6

ताज़गी कुछ नही हवाओं में
फस्ले‍‌‍‍‍‍‌‌-ग़ुल जैसे है खिज़ाओं में.

हम जिसे मन की शांति हैं कहते,
वो तो मिलती है प्रार्थनाओं में.

यूं तराशा है उनको शिल्पी ने
जान- सी पड़ गई शिलाओं में.

जो उतारी थीं दिल में तस्वीरें
वो अजंता की है गुफाओं में.

सच की आवाज़ ही जहाँ वालो,
खो गई वक्त की सदाओं में.

तू कहां ढूँढने चली देवी
बू वफाओं की बेवफाओं में.

 

चराग़े-दिल / 32

 

 

 

आंधियों के भी पर कतरते है

गजलः ५

आंधियों के भी पर कतरते हैं
हौसले जब उड़ान भरते हैं.

ग़ैर तो ग़ैर हैं चलो छोड़ो
हम तो बस दोस्तों से डरते हैं.

जिंदगी इक हसीन धोका है
फिर भी हंस कर सुलूक करते हैं.

राह रौशन हो आने वालों की
हम चराग़ों में खून भरते हैं.

खौफ़ तारी है जिनकी दहशत का
लोग उन्हीं को सलाम करते हैं.

कल तलक सच के रास्तों पर थे
झूठ के पथ से अब गुज़रते हैं.

हम भला किस तरह से भटकेंगे
हम तो रौशन ज़मीर रखते हैं

आदमी देवता नहीं फिर भी
बन के शैतान क्यों विचरते हैं.

 

चराग़े-दिल /३१

चराग़े-दिलः श्री देवेंद्र नारायण दास की दृष्टि में

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देवी जी,
आपका गज़ल संग्रह चराग़े दिल मिला

उसे इश्क क्या है पता नहीं
कभी शम्अ पर जो जला नहीं.

वह परवाना नहीं जो शम्अ पर मिटता नहीं. मन की पीड़ा को आँधियाँ क्या बुझायेंगी! क्या कहूं, किस किस शेर के लिये कहूँ, आपके हर अश्यार में पीड़ा ही पीड़ा है. पीड़ा ही सहज है जो मानव मन में करुणा पैदा करती है.

मेरे दिल का साज़ बजा नही
“न बुझा सकेंगी ये आंधियां
ये चराग़े‍ दिल है दिया नहीं”
जो मिटा दे ‘देवी’ उदासियां
कभी साज़े-दिल यूं बजा नहीं.

मन की उदासियां मिट नहीं पाती, जीवन में पीड़ा ही पीड़ा महादेवी वर्मा की तरह. आपकी पीड़ा ही गज़ल की शिल्पी है. ग़म पीने वाले ही जीवन के सुख का आनंद पाते हैं. पीड़ा और सजविता संप्रेषणयिता के कारण आपके गज़ल के हर शेर दिल को छू जाते हैं. मेरे गुरुदेव आर. पी. महरिष जी ने आपके संग्रह की भूमिका लिखी है. आप बहुत भाग्यवान है.

आपके हाइकू भी मिले पढ़ने को हाइकू दर्पन में.

घर घर में
वेदव्यास रचता
महाभारत.

लग रहा है
रिश्तों का मैदान
रणभूमि सा.

आस पास की बातों को शब्द बंध कर लेना आपकी पैनी द्रष्टी है. इसलिये मैं आपको कुशल सशक्त शब्द शिल्पी कहने में संकोच नही करता. एक बहुत अच्छे संग्रह के लिये आपको बहुत बधाई.

देवेंद्र नारायण दास
संपादकः अंकुर साहित्य मंच
Sadhna Kutir, Basna,
Chattis garh 493554.

सर पटकते हैं आशियानों में

 

गज़लः 4

उड़ गए बालो-पर उड़ानों में
सर पटकते हैं आशियानों में.

 

जल उठेंगे चराग़ पल भर में
शिद्दतें चाहिये तरानों में.

नज़रे बाज़ार हो गए रिश्ते
घर बदलने लगे दुकानों में.

 

धर्म के नाम पर हुआ पाखंड
लोग जीते हैं किन गुमानों में.

 

कट गए बालो-पर, मगर हमने
नक्श छोड़े हैं आसमानों में.

 

वलवले सो गए जवानी के
जोश बाक़ी नहीं जवानों में.

 

बढ़ गए स्वार्थ इस क़दर ‘देवी’
एक घर बंट गया घरानों में.

चराग़े-दिल/30

एक मर्म, जो दिल को छूता है

एक मर्म, जो दिल को छूता है

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समीक्षकः डा॰ अंजना संधीर
श्रीमती देवी नागरानी का पहला पहला गज़ल सँग्रह “चरागे-दिल”

देवी नागरानी से मेरा परिचय प्रवासिनी के बोल के संपादन के दौरान हुआ। उनकी गजलों और कविताओं के विचारों ने मन को छू लिया था, लेकिन उनकी कर्मठता ने और भी प्रभावित किया। मुझे याद है वह भारत में थीं और ईमेल के जरिए उन्होंने तुरंत कविताएँ संग्रह हेतु भेजी थीं। यूएसए वापस आने पर टेलीफोन पर बातें होती रहती थीं, मूलतः सिंधी का लहजा और मिठास उनकी जुबान में है।

