चूड़ीवाला और अन्य कहानियाँ

 परिवार और परिवेश का प्रतिबिम्ब चूड़ीवाला और अन्य कहानियाँ

अहलेजमीं से दूर रहने पर उसी दूरी का अहसास, जिये गये पलों की यादें जिनकी इमारतें खट्टेमीठे तजुर्बों से सजाई गयी है, उन बीते पलों की कोख से जन्म लेती है सोच, जो इस नये प्रवासी वातावरण में अपने आप को समोहित करने में जुटी है। यहां की ज़िंदगी, आपाधापी का रवैया, रहनसहन, घर और बाहर की दुनिया की कशमकश ! और कशकश की इस भीड़ में जब इन्सान ख़ुद से भी बात करने का मौका नहीं पाता है तो सोच के अंकुर कलम के सहारे खुद को प्रवाहित करते हैं, प्रकट करते हैं। 

कहानी लिखना एक प्रवाह में बह जाना है। कल्पना के परों पर सवार होकर जब मन परिंदा परवाज़ करता है तो सोच की रफ़्तार अपने मन की कल्पना को इस तरह ख़यालों की रौ में बहा ले जाती है कि कल्पना और यथार्थ का अंतर मिटता चला जाता है। ऐसा कब होता है, कैसे होता है, क्यों होता है कहना नामुमकिन है। लेखक जब ख़ुद अपनी रचना के पात्रों में इस कदर घुलमिल जाता है तो लगता है एक विराट संसार उसके तनमन में संचारित हुआ जाता है और फिर वहां मची हलचल को, उस दहकती दशा को कलम के माध्यम से अभिव्यक्त किये बिना उसे मुक्ति नहीं मिलती.
हर इन्सान के आसपास और अन्तर्मन में एक हलचल होती है। सोचों की भीड़, रिश्तों की भीड़, पाबंदियों की भीड़, सुबह से शाम, शाम से रात, बस दिन ढलता है, सूरज उगता और फिर ढल जाता है और जैसे जैसे मानवमन अपने परिवेश से परिचित होकर घुलता मिलता जाता है तो फिर एक अपनाइयत का दायरा बनने लगता है; मन थाह पाने लगता है।

जी हां ! कुदरत के सभी तत्त्वों के तानेबाने से बुनी हुई ऐसी कहानियां, आधुनिक समाज में बदलते जीवन मूल्यों को रेखांकित करती हुई हमसे रूबरू हो रही है, श्री अमरेन्द कुमार के कहानी संग्रह  चूड़ीवाला और अन्य कहानियांके झरोखों से। अमरेन्द्र जी का परिचय देना सूरज को उंगली दिखाने के बराबर है। संयुक्त राज्य अमेरिका से निकलने वाली त्रैमासिक हिंदी पत्रिकाविश्वा के कुशल सम्पादक रहे हैं. उनकी कहानियों में एक ऐसी दबी चिंगारी पाई जाती है जो पाठक को अपनी आंच की लपेट में लेने से बाज नहीं आती। इस संग्रह में आठ कहानियां है जिनमें मेरी पसंदीदा रहीं मीरा चूड़ीवाला, चिड़िया, एक पत्ता टूटा हुआ, ग्वासी, रेत पर त्रिकोण । मीराअमरेन्द्र जी की एक लम्बी कहानी है। एक तरह से कोई जिया गया वृतांत, जिसमें विस्मृतियों की अनेक गांठें परस्पर खुलती रहती है। इस संग्रह की भूमिका में उनके ही शब्दों में परतें खोलती हुई कलम कह उठती है कहानी मनुष्य की अनुभूत मनोदशाओं का एक पूरा दस्तावेज़ है। यह एक ऐसी दुनिया है जहां सब कुछ अपना है पात्र, परिवेश, परिस्थ्ति, आरम्भ, विकास और परिणति आगे उनका कथन है कि कहानी का अंत कभी नहीं होता, उसमें एक विराम आ जाता है। एक कहानी से अनेक कहानियां निकलती है..” 

सच ही तो है ! उनकी कहानियां अपने जिये अनुभवों का एक लघु धारावाहिक उपन्यासिक प्रयास प्रस्तुत करती है जो शब्दों के सैलाब से अभिव्यक्त होता है जिसमें कहानी का किरदार, अपने आस पास का माहौल, रहन सहन, कथनशैली से जुड़ते हुए भी किताना बेगाना रहता है। एक विडंबनाओं का पूरा सैलाब उमड़ पड़ता है कहानी मीराके दरमियान जिसमें समोहित है आदमी की पीड़ा, तन्हाईयों का आलम, परिस्थितियों से जूझते हुए कहीं घुटने टेक देने की पीड़ा, उसके बाद भी दिल का कोई कोना इन दशाओं और दिशाओं के बावजूद वैसा ही रहता है – “कोरा, अछूता, निरीह, बेबस और कमजोर“.
 
मां नहीं रही..” खबर आई, समय जैसे थम गया, सांस अटक गयी, आंसू निकले और साथ में एक आर्तनादलेखक के पात्र का दर्द इस विवरण में शब्दों के माध्यम से परिपूर्णता से ज़ाहिर हो रहा है। आगे लिखते है सब कुछ लगा जैसे ढहने, बहने, गिरने और चरमराने और मैं उनके बीछ दबता, घुटता, और मिटता चला गया नियति की बख़्शी हुई बेबसी शायद इन्सान की आखिरी पूंजी है। मन परिन्दा सतह से उठकर अपनी जड़ों से दूर हो जाता है, लेकिन क्या वह बन्धन, उस ममता, उस बिछोह के दुख से उपर उठ पाता है ? अतीत की विशाल परछाईयों में कुछ कोमल, कुछ कठोर, कुछ निर्मल, कुछ म्लान, कुछ साफ, कुछ धुंधली सी स्मृतियां, टटोलने पर हर मानव मन के किसी कोने में सुरक्षित पायी जाती है। दर्द के दायरे में जिया गया हर पल किसी न किसी मोड़ पर फिर जीवित हो उठता है । अमरेंद्र जी की क़लम की स्याही कहानी की रौ में कहतीबहती इसी मनोदशा से गुज़रे मीराके जीवन को रेखांकित कर पाई है, जो बचपन, किशोरावस्था से जवानी और फिर उसी उम्र की ढलान से सूर्योदय से सूर्यास्त तक का सफ़र करती है। कहानी में अमरेन्द्र ने अनुरागी मन के बंधन को खूब उभारा है जहां मीरा की सशक्तता सामने ज़िन्दा बनकर आती है वहीं नारी जो संकल्पों के पत्थर जुटाकर, अपनी बिख़री आस्थाओं की नींव पर एक नवीन संसार का निर्माण करती है। मानवीय संबंधों की प्रभावशाली कहानी है मीरा‘ ! उम्र भी क्या चीज है बदलते मौसमों का पुलिन्दा ! शरीर और आत्मा का अथक सफ़र जहाँ हर मोड़ पर एक प्रसंग की परतें खुलती हैं, वहीं दूसरे मोड़ पर एक अन्य कथा को जन्म देती है। जीवन के परिवेश के विविध रंगों के तानेबाने से बुनी ये कहानियां कहीं प्रकृति के समुदाय के प्रभावशाली बिंब सामने दरपेश कर पाती है, कहीं चाहे अनचाहे रिश्तों की संकरी गलियों से हमें अपना अतीत दोहराने पर मजबूर करती है। कहानी चूड़ीवालाएक और ऐसी कहानी है जिसका मर्म दिल को छू लेता है। इसके वृतांत में सलीम चाचानामक चूड़ी बेचनेवाले किरदार का ताउम्र का सफ़र और सरमाया है जो उन्होंने बख़ूबी निभाया है सामने आया है, जिसने बालावस्था से वृद्धावस्था तक हर चौखट की शान को अपनी मानमर्यादा समझा। एक मोड़ पर आकर उन्हें यह अहसास दिलाया जाता है कि घर की बहू बेटियाँ उनकी बेची चीज़ों की खरीदार हैं और वे फ़कत बेचनेवाले। इन्सान के तेवर भी न जाने कब मौसम की तरह बदल जाते हैं ! कभी एक ही चोट काफ़ी होती है बिखराव के लिये। ऐसा ही तूफान उमड़ा सलीम चाचा के मन में और वही उन्हें ले डूबा। परस्पर इन्सानी रिश्तों का मूल्यांकन हुआ जिसमें एक अमानुषता का प्रहार मानवता पर भारी साबित हुआ।
शैली और शिल्प का मिला जुला सरलता से भरा विवरण कहींकहीं अमरेन्द्र जी की कल्पना को यथार्थ के दायरे में लाकर खड़ा करता है एक चलचित्र की तरह उनकी कहानी चिड़ियामें। जिसमें एक मूक गुफ़्तार होती है उस बेज़ुबान चिड़िया और कहानी के मूल किरदार के बीच; जहां एक नया रिश्ता पनपता है। ऐसा महसूस होता है कि स्वयं को सबसे विकसित प्राणी मानने वाले मनुष्य को भी अपने परिवेश से और बहुत कुछ सीखना बाकी है. एक संबंध जो मानव मन को एक साथ कई अहसासात के साथ जोड़ देता है, उस पल के अर्थ में अमरेन्द्र जी की भाषा ज्ञानार्थ को ढूंढ रही है, अपनी अपनी कथा कहते हुए. जो सीमाओं की सीढ़ियाँ पार करते हुए शब्दावली की अनेक धाराओं की तरह निरंतर कलकल बह रहीं हैं, उस चिड़िया के आने और न आने के बीच की समय गति में मानवीय मन की उकीरता, उदासी, तड़प, छटपटाहट शायद कलम की सीमा से भले परे हो, पर मन की परिधि में निश्चित ही क़रीब रही है. कहना, सुनना और सुनाना शायद इसके आगे निरर्थक और निर्मूल हो जाते हैं. रिश्ते में एक अंतहीन व्यथाकथा शब्दों से अभिव्यक्त होकर मन के एक कोने में अमिट छाप बन कर बस जाती है

सशक्त भाषा, पुरसर शैली और क़िरदार की संवाद शक्ति, शब्दों की सरलता इन कहानियों को पठनीय बनाती है. शब्द शिल्प की नागीनेदारी उन्हें और भी जीवंत कर देती है. कहानियों के माध्यम से लेखक अपने ही मन की बंधी हुई गांठें और मानवमन की परतों को भी उधेड़ रहे हैं, उदहारण के लिए कहानी गवासीही लें. ज़मीन से जुडी यादें हरेक शख़्स की यादों के किसी हिस्से पर अधिकार रखती है और इंसान चाहकर भी ख़ुद को उन अधिकारों से वंचित नहीं रख पाता. ऐसी ही नींव पर ख़ड़ी है गवासीएक इमारत जो स्मृतिओं के रेगिस्तान में अब भी टहलती है, बीते हुए कल के आजभी जिसके आँगन में पदचाप किये बिना चले जाते हैं जैसे किसी बुज़र्ग के फैले हुए दामन में, जो अपने परिवार को बिखरने से बचाने के लिए अपने अंत को टाले हुए है इस शैली के प्रवाह पर सोच भी चौंक पड़ती है, ठिठक कर रुक जाती है . मृत्यु तो जैसे आ गयी, लेकिन जीवन ने जैसे आत्मसमर्पण करने से मना कर दिया होहाँ ऐसी ही है गवासीआश्चर्य चकित रूप में ख़ुद से जोड़ने वाली कहानीकहानी कम..वृतांत ज़ियादा.
 

“एक पत्ता टूटा हुआ
काफ़ी हद तक मौसमों के बदलते तेवर दर्शाता हुआ वृतांत लगा, जो हवाओं के थपेड़ों के साथ जूझते हुए सोच की उड़ानों पर सवार होकर घर से दूर,मंजिल तक का सफ़र तय कर पाया है

वो दर बदर, मकाँ बदर, मंजिल बदर हुआ

पत्ता गिरा जो शाख से जुड़ कर न ज़ुड़ सका

कथा में हास्यरस का स्वाद भी ख़ूब है. एक पत्ता अपनेअपने जीवन के हर पहलू का बयाँ कर रहा है, स्नेह के छुहाव का, प्यार की थपथपी का, औरों के पावों तले रौंदे जाने पर चरमराहट का, किताबों की कैद से रिहाई पाने के बाद ठण्ड के अहसास का, बड़ा ही सहज और रोचक प्रस्तुतीकरण है. लेखक की यह ख़ूबी, पाठक को अपने साथ बाँध रखने की, अपने आप में एक मुबारक अस्तित्व्पूर्ण वजूद रखती है. जहाँ उम्र भर का अनुभव पल में सिमट रहा हो, वहीं पलों की गाथा ताउम्र के सफ़र में भी संपूर्ण नहीं होती. रेखांकित की गई विषयवस्तु सजीव, हास्यरस में अलूदा एक पत्ते की आत्माकथा का चित्रण अति प्रभावशाली सिलसिले की तरह चलता रहा.

कहानी रेत का त्रिकोण मानव मन की दशा और दिशा दर्शाती है, बिछड़कर भी जुड़े रहने की संभावना की पेचकाश है . कोई एक सूत्र है जो इंसान को इंसान से जोड़ता है, कोशिशें तो होंगी और होती रहेंगी, पर कब तक? क्या रेत के टीले पर बना भवन हवा के थपेड़ों से खुद को बचा पाया है? क्या रेत को मुट्ठी में कैद रख पाना संभव है? कई सवाल अब भी जवाब की तलाश में भटक रहे हैं, सर फोड़ रहे हैं. मानव मन का प्रवाह अपनी गति से चल रहा है और भाषा का तरल प्रवाह पाठक के मन को मुक्ति नहीं दे रहा है.
रेलचलित मानसनामक कहानी अपने उन्वान का प्रतिबिम्ब है. दुनिया के प्लेटफ़ॉर्म पर खड़ी भीड़ का एक हिस्सा है मानव. सफ़र में इस छोर से उस छोर तक का अनुभव ही ज़िन्दगी को मान्यता प्रदान करती है जो आज के माहौल की आपाधापी में गुज़र जाती है, रूकती नहीं. जो गुज़रती रहे गुज़रने के पहले वही तो ज़िन्दगी है !

अमरेन्द्र जी की कहानियाँ अपनी विषयवस्तु, वर्णनशैली के कारण रोचक और पाठनीय है, कभी कहानियाँ एक दुसरे से जुडी हुई, ज़मीन से, ज़र से, मानवता सेजैसे जीवन की धार में अनुभव रुपी मोती पिरोये गए हैं . प्रकृति के हर एक मौसम का वर्णन प्रभावशाली बिम्ब बनकर सामने आता है. इन कहानियों की एक ख़ूबी यह भी हैवे जहाँ से शुरू होती हैं, वहीँ समाप्त होकर, और फिर वहीँ से प्रारंभ होने का सामर्थ्य भी रखती हैं. इस दिशा में एक कदम आगे और आगे बढ़ते रहे इसी शुभकामना के साथ

समीक्षकः देवी नागरानी

पुस्तकः चूड़ीवाला और अन्य कहानियाँ, लेखक; अमरेन्द्र कुमार, पन्नेः१७४, कीमतः रु॰, प्रकाशकः पेंगुइन बुक्स एंड यत्र बुक्स

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दोस्ती के नाम पर

दोस्तों का है अजब ढब, दोस्ती के नाम पर
हो रही है दुश्मनी अब, दोस्ती के नाम पर.

इक दिया मैने जलाया, पर दिया उसने बुझा
सिलसिला कैसा ये यारब, दोस्ती के नाम पर.

दाम बिन होता है सौदा, दिल का दिल के दर्द से
मिल गया है दिल से दिल जब, दोस्ती के नाम पर.

जो दरारें ज़िंदगी डाले, मिटा देती है मौत
होता रहता है यही सब, दोस्ती के नाम पर.

किसकी बातों का भरोसा हम करें ये सोचिए
धोखे ही धोखे मिलें जब, दोस्ती के नाम पर.

कुछ न कहने में ही अपनी ख़ैरियत समझे हैं हम
ख़ामुशी से हैं सजे लब, दोस्ती के नाम पर.

दिल का सौदा दर्द से होता है ‘देवी’ किसलिए
हम समझ पाए न ये ढब, दोस्ती के नाम पर.

मेरे वतन की खुशबू

बादेसहर वतन की, चँदन सी रही है
यादों के पालने में मुझको झुला रही है.

ये जान कर भी अरमां होते नहीं हैं पूरे
पलकों पे ख़्वाब देवीफिर भी सजा रही है.

कोई कमी नहीं है हमको मिला है सब कुछ
दूरी मगर दिलों को क्योंकर रुला रही है.

कैसा सिला दिया है ज़ालिम ने दूरियों का
इक याद रही है, इक याद जा रही है.

पत्थर का शहर है ये, पत्थर के आदमी भी
बस ख़ामशी ये रिश्ते, सब से निभा रही है.

तुमको गिला है मुझसे, मुझको नसीब से था
ये जिंदगी भी क्या क्या, सदमें उठा रही है.

शादाब याद दिल में, इक याद है वतन की
तेरी भी याद उसमें, घुलमिल के रही है.

देवीमहक है इसमें, मिट्टी की सौंधी सौंधी
मेरे वतन की खुशबू, केसर लुटा रही है.

जाने क्यों बात मगर करने से शरमाते हैं

गज़लः

देख कर तिरछी निगाहों से वो मुस्काते हैं
जाने क्यों  बात मगर करने से शरमाते हैं.

मेरी यादों में तो वो रोज चले आते हैं
अपनी आँखों में बसाने से वो कतराते हैं.

दिल के गुलशन में बसाया था जिन्हें कल हमने
आज वो बनके खलिश जख्म दिये जाते हैं.

बेवफा मैं तो नहीं हूं ये उन्हें है मालूम
जाने क्यों फिर भी मुझे दोषी वो ठहराते हैं.

मेरी आवाज़ उन्होंने भी सुनी है, फिर क्यों
सामने मेरे वो आ जाने से कतराते  हैं.

दिल के दरिया में अभी आग लगी है जैसे
शोले कैसे ये बिना तेल लपक जाते हैं.

रँग दुनियां के कई देखे है देवी लेकिन
प्यार के इँद्रधनुष याद बहुत आते हैं.

धूप से रूठी चांदनी

एक परिपक्व कवि-मन की संवेदना 

       कविता एक तजुर्बा है, एक  ख़्वाब है, एक भाव है | जब दिल के अंतर्मन में मनोभावों का तहलका  मचता है, मन डांवाडोल होता है या ख़ुशी की लहरें अपने बांध को उलांघ जाती है तो कविता बन जाती है | कविता अन्दर से बाहर की ओर बहने वाला निर्झर झरना है |

        कविता शब्दों में अपना आकार पाती है, सोच के तिनके बुनकर, बुनावट और कसावट में अपने आप को प्रकट करती है | रचनात्मक सृष्टि के लिए शब्द बहुत जरुरी है, जिनको करीने  से सजाकर, सवांरकर एक भव्य भवन का निर्माण किया जाता है | दूसरी विशेषता जो कविता को मुखरित करती है वह है शब्दों को जीवंत बनाने की कलात्मक अभिव्यक्ति जो एक रीति का प्रयोग करने पर रचनाकार को कसौटी पर खरा उतारती है | इन्हीं  सभी गुणों की नींव  पर निर्माण करती, अपनी देश-परदेश की  भूली-बिसरी यादों को जीवंत करती, जानी मानी प्रवासी रचनाकार सुधा ओम ढींगरा की सुन्दर और भावनात्मक कविताएँ  ” धूप से रूठी चांदनी ” काव्य संग्रह में हमारे  रूबरू हुई है |

       आज की व्यवसायिक परिस्थितियों में आदमी अपनी उलझनों के दायरे से निकलने के प्रयासों में और गहरे धंसता चला जा रहा है | ऐसे दौर में मनोबल में सकारात्मक संचार कराती उनकी कविता
“मैं दीप बाँटती हूँ” अपने सर्वोत्तम दायित्व से हमें मालामाल करती है—
 “मैं दीप  बाँटती हूँ /  इनमें तेल है मुहब्बत का/
  बाती है प्यार की/ और लौ है प्रेम की /

रौशनी करती है जो हर अंधियारे ह्रदय औ’ मस्तिष्क  को |
निराला जी के शब्दों में “भावनाएं शब्द-रचना द्वारा अपना विशिष्ट अर्थ तथा चित्र द्वारा परिस्पुष्ट होती है | अर्थ शब्दों के द्वारा और शब्द वर्णों द्वारा”
 देखिये इसी कविता की एक कड़ी कैसे भाषा के माध्यम से भावो के रत्नों का प्रकाश भरती जा रही है | उनकी दावे दारी के तेवर देखिये:
  “मैं दीप लेती भी हूँ/ पुराने टूटे-पुटे
   नफरत, ईर्ष्या, द्वेष की दीप
  जिनमें तेल है/ कलह-कलेश का/बाती है बैर-विरोध की
   लौ करती है जिनकी जग- अँधियारा
सुधाजी, एक बहु आयामी रचनाकार के रूप में हिंदी जगत को अपनी रचनात्मक ऊर्जा से परिचित कराती आ रही है | उनके साहित्यिक व्यक्तित्व का विस्तार उनकी कहानियाँ, इंटरव्यू, अनुवादित उपन्यास हर क्षेत्र में अपनी पहचान पा चुका है  और अब ८०  कविताओं का यह संग्रह अपने बहु विध वैशिष्टिय से हमारा ध्यान बरबस आकृष्ट कर रहा है | इनकी रचनाएँ आपाधापी वाले संघर्षों से गुज़रते बीहड़ संसार के बीच एक आत्मीयता का बोध कराती हैं |
      “आज खड़ी हूँ…./ईश्वर और स्वयं की पहचान की ऊहापोह में……”
इनकी कवितात्मक ऊर्जा में आवेग है, एक परिपक्व कवि मन की गहन संवेदना, चिंतात्मक और सामाजिक बोध का जीवंत बोध शब्दों के बीच से झांकता हुआ कह रहा है :
“अब दाग लगे दामन पर जितने, सह लुंगी
दुनिया जो कहे झेलूंगी/ तू जो कहे ….चुप रहूंगी
अपनी  लाश को काँधे पर उठाये/ वीरानों  में
दो काँधे और ढूँढूँगी  / जो उसे मरघट तक पहुंचा दे…….”
      दर्द ही वो है जो मानव-मन  की पीड़ा का मंथन करता है और फिर मंथन का फल  तो सभी को समय के दायरे में रहकर चखना पड़ता है | कौन है जो बच पाया है? कौन है जो ज़ायके से वंचित रहा  है? सुधाजी ने बड़ी संवेदना से समाज में पनपते अमानवीय कोण की प्रबलता को दर्शाया है | जहाँ नारी की पहचान घर की चौखट तक ही रह गई है, अपने जिम्मेदारियों की सांकल से बंधी हुई वह नारी जकड़ी हुई अपने तन की कैद में, घर की कैद में..
    ” दुनिया ने जिसे सिर्फ औरत / और तूने महज़ बच्चों की माँ समझा / “
जिन्दगी की सारी चुनौतीयों से रूबरू कराती सुधाजी की कलम अपनी सशक्तता का परिचय दे रही है | जो कवि अपने शीश-महल में बैठकर काव्य सृजन करते है वे तानाशाहों के अत्याचारों से वाकिफ़ तो है, लेकिन मनुष्य की पीड़ा और वेदना उन्हें द्रवित नहीं करती | धरती पर न जाने कितने लोग कराहते  हैं, कितना लहू बहता रहता है, कितनी साँसों में घुटन भर दी जाती है, ज़ुल्मतों का दहकता हुआ साया जब कवि  मन पर अपनी छाप छोड़ जाता है, तो कलम से निकले शब्द जीवंत हो जाते हैं, खामोशियों से सम्वाद करते हैं,  उन पीड़ाओं का, जिनको तनमन से भोगा ,सहा. जहाँ वेदना कराह उठती है वहीँ उनकी बानगी में हर एहसास धीमे से थपथपाता है, टटोलता है और उलझे हुए प्रश्नों का जवाब तलब करता है:
  “आतंकवादी हमला हो/ या जातिवाद की लड़ाई /
   रूह, वापिस देश अपने भाग जाती है.”
 और फिर कटाक्ष करती शब्दावली का रूप देखिये :
 “तोड़ा था पुजारी ने /मंदिर के भरम को
जब सिक्के लिए हाथ में बेईमान मिल गए”
जीवन सिर्फ जीने और भोगने का नाम नहीं, समझने और समझाने का विषय भी है | इसी काव्य सुधा में उनके उर्वर मस्तिष्क की अभिनव उपज है उनकी अनूठी रचना (जिसको सुनने का मौका मुझे उनके रूबरू ले गया )जिससे उनकी सम्पूर्ण कविताओं की स्तरीयता एवं विलक्ष्णता का अनुभव सहज ही लगाया जा सकता है.”प्रतिविम्ब “में उठाये प्रसंग समाजिक, पारिवारिक —- चिंतन को पारदर्शी बिम्ब बनकर सामने आये..