न्यूयॉर्क के सत्यनारायण मंदिर में कवि सम्मेलन-2006 में अपने कोकिल कंठ से जब उन्होंने गजल सुनाई तो महफिल में सब वाह-वाह कर उठे। किसी की फरमाइश थी कि वे सिंधी की भी गजल सुनाएँ और तुरंत एक गजल का उन्होंने हिंदी अनुवाद पहले किया और सिंधी में उसे गाया। सब लोगों को देवी की गजल ने मोह लिया। तो ये थी मेरी देवी से रूबरू पहली मुलाकात। हमने एक दूसरे को देखा न था, बस बातचीत हुई थी। मेरी कविता पाठ के बाद वो उठकर आईं, मुझे गले लगाया और बोलीं- अंजना, मैं तुम्हें मिलने ही इस कवि सम्मेलन में आई हूँ। इस तरह सखी भाव जो पैदा हुआ, वो यहाँ की भागती-दौड़ती जिंदगी में बराबर चल रहा है। कभी ई-मेल के जरिए तो कभी टेलीफोन पर।

प्रवासिनी के बोल छपकर आई तो उन्होंने उस पर एक छोटा संग्रह कम्प्यूटर के माध्यम से अंग्रेजी-हिंदी में मेरी तस्वीर के साथ, पुस्तक के कवर पर अपनी पंक्तियाँ जड़कर मुझे भेंट स्वरूप भेजा। इस पुस्तक के इंग्लिश लायब्रेरी द्वारा होने वाले समारोह में (9 दिसंबर 2006) शामिल नहीं हो पा रही थी, क्योंकि भारत यात्रा तय थी। मुझे याद है अपने व्यस्त कार्यक्रम में भी प्रवासिनी के बोल पर कार्य करती रही। एक गजल रिकार्डर में टेप करके मुझे दे गई कि मैं उस दिन वहाँ न रहूँगी, पर मेरी आत्मा उस दिन जरूर वहीं होगी। प्रवासिनी के नाम पर वह सुंदर गजल है। ‘वादे-शहर वतन की चंदन सी आ रही है, यादों के पालने में मुझके झुला रही है।

‘क्वीन पुस्तकालय में न्यू अमेरिकन प्रोग्राम के डायरेक्टर श्री फ्रेड गिटनर ने प्रवासिनी के बोल का विमोचन किया और मैंने देवी द्वारा लिखा प्रवासिनी के बोल नंबर-2 का विमोचन किया और उनकी गजल सुनवाई। देवी तन से भारत में थी और मन से ऑडिटोरियम में थीं। समर्पण, निर्मल मन, भाषा के लगाव का परिणाम आपके सामने है चिरागे दिल। देवी आध्यात्मिक रास्तों पर चलने वाली एक शिक्षिका का मन रखने वाली कवयित्री हैं, इसलिए उनकी गजलों में सच्चाई और जिंदगी को खूबसूरत ढंग से देखने का एक अलग अंदाज है। उनकी लेखनी में एक सशक्त औरत दिखाई देती है जो तूफानों से लड़ने को तैयार है।गजल में नाजुकी पाई जाती है, उसका असर देवी की गजलों में दिखाई पड़ता है। उदाहरण के तौर पर देखिए- ‘भटके हैं तेरी याद में जाने कहाँ-कहाँ, तेरी नजर के सामने खोए कहाँ-कहाँ। ‘ अथवा ‘न तुम आए न नींद आई निराशा भोर ले आई, तुम्हें सपने में कल देखा, उसी से आँख भर आई।’ अथवा ‘उसे इश्क क्या है पता नहीं, कभी शमा पर वो जला नहीं।

‘देवी की गजलों में आशा है, जिंदगी से लड़ने की हिम्मत है व एक मर्म है जो दिल को छू लेता है। गजल संग्रह का शीर्षक चरागे दिल बहुत कुछ कह जाता है। अमेरिका की मशीनी जिंदगी में अपनी संवेदनाओं को बचाए रखना और अंग्रेजी वातावरण में हिंदी की गजलें कहना मायने रखता है। मैं दिल की गहराइयों से देवी नागरानी को शुभकामनाएँ देती हूँ। वो ऐसे ही और बहुत चराग रोशन करें, ताकि भाषा का कारवाँ चलता रहे।

डा॰ अंजना संधीर
83-64 talbot Street, Apt # 2A
Kew gardens, New York, NY
11415. USA

देखकर मौसमों का असर रो दिए

गज़ल:3

देखकर मौसमों का असर रो दिए,
सब परिंदे थे बे-बालो-पर रह गए.

 

बंद हमको मिले दर-दरीचे सभी,
हमको कुछ भी न आया नज़र रो दिए.

 

काम आए न जब इस ज़माने के कुछ,
देखकर हम तो अपना हुनर रो दिए.

 

काँच का जिस्म लेकर चले तो मगर,
देखकर पत्थरों का नगर रो दिए.

 

हम भी महफ़िल में बैठे थे उम्मीद से,
उस ने डाली न हम पर नज़र रो दिए.

 

फ़ासलों ने हमें दूर सा कर दिया,
अजनबी सी हुई वो डगर रो दिए.

 

चराग़े-दिल /29

वो अच्छा मकान था

 

गज़ल: 2

 

दीवारो-दर थे, छत थी वो अच्छा मकान था
दो चार तीलियों पे ही कितना गुमान था.

 

जब तक कि दिल में तेरी यादें जवांन थीं
छोटे से एक घर में ही सारा जहान था.

 

शब्दों के तीर छोडे गये मुझ पे इस तरह
हर ज़ख़्म का हमारे दिल पर निशान था.

 

तन्हा नहीं है तू ही यहां और हैं बहुत
तेरे न मेरे सर पे कोई सायबान था.

 

कोई नहीं था ‘देवी’ गर्दिश में मेरे साथ
बस मैं, मिरा मुक़द्दर और आसमान था.

 

 

चराग़े-दिल/28

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