“मैं  आप का ही प्रतिबिम्ब हूँ.
बलात्कार से पीड़ित कोई बाला हो/ या सवर्णों से पिटा कोई दलित …
मेरा खून उसी तरह खौलता है/ जैसे आप भड़कते थे |”

लेखन कला अपनी पूर्णता तब ही प्रकट कर पाती है जब भाषा या शैली अपने तेवरों के प्रयोग से कल्पना  और यथार्थ का अंतर मिटा दे… अपने परिवेश में जो देखा गया, महसूस किया गया और भोगा गया, उसे विषय-वस्तु बनाकर सुधाजी  अपनी रचनाओं  द्वारा पाठक को अनुभव सागर से जोड़ लेती हैं |  उनकी अनेक रचनाएँ आप बीती से जग बीती तक का सफ़र करती हुई, हद की सरहदों तक को पार करने की कोशिश में कहती है अपनी कविता “शहीद” में
“नेताओ और धर्म के लिए,
इन्सान नहीं
सिर्फ सिपाही शहीद    हुआ.”                                                                                                                                                        

हर रचना अपने धर्म क्षेत्र के दायरे में घूमती है, कहीं छटपटाती है, और कहीं- कहीं मंजिल के पास आते- आते दम तोड़ देती है | ऐसी सशक्त कविताएँ है “बेरुखी, समाज, मुड़ कर देखा, परदेस की धूप, खुश हूँ मैं ,और  देस -परदेस  की व्यथा- गाथा को बहुत सुन्दरता से माँ के नाम चिट्ठी में लिख भेजा सन्देश उनकी जुबानी सुनें :
“परदेस से  चिट्ठी आई,
माँ की आँख भर आई
लिखा था खुश हूँ मैं चिंता न करना
घर के लिया है किश्तों पर/ कार ले ली है किश्तों पर
फर्नीचर ले लिया किश्तों पर / यहाँ तो सब कुछ ख़रीदा जाता है किश्तों पर”

सोच की हर सलवट पीड़ा से भीगी हुई, आँख फिर भी नम नहीं | ऐसी अभिभूत करती हुई रचनाओ के लिए सुधाजी को बधाई एवं शुभ कामनाएँ | शिवना प्रकाशन की कई कृतियों में से यह एक अनूठी कृति अब भारत और विदेश के बीच की पुख्ता कड़ी बनी है श्रेय है शिवना प्रकाशन को, हर प्रयास को जो हर कदम आगे और आगे सफलता की ओर बढ़ रहा है !

देवी नागरानी                                                           

काव्य संग्रह :धूप से रूठी चांदनी, कवित्री :डॉ सुधा ओम ढींगरा
पन्ने :११२ मूल्य :३०० रु 
प्रकाशक :शिवना प्रकाशन,
P.B.Lab,
Samart Complex Basement,
Bus Stand,
Sehore-466001. U.P.

लौ दर्दे-दिल की

लौ दर्दे – दिल की

शब्द सादे भाव गहरे,  काव्य की गरिमा मही,

‘लौ दर्दे दिल की’ संकलित, गजलों में ‘देवी’ ने कही

न कोई आडम्बर कहीं, बस बात कह दी सार की,

है पीर अंतस की कहीं,  पीड़ा कहीं संसार की.

आघात संघातों की पीड़ा, मर्म में उतरीं घनी, उसी आहत पीर से ‘लौ दर्दे-दिल की’ गजलें बनीं .

जीवन-दर्शन को इतनी सहजता और सरलता से कहा जा सकता है, यह ‘देवी’ जी की लेखन शैली से ही जाना. जैसे किसी बच्चे ने कागज़ की नाव इस किनारे डाली हो और वह लहरों को अपनी बात सुनाती हुई उस पार चली गयी हो. कहीं कोई पांडित्य पूर्ण भाषा नहीं पर भाव में पांडित्य पूर्ण संदेशं हैं. क्लिष्ट भावों की क्लिष्टता नहीं तो लगता है, मेरे अपने ही पीर की बात हो रही है और मैं इन पंक्तियों में जीवंत हो जाती हूँ . जब पाठक स्वयं को उस भाव व्यंजना में समाहित कर लेता है, तब ही रचना में प्राण प्रतिष्ठा होती है.

देवी जी के ही शब्दों में —–

करती हैं रश्क झूम के सागर की मस्तियाँ

पतवार बिन भी पार थी कागज की कश्तियाँ .

यह  ‘ दर्दे दिल की लौ’  उजाला बनने को व्याकुल है , सबके दर्द समेट लेने चाहत ही किसी को सबका बनाती है,  परान्तः-सुखाय चिंतन ही तो परमार्थ की ओर वृतियों को ले जाती हैं और शुद्ध चिंतन ही चैतन्य तक जीव को ले जाता है. औरों के दर्द से द्रवित और उन्हें समेट लेने की चाह में ही,’ मालिक है कोई मजदूर कोई, बेफिक्र कोई मजबूर कोई.’ संवेदना कहती है ‘ बहता हुआ देखते है सिर्फ पसीना, देखी है कहाँ किसने गरीबों की उदासी’ . ठंडे चूल्हे रहे थे जिस घर के, उनसे पूछा गया कि पका क्या है’ यह सब पंक्तियाँ देवी जी के अंतस को उजागर करतीं हैं.  वे सारगर्भित  मान्यताओं  की भी पक्षधर है कि व्यक्ति  केवल अपने कर्मों से ही तो उंचा होता है. ‘ भले छोटा हो कद किरदार से इंसान ऊँचा हो, उसी का जिक्र यारों महफ़िलों में आम होता है’ .

जीवन के मूल सिद्धांतों के प्रति गहरी आस्था है, सब इनका पालन क्यों नहीं करते इसकी छटपटाहट है, साथ ही यथार्थ से भी गहरा परिचय रखतीं है तब ही तो लिख दिया 

‘ उसूलों पे चलना जो आसान होता,

जमीरों के सौदे यकीनन ना होते,

कसौटी पे पूरा यहाँ कौन ‘देवी ‘

 जो होते, तो क्यों आइने आज रोते’.

सामाजिक, सांप्रदायिक , न्यायिक  और  राजनैतिक दुर्दशा के प्रति आक्रोश है, धार्मिक मान्यताओं के प्रति उनके उदगार नमन के योग्य हैं.’ वहीँ है शिवाला, वहीँ एक मस्जिद , कहीं सर झुका है, कहीं दिल झुका है.’पुनः है जहॉं मंदिर वहीँ है पास में मस्जिद कोई , साथ ही गूंजी अजाने , शंख भी बजते रहे. न्यायिक व्यवस्था के प्रति आक्रोश है. तिजारत गवाहों की जब तक सलामत क्या इन्साफ कर पायेगी ये अदालत.

भारतीयता,  हिंदी  देश प्रेम, वतन और शहीदों के प्रति रोम-रोम से समर्पित भावनाएं उन्हें प्रणम्य बनाती है.

हमें अपनी हिन्दी जवाँ चाहिए,

सुनाये जो लोरी वो माँ चाहिए.

तिरंगा हमारा हो ऊँचा जहाँ ,

निगाहों में वह आसमाँ चाहिए.

वतन के लिए वह समर्पित जोश और उमंगें हैं कि पढ़ कर रोमांच होने लगता है.

दहशतें रक्शौं है , रोजो शब् यहॉं

कब सुकून पायेंगे मेरे हम वतन.

जान देते जो तिरंगे के लिए

उन शहीदों का तिरंगा है कफ़न.

देवी नागरानी एक प्रबुद्ध व्यक्तित्व है, बुद्ध का अर्थ बोध गम्यता. इस मोड़ पर जब चिंतन वृत्ति आ जाती है तो सब कुछ आडम्बर हीन हो जाता है, भावों को सहजता से व्यक्त करना एक स्वभाव बन जाता है. कितनी सहजता है, ‘ यूँ तो पड़ाव आये गए लाख राह में, खेमे कभी भी  हमने लगाए नहीं कहीं’ . वे मानती हैं कि  अभिमान ठीक नहीं पर स्वाभिमान की पक्षधर हैं, ‘ नफरत से अगर बख्शे कोई, अमृत भी निगलना मुश्किल है , देवी शतरंज है ये दुनिया,  शह उससे पाना मुश्किल है’ ‘

” लौ दर्दे दिल की ” भावनाओं का गहरा समंदर है , अहसासों की लहरें हैं, निश्छल से संवेदित भाव हैं , कागज़ की नाव है और स्नेहिल मन की पतवार है. सतहों को हटा कर मन की तहों तक जाती एक यात्रा है . सादगी से अनुभूतियों को अंतस में उतारने की कला का अद्भुत प्रयास है.

न हिला सके इसे जलजले , न वो बारिशों में ही बह सके.

उसे क्या बुझा सके आधियाँ , ये चरागे दिल है दिया नहीं.

मृदुल कीर्ति,  Atlanta, USA

Shailja Dubey ka Sanmaan

मुंबई में दिल्ली की कवियित्री शैलजा दुबे के सन्मान में काव्यगोष्ठी

दिनांक २२ मंगलावार, जून २०१० को दिल्ली की वरिष्ठ रचनाकार व कवियित्री श्रीमती शैलजा दुबे जी के सन्मान में एक काव्य गोष्ठी का आयोजन देवी नागरानी जी के निवास स्थान पर किया गया, जिसमें शामिल रहे अनेक गीत ग़ज़ल के स्रजनहार जिन्होंने महफ़िल को महकाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. काव्य गोष्ठी में वरिष्ठ गज़लकार श्री आर. पी. शर्मा की अध्यक्षता और जाने माने शायर मा.ना. नरहरी जी के संचालन ने एक खुशनुमा समाँ बांध दिया. 

     काव्य गोष्टी आरंभ करने के पूर्व देवी नागरानी ने पुष्प गुच्छ से महर्षि जी का सन्मान किया. साथ ही मुख़्य महमान शैलजा दुबे जी और उनके पति श्री उदय दुबे जी का पुष्प व शाल से सन्मान किया. 

L to R Jyoti gajbhiye, Taj Arsi, Zafar Raza, Mrs. Aruna Goswami, Shailja Dubey, Shri Uday Dubey, Khanna ji, P.K. Saxena, Narhari sahib. Devi Nangrani, Dr.Rajam Natrajan Pillai

काव्य सुधा का आगाज़ किया शास्त्रीय संगीतकार श्री नीरज कुमार ने. उन्होने अपनी मधुर आवाज़ से शायर रज़ा साहब की एक ग़ज़ल पेश की औेर ख़ूब वाह वाह लूटी. सुधा की सरिता शाम ७. से रात १० बजे तक निर्झर बहती रही जिसमें प्रवाह  में सभी उपस्थित रचनाकारों का अनूठा योगदान रहा.   

Sagar Tripathi, Hasteemal, Shaym Kumar, Neeraj Goswami, Devmany Pandey

काव्य सुधा का  सिलसिला जा़री रहा जिसमें भागीदार रहेः  अंजुमन संस्था के अध्यक्ष एवं प्रमुख शायर खन्ना मुज़फ्फ़रपुरी,  श्री रमांकांत शर्मा,  “कुतुबनुमा” की संपादिका डा॰ राजम नटराजन पिलै, जिन्होंने ने पहली बार अपनी एक रचना का पाठ किया. संयोग साहित्य के संपादक श्री मुरलीधर पांडेय ने शास्त्रीय गायन के साथ फ़िज़ा में शबनम घोल दी. हर दिल अज़ीज़ शायर नीरज गोस्वामी, शिवदत “अक्स”, हस्तीमल हस्ती, कविता गुप्ता,  प्रमिला शर्मा, ज़ाफर रज़ा,  पी सक्सेना “दूसरे”, नईमा इम्तियाज़, सुमीता केशवा,  रचना भंडारी, मरियम गज़ाला, डा. रीटा गौतम,  श्री मा.ना. नरहरी, देवी नागरानी, ज्योती गजभिये,  कपिल कुमार,  मुहमुद्दिल माहिर जी. मुख्य महमान श्रीमती शैलजा दुबे ने अपनी सशक्त रचनाओं का पाठ कर के सभी रचनाकारों की दाद हासिल की.

( Shri Amar Kakkad Reading a poem, Kavita Gupta, Asmita Dubey, Ratna jha and Dr.Rita Gautam

अंत में अध्यक्ष श्री आर. पी. शर्मा ने कई गज़लों का पाठ भरपूर ताज़गी के साथ किया.  अमर काकड़ “हुप्पा हुय्या” के प्रोड्यूसर भी इस संध्या का गौरव बढ़ाने के लिये मौजूद रहे. सुनने का श्रेय पाया श्रीमती अरुणा गोस्वामी, अस्मिता दुबे, रत्ना झा और ताज आरसी साहिब ने.

     काव्या गोष्टी सफलतापूर्ण संपूर्ण हुई. देवी नागरानी ने सभी कवि गण व श्रोताओं का तहे दिल से आभार व्यक्त किया.  मधुर वातावरण में शाम कब रात हुई पता नहीं चला. भोजन के साथ समाप्ती हुई. जयहिंद   देवी नागरानी

Dauji Gupt in Mumbai

 

Goshti At Residence in Bandra

Ratna Jha, Dr. Rajam, Mehrish ji, Dauji Gupt, Devi Nangrani, Maya & Ram Govind. Shyam, Khanna, Alok Bhattacharya, Lakhbir. Shailendra kumar, Neeraj Goswamy,

प्रवासी साहित्यकारों के प्रतिनिधि डा॰ दाऊजी गुप्त मुंबई में

 सत्रह अप्रैल २०१० की बात है जब देवी नागरानी जी के मोबाइल फोन की घंटी बजी. ” मैं दाऊजी गुप्त बोल रहा हूँ लखनऊ से, कल मुंबई पहुंच रहा हूँ.” देवी जी ने क्षण भर को सोचा और ख़ुशी से बोलीं..” आपका स्वागत है हमारी महानगरी में. ” और बातों के सिलसिले में यह तय हुआ कि सुनने सुनाने के सिलसिले को एक काव्य गोष्टी के स्वरूप दिया जाय ताकि कुछ मिलने मिलाने का भी लाभ मिले” देवी जी जानतीं हैं के दाऊजी जो खुद बेहतरीन कवि हैं को कवितायेँ ग़ज़लें सुनने का कितना शौक है, लेकिन इतने कम समय में कौन आ पायेगा उनके यहाँ ये सोचनीय प्रश्न था. उन्होंने कहा ” दाऊजी आपका स्वागत है लेकिन मुझे ये सब प्रबंध करने में समय लगेगा आप अगर अनुमति दें तो ये काव्य गोष्ठी मंगल वार २० मंगलवार को रख लें.” इस तरह मंगल वार की शाम पांच बजे देवी नागरानी जी के घर पर एक काव्य गोष्ठी रखने का कार्यक्रम पक्का हो गया.

Dr. Sangeeta sahaj, Devmany Pandey, Dauji Gupt, Khanna ji, Alok B

जो लोग देवी जी को जानते हैं उन्हें उनकी कर्मठता और कार्य क्षमताओं का पूरा अंदाज़ा है, बहुत मुश्किल लगने वाले काम को वो आसानी से कर दिखाती हैं. एक बार वो जिस काम को करने का बीड़ा उठा लेती हैं उसके बाद उसे पूरा कर के ही सांस लेती हैं. अकेली होने के बावजूद वो कभी अपने आपको अकेला या असहाय नहीं पातीं. उनका ये गुण अनुकरणीय है. दाऊजी से बात करने के पश्चात उन्होंने बिना समय गंवाये मुंबई के काव्य रसिकों शायरों की एक लिस्ट तैयार की और फिर उसके अनुसार एक एक को फोन करने में जुट गयीं. तीन घंटे की लगातार हो रही फोन काल्स के बाद कई जाने माने शायर मंगलवार की शाम उनके घर पर पधारे.मंगलवार बीस अप्रेल को देवी जी घर सब से पहले पहुँचने वाले दाउजी गुप्त ही थे. पाँच बजे की तपती शाम में देवी जी के घर पहुँच कर दाउजी ने अपने काव्य प्रेम को दर्शा दिया. एक एक कर काव्य प्रेमी आने लगे. पिंगलाचार्य श्री महरिष जी, जानी मानी कव्यित्री माया गोविन्द और उनके अद्भुत शायर पति राम गोविन्द , हरदिल अज़ीज़ शायर जनाब खन्ना मुज्ज़फ़री, मधुर कविताओं के रचयिता कुमार शैलेन्द्र , ‘कुतुबनुमा’ 

 

Dauji Gupt, Mehrish DR. Lakhbir ka shawl Suman se sanmaan karte hue
पत्रिका के माध्यम से हिंदी की पताका फहराने वाली संपादक डा. राजम नटराजन पिल्ले, अपनी ग़ज़लों से सबके दिलों पर छाने वाले शायर जनाब सागर त्रिपाठी, सौम्य प्रकृति के अनूठे शायर जनाब हस्ती मल हस्ती, ‘क़ुतुबनुमा’ के संपादक मंडल और अनेकों संस्थाओं से जुड़े श्री अलोक भट्टाचार्य, नारी शक्ति की प्रतीक कव्यित्री नीलिमा दुबे, , प्रो॰रत्ना झा, खोपोली के शायर नीरज गोस्वामी, रास बिहारी पाण्डेय, आशु कवि श्यामकुमार श्याम,अपनी विशिष्ट शैली से चमत्कृत करने वाले कवि, शायर श्री लक्षमण दुबे ,आर. डी. नैशनल कालेज की हिंदी विभाग की अध्यक्षा डा॰ संगीता सहजवानी और जाने माने कवि, शायर, तथा मँच संचालक देव मणि पांडेय, जिन्होंने सहर्ष कार्यक्रम के संचालन की जिम्मेवारी भी संभाली. शायर जनाब खन्ना मुज्ज़फ़री अध्यक्ष के पद पर आसीन हुए, श्री महरिष जी एवं दाऊजी गुप्त, माया गोविंद मुख्य महमान रहे.
गोष्टी के पूर्व देवमणि पांडेय ने श्री दाऊजी गुप्त का परिचय दिया और फिर गोष्टी में आए सभी कावियों का उनसे परिचय करवाया. दाऊजी गुप्त अंतराष्ट्रीय अखिल विश्व समिति के अध्यक्ष हैं और न्यूयार्क से प्रकाशित सौरभ पत्रिका के प्रधान संपादक भी .
शाम छः बजे से बहती हुई ये यादगार काव्य रस धारा सुनने सुनाने वालों को दो घंटों तक लगातार भिगौती रही. दो घंटे कब निकल गए पता ही नहीं चला . अन्तराल के पलों को देवमणि जी ने अपने कुशल संचालन से रोचक बना दिया.. सभी कवियों, कवित्रियों ने अपनी अपनी रचनात्मक अभिव्यक्तियों से समां बांधे रखा धन्यवाद ज्ञापन से पूर्व पिंगलाचार्य श्री महरिष जी ने श्री दाउजी गुप्त का सम्मान पुष्प गुच्छ और शाल ओढ़ा कर किया , इसके बाद देवी नागरानी जी ने
सुश्री माया गोविन्द जी का सम्मान पुष्प गुच्छ और शाल ओढा कर किया.
ये भी एक सुखद संजोग था की काव्य रसिक प्रो॰ लखबीर जी, जो राजम जी की शिष्य रह चुकी हैं ने उसी दिन अपना शोध कार्य पूरा कर डाक्टरेट की डिग्री हासिल की थी. श्री दाऊजी गुप्त ने सबकी ओर से उन्हें शुभकामनाओं के साथ पुष्प गुच्छ भेंट किये.
इस अभूतपूर्व काव्यगोष्ठी को सफल बनाने के लिए किये गए प्रयासों की सराहना करते हुए देवी जी ने सबका आभार प्रकट किया. कार्यक्रम के अंत में महमानों ने स्वादिष्ट व्यंजनों से सजे रात्रि भोज का आनंद लिया. ये काव्य गोष्ठी बरसों तक इसमें शामिल महमानों के दिलों में याद बनके महका करेगी
 प्रस्तुतकर्ताः नीरज गोस्वामी

 

Lau Darde-Dil ka Vimochan

“लौ दर्दे दिल की” ग़ज़ल संग्रह का लोकार्पण

१५ अगस्त २०१० को कुतुबनुमा एवं श्रुति सँवाद समिति द्वारा आयोजित समारिह के अंतरगत श्रीमती देवी नागरानी के ग़ज़ल संग्रह “लौ दर्दे दिल की” का लोकार्पण मुंबई में १५ अगस्त २०१०, शाम ५ बजे, आर. डी. नैशनल कालेज के कॉन्फ्रेन्स हाल श्री आर.पी.शर्मा महर्षि की अध्यक्षता में पूर्ण भव्यता के साथ संपन्न हुआ. कार्य दो सत्रों में हुआ पहला विमोचन, दूसरा काव्य गोष्टी.

समारोह की शुरूवात में मुख़्य महमानों ने दीप प्रज्वलित किया और श्री  हरिशचंद्र ने सरस्वती वंदना की सुरमई प्रस्तुती की. अध्यक्षता का श्रेय श्री आर. पी शर्मा (पिंगलाचार्य) ने संभाला. मुख़्य महमान श्री नँदकिशोर नौटियाल (कार्याध्यक्ष-महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी एवं संपादक नूतन सवेरा), श्री इब्रहीम अशक (प्रसिद्ध गीतकार) जो किसी कारण न आ सके. श्री जलीस शेरवानी (लोकप्रिय साहित्यकार), “कुतुबनुमा” की संपादिका डा॰ राजम नटराजन पिलै रहे. देवी नागरानी जी ने सभी मुख़्य महमानों को पुष्प देकर सन्मान किया, जिसमें शामिल थे डा॰ गिरिजाशंकर त्रिवेदी, संतोश श्रीवास्तव, श्रीमती आशा व श्री गोपीचंद चुघ

आर पी शर्मा “महरिष” ने संग्रह का लोकार्पण किया और अपने वक्तव्य में यह ज़ाहिर किया कि साहित्यकार अपनी क़लम के माध्यम से लेखिनी द्वारा समाज को नई रोशनी देतने में सक्षम हैं. उसके पश्चात शास्त्रीय संगीतकार सुधीर मज़मूदार ने  देवी जी की एक ग़ज़ल गाकर श्रोताओं को मुग्ध कर दिया…

“रहे जो ज़िंदगी भर साथ ऐसा हमसफ़र देना

मिले चाहत को चाहत वो दुआओं में असर देना”

कुतुबनुमा की संपादक डा॰ राजाम नटराजन पिल्लै ने अपने वक्तव्य में लेखन कला पर अपने विचार प्रकट करते हुए देवी जी के व्यक्तित्व व उनकी अनुभूतियों की शालीनता पर अपने विचार प्रस्तुत किये और उनके इस प्रयास को भी सराहते हुए रचनात्मक योगदान के लिये शुभकामनाएं पेश की. जलीस शेरवानी जनाब ने “लौ दर्दे दिल की” गज़लों के चंद पसंददीदा शेर सुनाकर ग़ज़ल की बारीकियों का विस्तार से उल्लेख भी किया  और सिंधी समुदाय के योगदान का विवरण किया. नौटियाल जी ने आज़ादी के दिवस की शुभकामनायें देते हुए, देवी जी को इस संकलन के लिये बधाई व भकामनाएं दी.  

Murlidhar Pandey, Ratna Jha, Sagar Tripathi, Sangeeta Sahajwani

 देवी नागरानी ने अपनी बात रखते हुए सभी महमानों का धन्यवाद अता किया. आगे अपने विचार रखते हुए उन्होंने कहा “प्रवासी शब्द हमारी सोच में है. भारत के संस्कार, यहाँ की संस्क्रुति लेकर हम हिंदुस्तानी जहाँ भी जाते हैं वहीं एक मिनी भारत का निर्माण होता है जहाँ खड़े होकर हम अपने वतन की भाषा बोलते है, आज़ादी के दिवस पर वहां भी हिंदोस्तान का झँडा फहराते है, जन गन मन गाते है. हम भले ही वतन से दूर रहते हैं पर वतन हमसे दूर नहीं. हम हिंदोस्ताँ की संतान है, देश के वासी हैं, प्रवासी नहीं. ” और अपनी एक ग़ज़ल ला पाठ किया..

“पहचानता है यारो हमको जहान सारा

हिंदोस्ताँ के हम हैं, हिंदोस्ताँ हमारा.”

 पहले सत्र में संचालान का भार श्री अनंत श्रीमाली ने अपने ढंग से खूब निभाया . देवी जी ने पुष्प गुच्छ से उनका स्वागत करते हुए उनका धन्यवाद अता किया.

द्वतीय सत्र में संचालान की बागडौर अंजुमन संस्था के अध्यक्ष एवं प्रमुख शायर खन्ना मुज़फ्फ़रपुरी जी ने बड़ी ही रोचकतपूर्ण अंदाज़ से संभाली. और इस कार्य के और समारोह में वरिष्ट साहित्यकार व महमान थेः श्री सागर त्रिपाठी, श्री अरविंद राही, (अध्यक्ष‍ श्रुति संवाद साहित्य कला अकादमी), श्री गिरिजा शंजकर त्रिवेदी (नवनीत के पूर्व संपादक), श्री उमाकांत बाजपेयी, हारिराम चौधरी, राजश्री प्रोडक्शन के मालिक श्री राजकुमार बड़जातिया, संजीव निगम,  श्री मुस्तकीम मक्की (हुदा टाइम्स के संपादक)व जाने माने उर्दू के शायर श्री उबेद आज़म जिन्होंने इस शेर को बधाई स्वरूप पेश किया. …

अँधेरे ज़माने में बेइंतिहा है

बहुत काम आएगी लौ दर्दे-दिल की “..उब्बेद आज़म

सभी कवियों, कवित्रियों ने अपनी अपनी रचनात्मक अभिव्यक्तियों से समां बांधे रखा. कविता पाठ की सरिता में शामिल रहे श्री सागार त्रिपाठी जिन्होने अपने छंदो की सरिता की रौ में श्रोताओं को ख़ूब आनंद प्रदान किया. कड़ी से कड़ी जोड़ते रहे श्री अरविंद राही,  लक्ष्मण दुबे, श्री मुरलीधर पांडेय, शढ़ीक अब्बासी, देवी नागरानी,  श्री शिवदत्त अक्स, गीतकार कुमार शैलेंद्र, नंदकुमार व्यास, राजम पिल्लै, मरियम गज़ाला, रेखा किंगर, नीलिमा डुबे,  काविता गुप्ता, श्री राम प्यारे रघुवंशी, संजीव निगम,  संगीता सहजवाणी, शिवदत “अक्स”, कपिल कुमार,  सुष्मा सेनगुप्ता, और शील निगम, ज्यिति गजभिये.

श्रोताओं ने काव्य सुधा का पूर्ण आनंद लेते रहे श्री गिरीश जोशी, प्रमिला शर्मा,  प्रो॰ लखबीर वर्मा,  मेघा श्रीमाली, पं॰ महादेव मिश्रा, संतोष श्रीवास्तव, प्रमिला वर्मा, पंडित महादेव मिश्रा,  रवि रश्मि अनुभूति,  शिप्र वर्मा, राजेश विक्रांत, मुमताज़ खान, वी. न. ढोली, लक्ष्मी यादव, प्रकाश माखिजा, शकुंतला शर्मा, इकबाल मोम राजस्तानी, श्याम कुमार श्याम, सतीश शुक्ल,  सिकंदर हयात खान, अमर ककड़, विभा पांडेय, शिल्पा सोनटके, अमर मंजाल, कान्ता, लक्ष्मी सिंह, रत्ना झा, गोपीचंद चुघ,  आशा चुघ, संगीता सहजवानी, प्रो॰ शोभा बंभवानी,  देवीदास व लता सजनानी, गिरीश जोशी. करनानी जी, कवि कुलवंत. त्रिलोचन अरोड़ा,  नंदलाल थापर, श्रीमती किरण जोशी, सोफिया सिद्दिकी, रजनिश दुबे और सुनील शुक्ला. सुर सरिता का अंतिम चरण शुक्रगुज़ारी के साथ समाप्त हुआ. आज़ादी का जश्न खुशियों के परचम हर चहरे पर फहराता रहा..समाप्ति एक शुभ आरंभ है. जयहिंद..

Lokarpan-Apne hi Ghar Mein

18. Vimochan-Apne hi Ghar mein

On 17th Dec, 2015 Sri Sindhi Guru Sangat Sabha Association in Hyderabad organised a felicitation and book release function of Devi Nangrani’s translation story book titled ”Apne hi Ghar Mein” The book was released by Shri Shankardas Bolaki, himself a well known poet, the former president of Hyderabad Darbar.

On the occassion Devi Nagrani was presented with momento by The vice president Shri Jagdish Santdasani, and a shawl was presented by Shri Gurucharan Bhavnani and Smt Ganga Bhavnani. The evening was conducted by Smt Sunita Lulla, former principal of Sadhu Vaswani High School, and a well known poetess in her own right in Hindi,Sindhi.Urdu and English. Along with the book release a ”Kavya-Goshti ‘ too was organized. where a number of poets from the city presented their poems. some of them are Smt Vinita Sharma, Smt Elizabeth Kurian Mona, Smt Ratnakala Mishra, Shri Govind Akshay(edior-Golconda Darpan) ,Shri Durga Prasad ,Shri Chandra Kant Khandekar, Shri Kunj Bihari Gupta ,Smt Kumudbala Mukherji and Smt Sunita Lulla. The star of the evening Smt Devi Nagrani recited few of her Sindhi poems and Ghazals in her inimitable soft and soothing voice. The sindhis poetry presented was well welcomed and made the evening to remember for a long time to come. Among the sindhis there were Shri Jaikishan shri Prakash Bolaki , Mrs. Ashok Vaswani , Smt Karuna Matta, Shri Bhagwandas Thadani, Shri Govind Bachani and a few more from the city. The evening ended with snacks and tea.

काव्य संग्रह ‘एक थका हुआ सच’ का लोकार्पण

विश्व हिंदी दिवस के अवसर पर एक दिवसीय वैश्विक हिन्दी संगोष्ठी एवं सम्मान समारोह

देवी नागरानी के अनूदित काव्य संग्रह ‘एक थका हुआ सच’ का लोकार्पण

9h Jan-2016 KC College  (3)

कॉलेज की प्रधानाचार्य श्रीमाइ मंजु निचानी दीप प्रज्वलित कराते हुए…

इस अवसर पर वैश्विक हिंदी सम्मलेनद्वारा हिन्दी भाषा व साहित्य के प्रचार और प्रसार के लिए इंग्लैंड में रह रहे यू. के. के कथाकार टेजेंद्र शर्मा ने अपने विचार रखे। अब प्रवासी सीधे वहाँ के समाज में घुल-मिल रहे हैं और अपनी स्थितियों को खुलकर कहानियों, कविताओं के माध्यम से अभिव्यक्त कर रहे हैं। यू. के. की साहित्यकार और लेखनीकी संपादकश्रीमती शैल अग्रवाल का सम्मान किया गया । यह सम्मान प्रत्येक वर्ष प्रवासी भारतीय रचनाकार को प्रदान किया जाता है । श्रीमती शैल अग्रवाल ने इस सम्मान के प्रति आभार व्यक्त करते हुए  कहा एक अकेले हिंदी और भारतीय भाषाओं की लड़ाई लड़ रहे डॉ. एम. एल. गुप्ता आदित्यको मैं यह कहने के लिए यहाँ आई हूँ कि इस कार्य में मैं भी उनके साथ हूँ ।उन्होंने  समर्थन के लिए अपने उद्गार, अनुभव एवं संवेदनाओं को उजागर किया तथा स्पष्ट किया कि मैंने जीवन में सदैव सहज बने रहने में ही जीवन की सार्थकता तलाशी हूँ, मैंने कभी राजनीति या चालाकी से काम नहीं लिया और यह सम्मान शायद उसी की बदौलत हो।

         9h Jan-2016 KC College  (9)

(  देवी नागरानी (अमेरिका) की पुस्तक का विमोचन-चित्र में  प्रो. एस. पी दुबे, एम.एल.गुप्त आदित्य, प्रो. माधुरी छेड़ा, टेजेंद्र शर्मा, देवी नागरानी, डॉ. सुमन जैन, मंजुला देसाई, व शैल अग्रवाल)

इसी सत्र में डॉ. एम.एल.गुप्ता आदित्यने कहा कि हिंदी के वैश्विकरण का वास्तविक श्रेय सोशल मीडिया को जाता है,जिसके चलते विश्वभर में हिंदी का प्रसार हुआ है। सत्याग्रहसंस्था के अध्यक्ष माणिक मुंडे ने हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के प्रति चिंता जताते हुए भाषा के क्षरण की स्थिति से अवगत करवाया  और इसके लिए विभिन्न स्तरों पर कार्य किए जाने की आवश्यकता पर जोर दिया और कहा कि सत्याग्रहवैश्विक हिंदी सम्मेलन के साथ मिलकर इस कार्य को आगे बढ़ाएगा ।कराची पाकिस्तान की मूल सिंधी भाषा की लेखिका अतिया दाऊद की कविताओं का श्रीमती देवी नागरानी द्वारा सिंधी भाषा से हिंदी में अनुवादित पुस्तक ‘एक थका हुआ सचका भी विमोचन इस कार्यक्रम में किया गया। इस सत्र का संचालन के. सी. महाविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ. शीतलाप्रसाद दुबे ने किया।

 

9h Jan-2016 KC College  (4)

मौजूद हस्ताक्षर मेहमान रहे श्रीमती शील निगम, साहित्यकार शैल अग्रवाल ( इंग्लैंड), , कथाकार तजेन्द्र शर्मा, प्रो. एस. पी दुबे, एम.एल.गुप्त आदित्य, पत्रकार संजय सिंह, साहित्यकार माणिक मुंडे, ऑस्ट्रेलिया से आई विशेष अतिथि और प्रवासी साहित्य के वक्ता के रूप में श्रीमती शील निगम, एस.एन.डी.टी. विश्वविद्यालय की पूर्व आचार्या और हिन्दी विभागाध्यक्षा श्रीमती डॉ. माधुरी छेड़ा, कथाकार मधु अरोड़ा, श्रीमती शील निगम, के.जे. सोमैया महाविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ. सतीश पाण्डेय, डॉ. उमेश शुक्ल, जी टी.वी. के रिपोर्टर संजय सिंह, माटुंगा-मुम्बई के हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ. प्रवीण चन्द्र बिष्ट, महुआचैनल के मुख्य कार्यकारी अधिकारी राघवेश अस्थाना, इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स फॉर अफरमेटिव एक्शन के अध्यक्ष, सुनील ज़ो़ेडे  विशेष रूप से उपस्थित थे। आयोजन की सफलता का श्रेय के.सी.महाविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ. शीतलाप्रसाद दुबे, हिंदी के महाप्रहरी डॉ. एम. एल. गुप्ता, पत्रकार अजीत कुमार राय, डॉ. कामिनी गुप्ता को जाता है ।

 

 

9h Jan-2016 KC College  (5)

jayhind

सिविल-नागरिक संबंध अंतर राष्ट्रीय संगोष्टी -Kerala

भारतीय साहित्य में सिविल-नागरिक संबंध  अंतर राष्ट्रीय संगोष्टी

 आयोजन  हिंदी विभाग एम्.इ.एस अस्माबी कोलेज, , यु.जी.सी , युगमानस एवं रीडर्स फॉर्म

 2015-sept kerala

       (सरस्वती वंदना करते हुए एम्.इ.एस अस्माबी कोलेज के प्राचार्य डॉ .के.शाजी के  अद्ध्यक्षता में संगोष्टी  का उदघाटन एम्.इ.एस केरल के सेन्ट्रल  कोलेज कम्मट्टी चेयरमान प्रोफसर कडवनाड, मेहमानों में गीताश्री, अल्का धनपत, देवी नागरानी, श्री गंगाप्रसाद विमल, डॉ. जयशंकर बाबू, डॉ. भीम सिंह.)

         एम्.इ.एस  अस्माबी कोलेज के हिंदी विभाग यु.जी.सी ,युगमानस और रीडर्स फॉर्म के  संयुक्त त्वावधान में दो दिवसीय अंतर राष्ट्रीय संगोष्टी का आयोजन २०१५,सितम्बर  १८ और १९  को कोलेज के सभागार में किया गया .एम्.इ.एस अस्माबी कोलेज के प्राचार्य डॉ .के.शाजी के  अद्ध्यक्षता में संगोष्टी  का उदघाटन एम्.इ.एस केरल के सेन्ट्रल  कोलेज कम्मट्टी चेयरमान प्रोफसर कडवनाड जी ने किया. उदघाटन भाषण में उन्होंने कहा चुनौती पूर्ण क्षेत्रों में काम कर रहे सैनिकों के बारे में और सामान्य लोग और सैनिक के  रिश्ता के बारे में विचार  करना समय की मांग है  

       संगोष्टी में बीज भाषण जवाहर लाल नेहरु विश्व विद्यालय के भूतपूर्व आचार्य एवं केन्द्रीय हिंदी निदेशालय के भूतपूर्व निदेशक प्रोफसर गंगाप्रसाद विमल जी ने किया था . उन्होंने हिन्दी  साहित्य में पहली बार ऐसी विधा यानी सैनिक विमर्श पर चर्चा करने हेतु हिंदी विभाग के अद्ध्यक्ष डॉ.रंजित  और डॉ .सूर्या को बधाई दी . हिंदी भाषा हमें संप्रेषण की  क्षमता देती है . विभिन्न भारतीय भाषाओं में जो लिखी जाती है ,वही  भारतीय साहित्य कहा जाता है .सेना और नागरिक का रिश्ता आदिकाल से ही भारतीय साहित्य में चित्रित  हुआ  है .रामायण ,महाभारत जैसे ग्रन्थों में भी इसका ज़िक्र मिलता है . उनमें सैनिक धर्म का मार्मिक वर्णन अन्यत्र दर्शनीय है .उनमें  जो घटनाओं के बारे में जिक्र किया गया है, वह  सब भारत वर्ष की एकता और संस्कृति के  परिचायक थे . समकालीन युग में विज्ञान के सहारे नए नए आविष्कार होते रहे  और युद्ध के क्षेत्र में ,सैनिकों के बीच ऐसी कोई  धर्म या  मूल्य नहीं रहे,जिनके कारण पुराने ज़माने में  नागरिक और सैनिकों के  बीच रिश्ता बढ़ जाते थे . पाकिस्तान के एक कवि के  “बम “नामक कविता के सहारे आपने यह साबित भी किया .उसमें एक बालक शासकों से पूछ रहे है  अपनी देश की  भलाई के लिए स्कूल ,अस्पताल जैसे  सार्वजनिक स्थान बनाने के बदले  बम क्यों बना  रहे है . ऐसी एक उपेक्षित विधा के बारे में अहिन्दी प्रदेश केरला के एक कोलेज में चर्चा हुयी  है.यह  स्न्तोषजनक   बात है .हिंदी के प्रति ,हिंदी भाषा के प्रति केरला के लोगों की  दिलचस्पी ही यहाँ व्यक्त हो रहे है .

 2015 sept lerala (6)

    विख्यात सिन्धी –हिंदी साहित्यकार एवं गीतकार  श्रीमती देवी नागरानी , मौरीशियस के महात्मा  गाँधी इंस्ट्टीटयूट के  प्राध्यापिका डॉ .अलका धनपत ,दिल्ली के विख्यात पत्रकार एवं लेखिका गीताश्री ,हैदराबाद केन्द्रीय विश्व विद्यालय के डॉ भीम सिंह ,पोंदिचीरी  केन्द्रीय  विश्विद्यालय के डॉ सी  जयशंकर बाबू , मुंगेल छतीसगढ  के  डॉ .चंद्रशेखर सिंह ,बिलासपुर के  डॉ.राजेश कुमार मानस ,असम के  मिन्हाज अली और शहीदुल इस्लाम ,डॉ सुप्रिया पी ,डॉ .सुमेष ,डॉ .प्रतिभा ,डॉ.के जयकृष्णन ,डॉ.डी.रोज़ अन्तो ,डॉ .प्रमोद कोव्वाप्रथ ,डॉ रंजित ,डॉ.सूर्या बोस, डॉ .जीनु ,श्रीमती लिजी,श्रीमती रेशमी ,कुमारी सरयू आदि आमंत्रित विशेषज्ञों के साथ साथ छात्र –छात्राएं ,विभिन्न विश्व विद्यालयों के शोध छात्र और कोलेजों के प्राध्यापक पधारे हुए थे.

    उदघाटन सत्र के बाद की पहली सत्र की अध्यक्षता विख्यात सिन्धी–हिंदी साहित्यकार एवं गीतकार श्रीमती देवी नागरानी जी ने की चश्मदीद गवाह  बन कर २००८ मुंबई महानगरी में ताज की शान में जो गुस्ताखियाँ देखी, उन्हें बयान करते हुए, उनके जान कुर्बान देने की भावना के मर्म को सामने लाया। उन शहीदों के बारे में भारतीय प्रवासी लेखक–लेखिकाओं नें जो लिखा ,वह उन्होंने  श्रोताओं  के सामने पेश किया। सैनिकों के प्रति ममता बढाने में और आनेवाले विशेषज्ञों को दिशा निर्देश देने में अद्ध्यक्षीय भाषण  सफल रहे. भारतीय सैनिकों की  कुर्बानी  के बारे में और उनके अर्पण मनोभाव के बारे आपने अपने विस्तृत भाषण में सूचनाएं दी .

            सत्र में  भाग लेते हुए डॉ.अलका धनपत जी ने मॉरिशियस और वहाँ की  संस्कृति के बारे में बताते हुए मॉरिशियस के राष्ट्र कवि ब्रजेन्द्र कुमार भगत मधुकर की रचनाओं के आधार पर युद्ध साहित्य पर अपनी विचार प्रकट की. बिना कोई तलवार लिए मौरिशियस  में लड़ायी कैसे हुयी ,अपनी संस्कृति कि रक्षा के लिए भावनात्मक स्तर पर कैसे लड़ायी चलाई इसकी जानकारी दे कर चर्चा को एक नयी मोड़  दी .  

               चर्चा में भाग लेती हुयी दिल्ली के वरिष्ट साहित्यकार एवं पत्रकार श्रीमती गीताश्री जी हिंदी साहित्य में सिविल सेना के संबंध का चित्रण  कैसे हो रहे है  इसका वर्णन  किया .सेना और समाज के बारे में बताते हुए ,एक दुसरे के पूरक ये  दो  तत्व क्यों अलग हो गए ,इसके बारे में भी आप अपनी राय प्रकट की .कारगिल युद्ध के बाद सेना और समाज का  रिश्ता और सुदृठ हो गया .सैनिक किस प्रकार जी रहे है, इसका जीता जागता चित्रण मीडिया हमें देते हैं  .यह सामाज और सेना को पास लाने में सहायक है  .जवानों कि कुर्बानियों की  कहानियाँ ,अपनी वतन की  रक्षा के लिए लड़ रहे जवानों को समाज में स्थान मिलने लगे .आधुनिक भारत के निर्माण में सैनिकों की  भूमिका और उनके योगदान को कमतर रूप में देखा गया है .इसके पीछे की राजनीती को अब लोग पहचानने लेगे है .चन्द्रधर  शर्मा गुलेरी जी की ‘ उसने कहा था ‘ कहानी से लेकर  हिंदी साहित्य में नागरिक जीवन कि समस्याओं को सैनिक कैसे देखते है ,सैनिकों की  समस्याओं को नागरिक कैसे देखते है  इसका चित्रण किया है .सेना और समाज के बीच की रिश्ता गढ़ने में कुछ विशेष क़ानून विशेष भूमिका निभा रही है . ऐसे विषयों  के बारे में ज़्यादा अध्ययन  होने की आवश्यकता पर बल देती   हुयी आप अपनी भाषण समाप्त की .

                उसके बाद आये  डॉ .के जयकृष्णन जी  ने सिविल सैनिक संबंध सिनिमा में कैसे हो रहे है इसके बारे में बाता दी  .साथ ही साथ उनहोंने भारतीय सेना और उनके कानूनों के बारे में भी विस्तृत रूप से चर्चा की .   

        हैदराबाद विशव  विद्यालय से आये डॉ भीम सिंह जी ने अपने भाषण में यह सवाल उठाया कि  क्या अपनी देश कि सभ्यता और संस्कृति की रक्षा के लिए सेना बल की  ज़रुरत है .हमारे देश की आमदनी से ढेर सारे सेना बल के लिए देना पड  रहे है.यह देश की भलायी के लिए  हित कर भी नहीं है .सेना का काम  युद्ध करना है .युद्ध कभी कभी किसी व्यक्ति के लिए करना पड़ता है ,देश के लिए नहीं .आज़ादी के बाद और पूर्व की  रचनाओं में सैनिक नागरिक रिश्ता किस प्रकार हुआ था इसका  चित्रण आपने किया.सैनिकों की  मनोदशा व्यक्त करनेवाला साहित्य  इसका जांच की आवश्यकता पर आपने बल दिया .

     2015 sept lerala (5) तीसरे सत्र की  अद्ध्यक्षता पांडिचेरी विश्व विद्यालय के हिंदी विभाग के साहयक आचार्य डॉ.सी.जयशंकर बाबू जी ने की। अद्ध्यक्षीय भाषण में उन्होंने ने कहा सेना शब्द  के साथ ही दो  अर्थ हमारे सामने आते हैं – एक युद्ध और दूसरा शान्ति. सेना और सिविल के बीच अच्छा  रिश्ता होना ही चाहिए . सत्र में पहला प्रपत्र एम्.इ.एस  नेडुमकंदम के डॉ.एस.सुमेष जी ने किया. उन्होंने   यह व्यक्त किया कि हमारे समय कि सबसे विकल परिस्थिति है युद्ध .हर युद्ध के बाद अपनी संस्कृति से बहिषकृत लोगों का पलायन और विस्थापन की  समस्या  आज बढ़ रहे है . दूरा प्रपत्र डॉ .जीनु जॉन  ने प्रस्तुत की ‘ सीधी  सच्ची  बातें ‘ उपन्यास के आधार पर युद्ध किस प्रकार समाज को प्रभावित करते है इसका विस्तृत अध्ययन  प्रस्तुत किया . ले.जनरल यशवंत मानदे की कहानियों को आधार बानकर  बनाए अपने प्रपत्र में डॉ सुप्रिया जी ने  यह सूचित किया कि सशस्त्र बलों के बारे में कम जानकारी होने के कारण  सेना और युद्ध से संबंधित कहानियाँ हिंदी में कम है .इस कमी  को कम करने में आपकी रचनाये एक हद तक सफल हुए है .अपने अपनी रचनाओं में युद्ध के समय से जुड़े पहलुओं को समकालीन हिंदी साहित्य के केंद्र में लाने की कोशिश की  है .सैनिक जीवन का जीता जागता चित्रण कैसे आपकी संग्रह में हुआ है  ,इसका  वर्णन सुप्रिया जी ने की .उसके  बाद आयी  डॉ.सूर्या बोस अल्पना मिश्र की  ‘ छावनी में बेघर ‘ नामक कहानी में किस प्रकार सैनिक की  पत्नी के मनोव्यवहार प्रस्तुत किया है इसका अध्ययन प्रस्तुत किया  .

 

         दुसरे  दिन का  पहला  सत्र  कालीकट विश्व विद्यालय के डॉ प्रमोद कोव्वाप्रत जी की अद्ध्याक्ष्ता में शुरू हुआ  . डॉ.सी .जयशंकर बाबू जी ने  मनीषा कुल श्रेष्ट की रचना  ‘शिगाफ ‘ में नागरिक –सेना संबंध  किस प्रकार  हुआ है इसका वर्णन किया .शिगाफ  की नायिका अमिता के ज़रिये  सिविल सैनिक संबंध के कई आयाम हमें देखने को मिल रहे है .समाज में शान्ति होने पर सेना की उपस्थिति की कोई ज़रुरत नहीं होती है .शान्ति भंग होने पर ,हाल पुलीस की  काबू से बाहर  जाने  पर सेना को आना पड़ेगा .शान्ति की स्थापना के लिए सेना कुछ भी करेंगे .यह सेना और नागरिक को अलग करने  का मूल कारण बन जाते है . 

            डॉ .चन्द्रशेखर सिंह जी ने हिंदी  काव्यों में किस प्रकार भारतीय सैनिकों के शौर्य ,श्रम तथा पराक्रम का वर्णन किया है ,इसका अद्ध्ययन  प्रस्तुत किया .उसके बाद बिलासपूर से आये  डॉ.राजेश कुमार मानस जी ने  ‘उसने कहा था’  कहानी , और ‘वापसी’ एकांकी में सैनिक जीवन के मार्मिक प्रसंग कैसे अंकित किया है इसका वर्णन किया. प्रदीप सौरभ जी की  ‘देश भीतर देश ‘उपन्यास में सिविल सैनिक  सम्बन्ध किस प्रकार आया है इसका वर्णन  कालीकट विश्व विद्यालय की  शोध छात्रा सरयू ने किया  .सिविल सैनिक सम्बन्ध अटूट होने पर ही देश की  प्रगती हो पाएगी ,यह मत उसने आगे रखी .एरनाकुलम  महाराजास कोलेज की  प्राध्यापिका डॉ.सिंधु  जी ने अपने  प्रपत्र में सिविल सैनिक संबंध का मनोरम चित्र अभिव्यक्त किया  .-ईरान का युद्ध क्षेत्र जहां फवारे लहू रोते है नामक अपने प्रपत्र में एर्नाकुलम महाराजस कोलेज के डॉ.प्रणीता जी ने  बतायी फ़ौजी जीवन किसी तपस्या से कम नहीं है .” जहां फवारे लहू रोते है’  नासिरा शर्मा जी कि यात्रा वृत्तांत है ,इसमें युद्ध किसका और किस विषय में  का मनन किया गया है. पटटम्बी  संस्कृत  कोलेज के डॉ.प्रतिभा जी ने दिनकर  की   रचनाओं में युद्ध का वर्णन  कैसे हुआ है इसका अद्ध्यायन  प्रस्तुत किया  . एम्.इ.एस अस्माबी कोलेज की  रश्मि जी ने अपने प्रपत्र में यह साबित किया कि सैनिक सबसे पहले अपने देश के बारे में ही चिंता करते है ,भारतीय सैनकों के महत्व के बारे में भी अपने सूचना दी . श्रीमती लिजी ने मलयालम साहित्यकार  कोविलन की रचनाओं में सैनिक जीवन का चित्रण कैसे हुआ है का मनोरम वर्णन  प्रस्तुत किया . सेंत.जोस्फ्स कोलज ,इरिन्जलकूड़ा के डॉ.सी.रोज़  आंतो जी  कोर्ट मार्शल नामक नाटक में चित्रित सैनिक समस्याओं पर  विचार प्रकट किया  . एम्.इ.एस अस्माबी कोलेज के इतिहास विभाग  के अद्ध्यक्ष  मुहम्मद नासर जी  ने Armed forces special power act  के बारे में और उसके कारण सामज में हुए नौबतों के बारे में जानकारी प्रदान की . आसाम राज्य से  आये मिन्हाज  अली ने डॉ सी.जयशंकर बाबू जी की ‘एक सैनिक की  इच्छा ‘ कवीता में सैनिक नागरिक संबंधों कि परिकल्पना कैसे किया गया है,इसका वर्णन किया .देश व देश के नागरिकों के प्रति एक सैनिक का विचार इसमें उनहोंने प्रस्तुत किया .

            बधाई एवं शुभकमनाएँ। जयहिंद

Lokarpan-Barf Ki Garmaish

दो दिवसीय सेमिनार “सिंधी साहित्य में लेखिकाओं का किरदार” के दौरान देवी नागरानी के लघुकथा संग्रह का लोकार्पण …

Vimochan-Jaipur-Barf

राष्ट्रीय सिंधी भाषा विकास परिषद, नई दिल्ली की ओर से आयोजित दो दिवसीय सेमिनार “सिंधी साहित्य में लेखिकाओं का किरदार” 26-27 सितंबर 2015, माया इंटरनेशनल होटल जयपुर में सफलता पूर्ण रूप से सम्पन्न हुआ।
लेखिका देवी नागरानी के हिन्दी से सिंधी अनूदित लघुकथा संग्रह “ बर्फ की गरमाइश” का लोकार्पण शिक्षा राज्य मंत्री प्रो. वसुदेव देवनानी, प्रदेशाध्यक्ष श्री अशोक परनामी, और सांसद लोकसभा श्री रामचरण बोहरा ने किया और डॉ. एस. एस. अग्रवाल, राष्ट्रीय अध्यक्ष, इंडियन मेडिकल असोशिएशन, के हाथों सम्पन्न हुआ। साथ में मौजूद थे परिषद के निदेशक रवि टेकचंदानी, उपाध्यक्ष श्रीमति अरुणा जेठवानी, पूर्व अध्यक्ष व संयोजक डॉ. भगवान अटलानी, समन्वयक श्री रमेश गुरुसहानी।
सभाग्रह में मौजूद थे सिंधी समाज के दस्तावेजी हस्ताक्षर व परिषद के सम्माननीय हीरो ठाकुर, गोवर्धन शर्मा घायल, हरीश देवनानी, श्री कमलेश मूरजानी, श्रीमति अंजलि वाधवानी, डॉ. कमला गोकलानी, इन्दिरा शबनम, श्रीमति रशिम रामानी, लीला कृपलानी, वीणा शिरंगी, शलिनी सागर, डॉ. निर्मला आसनानी, श्रीमती रोमा जयसिंघानी, श्रीमति कौशल्या आहूजा, डॉ. संध्या कुंदनानी, श्रीमती आशा चाँद, डॉ। उषा सरस्वत, डॉ. विम्मी सदारंगानी, श्रीमती शोभा ला लचंदानी, श्रीमती बरखा खुशालानी, श्रीमती कमला भूटानी। व इस अधिवेशन को सफलता प्रदान करने वाले गण श्री रमेश गुरसहानी, श्रीमती अंजलि पंजवानी, संगीता गुरुसहानी, राजकुमारी करनानी, पूजा चाँदवानी, गीतांजलि आईलानी, कुमारी गायत्री, मोहन नानकानी, मनु रावतानी, हरीश करमचंदानी, अशोक वाधवानी, मुकेश इसरानी, सतीश भाटिया, पीयूशा लीलरामनी, हेमंत खटवानी, व अन्य सदस्य।
दो दिवसीय इस समारोह में सिन्धी साहित्य की लेखिकाओं के साहित्य में योगदान और नारी विमर्श में मोक्ष के द्वार खोने की संभावनाओं पर चर्चा हुई।

Roohani Raah-Vimochan In Poona-2014

photo14. Roohani

रूहानी रूह जा पांधीअड़ा’- काव्य संग्रह का विमोचन

दिनांक-रविवार 14 सितम्बर 2014 हिन्दी दिवस के शुभ अवसर पर सीता सिंधु भवन, सांताक्रूज, मुम्बई के एक भव्य समारोह में सुश्री देवी नागरानी के अनुदित काव्य संग्रह “‘रूहानी रूह जा पांधीअड़ा’ का लोकार्पण संपन्न हुआ। मंच पर सन्माननीय हस्ताक्षर जिनके हाथों विमोचन सम्पन्न हुआ वे रहे : श्रीमती पारु चावला, प्रमुख मेहमान श्री महेश चंदर , हमारे सिंधी के सिरमोर गुलोकार , सम्माननीय श्री जयराम रूपणी, हिंदवासी की प्रधान संपादिका शोभा ललचंदनी, देवी नगरानी और गीता बिंदरानी जी।

देवी नागरानी के इस अनुदित काव्य संग्रह में 50 अलग-अलग प्रान्तों के प्रबुध लेखकों की कविताओं का हिन्दी से सिंधी में अनुवाद हुआ है। अनेक प्रान्तों से स्थापित कवि व राष्ट्रकवि कुसुमाग्रज, विष्णु प्रभाकर, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, कुसुम अंसल…..! पुस्तक का स्वरूप देवनागरी लिपि में है, जो नव पीढ़ी को मधे-नज़र रखते हुए किया गया है।

पद्मश्री प्रो॰ राम पंजवानी जी की स्थापित यह संस्था ‘सीता सिंधु भवन’ पिछले 25 बरसों से सिद्धस्त साहित्यकार व सिंधी समाज के सम्माननीय दस्तावेज़ स्वर्गीय श्री ठाकुर चावला एवं उनकी पत्नी श्रीमति पारु चावला जी के निष्ठापूरक प्रयासों से चलाते आए। अब परंपरा बरकरार रखने के अथक प्रयास कर रहे हैं परिवार के सदस्य—उनकी सुपुत्रियाँ, नातिन अमृता। इस आंगन में सिन्धी साहित्य, संस्कृति एवं संगीत का संगम प्रत्यक्ष सामने आता है। यह उनके अनवरत अथक निष्ठा का नतीजा है जो आज हिन्द में भी सिन्ध की गूँज सुनाई देती है। संचालिका अमृता जी ने देवी जी के साहित्य सफ़र की बात करते हुए इस बात का खुलासा किया किया की अनुवाद सिन्ध और हिन्द के बीच का एक सेतु बनकर एक पुख्ता पल बन रहा है। भाषा की टहनियों पर प्रांत प्रांत के परिंदे आश्रय प रहे है, जो अपने आप में एक मुबारक क़दम है। यह देवी जी की अपनी लगन और मेहनत का प्रतिफल है।  जयहिंद

 

 

शाह अब्दुल लतीफ़ सेमिनार-दिल्ली में

 

Nazir Naaz, Janab Ghulam Ali Morai, Devi, Veena shirangi, Dr. Murlidhar jetley,

  Nazir Naaz, Janab Ghulam Ali Morai, Devi, Veena shirangi, Dr. Murlidhar jetley

शाह अब्दुल लतीफ़ सेमिनार-दिल्ली में सम्पन्न

16-17-18- दिसंबर -2014, दिल्ली में ‘मारुई’ संस्था की ओर से आयोजित शाह अब्दुल लतीफ़ पर छट्टा अंतराष्ट्रीय सेमिनार सम्पन्न हुआ। यह कार्यक्रम YMCA Tourist Hostel, ke  और ICC Conference Room में हुआ।  तारीख़ 16, दिसम्बर को उदघाटन समारोह के मुख्य मेहमान लोकसभा सदस्य सत्यापलसिंह, सादर भूतपूर्व एम्बेसेडर अर्जुन आसरानी एवं खास मेहमान मशहूर गायिका पद्मश्री शांति हीरानंद की उपस्थिती में हुआ। कार्यक्रम के आगाज में दीप प्रज्वलन व सरस्वती वंदना की परंपरा निभाई गई। उसी शाम संगीत से सजी महफिल में शाह के कलाम व अन्य सिंधी गीतों की बौछार से सभग्राह को अपनी आवाज़ से भावविभोर किया उमा लाला, पद्मा गिदवाणी, सरोजिनी कुमार, नीतू मटाई, रेने मिराजा, तेजा भाटिया, राजेन्द्रकुमार, लजा भाटिया व मनोहर करुणा, पंकज जेसवानी जी ने। प्रोग्राम का सिलसिलेवार संचालन किया वीणा शिरंगी व शालिनी सागर ने।Maruee-2

17 दिसम्बर को सिंध पाकिस्तान से आए डॉ. सुलेमान शेख़ व उनके साथ आए 14 लेखकों व शायरों ने इस सेमिनार में शिरकत की। उनमें मुख्य सम्मानित अतिथि रहे जनाब ग़ुलाम अली मोराई, एजाज़ अहमद कुरेशी, अमानुल्लाह शेख़, जावेद अहमद शेख़, डॉ. महरूलिनिसा लारिक, बेनिश साजिद, डॉ. मुमताज़ भुटो, नाज़िर नाज़, सुरेश कुमार वाधवानी, जन्नत जान, महक अली, आमिन लाखो, नसीम अख़्तर जलबानी सिंध से और भारत के हर प्रांत से शिरकत करने वालों की तादाद में थे दिल्ली अकादेमी के वाइस चेरमेन डॉ॰ मुरलीधर जेटले, इस कार्यक्रम की हर्ता-कर्ता वीना शिरंगी, शलिनी सागर, गोवेर्धन शर्मा घायल, भगवान अटलानी, अर्जुन चावला, खेमन मुलानी, लक्ष्मण दुबे, इंदिरा पूनवाला, देवी नागरानी, शोभा लालचंदनी, सिंधु बरखा खुशालानी, डॉ. विनोद आसूदनी, लछमनदास केसवानी, नारी लच्छवानी, बलू चोइथानी, भारती केवलरामानी, हरी हिमथानी, मोहन हिमथानी, रवि प्रकाश टेकचंदानी, शमीम अहमद।All Lekhak

सिंध से आए लेखकों ने शाह लतीफ के संदर्भ में अपने अपने प्रपत्र पेश किए। इस सत्र की अध्यक्षता की डॉ. सुलेमान शेख़ ने, ग़ुलाम नबी मोराई, एजाज़ अहमद कुरेशी, अर्जन चावला एवं भगवान अटलानी ने की।

दुपहर को भोजन के उपरांत सत्र में सिंध और हिन्द के लेखकों के पुस्तकों के विमोचन हुए, जिसमें वीना शिरंगी की दो पुस्तकों का विमोचन हुआ-Silent Path, और पखा ऐं पवार-डिठे मूँ डींह थ्या,  एवम देवी नागरानी की सिंध के कहानिकारों की कहानियों का हिन्दी में अनुदित संग्रह “पंद्रह सिंधी कहानियाँ” का विमोचन दिल्ली अकादेमी के वाइस चेरमेन डॉ॰ मुरलीधर जेटले, जनाब ग़ुलाम अली मोराई (CEO Mehraan T. V , Hyderabad Sindh) वीना शिरंगी, व देवी नागरानी, मोहतरमा नाज़िर नाज़ के हाथों से हुआ। उसी शाम एक काव्य गोष्टी का आयोजन भी हुआ, जहां काव्य पाठ की सरिता बहती रही।      DSCN5828

18 तारीख़ समर्पण की ओर बढ़ते हुए, कुछ प्रपत्र पढ़े गए और आए कविगन का सम्मान हुआ। गोवेर्धन शर्मा घायल ने बड़ी ही तेजस्वी ढंग से दो दिनों के कार्यक्रम की रूपरेखा को दारपेश किया। इस संस्था के सहकार में जुड़े सभी सदस्य मौजूद थे- रेनी मिराजा कुमार, राजेंद्र कुमार, मोहन गुरबानी, श्री मनोहर करणा, रमेश लाल, धीरज कुमार, डॉ. बलदेव आनंद कुमार, प्रो. सादिक़, प्रोमिला शर्मा, सीमा शिरंगी, प्रो. सान्या, श्रीमती सादिक़, शोभा शिरंगी, दीक्षा एवं सिद्धार्थ शिरंगी …अन्य…! कैमेरामेन राजकुमार रिझवानी एवं रतन पाहुजा ने अपने कैमरा से सभी कोणों से सभा में मौजूद हर एक अदीब को क़ैद करते हुए अपने कार्य को बखूबी अंजाम दिया। एक शानदार व यादगार सेमिनार जहाँ हिन्द-सिंध के सिंधी साहित्यकारों की मिली- जुली एक धारा संगठित रूप में साहित्य के सरोवर में घुल मिल गई। जयहिंद।

साहित्यकारों की काव्य गोष्टी…

Shaad B Group दिनांक मंगलवार 9 दिसम्बर २०१४ , मुंबई बांद्रा  में देवी नागरानी जी के निवास स्थान पर कर्नाटक से पधारे जाने माने अदीब शायर, अनुवादक एवं समीक्षक श्री शाद भागलकोटी जी के सम्मान में गोष्टी का आयोजन हुआ। वे इस शाम की महफिल के मुख्य महमान रहे। श्री महावीर प्रसाद अग्रवाल (नेवटिया) की अध्यक्षता, व मुख्य महमानों की हाज़िरी में काव्य सरिता, गीत ग़ज़लों, हास्य रस की मिली जुली महक से भरपूर गोष्टी सम्पन्न हुई, जिसके संचलन की डोर इस बार थामी कुमार जैन ने। एक सद्भावना भरे साहित्य का का माहौल रहा।

इस गोष्टी में शामिल अंजुमन संस्था के अध्यक्ष एवं प्रमुख शायर खन्ना मुजफ्फरपुरी, दोहकार वनमाली चतुर्वेदी, श्री महावीर प्रसाद अग्रवाल, ग़ज़ल को अलग ऊँचाइयाँ दे रही शायरा हेमा दासानी, उर्दू की ग़जालकारा नईमा इम्तियाज़, सुषमा सेनगुप्ता, नज़मा, कुमार जैन, दिनेश मिश्र बैसवारी एवं रहीम भाई शामिल रहे उन्होने अपनी रचनाओं का रसवादन करवाया। डॉ. संगीता सहजवानी ने इस बार अपनी लम्बी कविता का पाठ करके वाह वाह बटोरी। देवी जी ने एक गीत-ग़ज़ल का पाठ किया। कुमार जैन ने इस शाम को अपने खास अंदाज़ व शैली में संचालन किया और बेशुमार शेरों से फिज़ाओं को महका दिया। सुरमई शाम सभी रंगों को समेटते हुए सम्पन्न हुई। जयहिंद

विश्व हिन्दी सेवा सम्मान v “सिंधी कहानियाँ“ का लोकार्पण

दिनांक 15, 16 नवम्बर 2014 लखनऊ में अखिल भारतीय मंचीय कवि पीठ-उत्तर प्रदेश की ओर से आयोजित दो दिवसीय अंतराष्ट्रीय हिन्दी कविता समारोह-2014, विश्वेश्वरैया सभागार, लखनऊ में सम्पन्न हुआ। इन दो दिनों में उदघाटन, लोकार्पण, सम्मान एवं कवि सम्मेलन में देस-विदेस से पधारे कवि-गण, व भारत के अनेक शहरों से जाने माने कविवर, गज़लकार, साहित्यकार, पत्रकार भी उपस्थित रहे।L-Samman दिनांक 15, नवम्बर 2014 विश्व हिन्दी सेवा सम्मान से नवाज़ा गया   सम्माननीय अध्यक्ष श्री राम नाइक-माननीय राज्यपाल जी,  मुख्य अतिथि श्री शिवपाल सिंह यादव- मा॰ मंत्री, उ॰ प्र॰ सरकार, विशिष्ट अतिथि श्री राम नरेश यादव (पूर्व सचिव स ॰ वि॰ प॰ उ॰ प्र॰) सरस्वती शिखर अलंकरण-वरिष्ठ कवि श्री उदय प्रताप सिंह (लखनऊ), का॰ अध्यक्ष, उ॰ प्र॰ हिन्दी संस्थान, डॉ. जया वर्मा (नाटिंगम), मंचासीन अनुभूतियों की उपस्थिती में देवी नागरानी जी को विश्व हिन्दी सेवा सम्मान से नवाजा गया। अटलांटा की विदूषी साहित्यकारा डॉ. मृदुल कीर्ति की ओर से भी यह सम्मान देवी जी ने  विश्वेश्वरैया सभागार में ग्रहण किया।

Sindhi Kahaniyaan-Vimochan दिनांक 16 नवम्बर 2014  देवी नागरानी के कहानी-संग्रह “सिंधी कहानियाँ“ का लोकार्पण इस भव्य साहित्यिक समारोह के दौरान डॉ. देवी नागरानी जे के सिन्धी से हिन्दी में अनूदित कहानी-संग्रह “सिंधी कहानियाँ“ का लोकार्पण श्री माता प्रसाद पाण्डेय, मा॰ अध्यक्ष, उ. प्रदेश, श्रद्धेय श्री केशरी नाथ त्रिपाठी-माननीय राज्यपाल, पश्चिम बंगाल, डॉ. दिनेश शर्मा, महापौर लखनऊ, श्री सुधीर हलवासिया, डॉ. विष्णु सक्सेना, व समिति के संयोजक डॉ. नरेश कत्यायन के हाथों सम्पन्न हुआ।

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सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधि हस्तियों की उपस्थिती में एक अंतराशतीय मुशाइरा भी संपन्न हुआ जिसमें भागीदारी ली -सर्वश्री उदय प्रताप सिंह(लखनऊ), डॉ. दाऊजी गुप्त(लखनऊ), डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र (देहारादून), डॉ. नरेश कात्यायन (लखनऊ), डॉ. देवी नागरानी (न्यू जर्सी), डॉ. विष्णु सक्सेना (सिकंदराराऊ), डॉ. हेमराज सुंदर (मरीशस), श्रीमति सविता देवी रघुनाथ (मारिशस), डॉ. गंगाप्रसाद शर्मा (चीन), पवन बाथम (कायमगंज), महावीर प्रसाद नेवटिया (मुंबई),  रेखा गुप्ता(चेन्नई),  डॉ. वेद पकश वटुक (कैलिफोर्निया), डॉ. मंजु मिश्रा, (कैलिफोर्निया), डॉ. शकुंतला बहादुर (कैलिफोर्निया), डॉ. जया वर्मा (नाटिंगम),फारूक सरल (लखीमपुर), प्रो. सुमेर सिंह शैलेश(सतना), डॉ.डंडा लखनवी(लखनऊ ), बनज कुमार बनज(जयपुर), श्री यशवंत सिंह शेखावत, मदनरजा मौर्य(लखनऊ), डॉ. अनिल चौबे (वारणासी), लताश्री( मथुरा), कमलेश शर्मा (इटावा), सुधीर निगम(कानपुर) अंतराष्ट्रीय हिन्दी कवि सम्मेलन में भागीदारी करने वाले कविगण थे डॉ. कमलेश द्विवेदी (कानपुर) ने काव्य पाठ का एवं संचालन का भार दोनों सत्रों में बहुत ही संजीदगी से निभाया। जयहिंद

समकालीन साहित्य की चुनौतियाँ

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समकालीन साहित्य की चुनौतियाँ : एक चर्चा

  • डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा इन चुनौतियों से जुड़े विविध पहलुओं पर विचार करने के लिए गत 30-31 अक्टूबर 2014 को कर्नाटक विश्वविद्यालय (धारवाड़), अयोध्या शोध संस्थान (अयोध्या) और साहित्यिक सांस्कृतिक शोध संस्था (उल्हासनगर) के संयुक्त तत्वावधान में धारवाड में ‘समकालीन हिंदी साहित्य की चुनौतियाँ’ विषयक द्विदिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया. उद्घाटन सत्र की मुख्य अतिथि अमेरिका से पधारी देवी नागरानी थीं. विशिष्ट अतिथियों में डॉ. विनय कुमार (हिंदी विभागाध्यक्ष, गया कॉलेज), डॉ. योगेंद्र प्रताप सिंह (निदेशक, अयोध्या शोध संस्थान, अयोध्या), डॉ. प्रदीप कुमार सिंह (सचिव, साहित्यिक सांस्कृतिक शोध संस्था, उल्हासनगर), डॉ. राम आह्लाद चौधरी (पूर्व अध्यक्ष, हिंदी विभाग, कोलकाता), डॉ. प्रभा भट्ट (अध्यक्ष, हिंदी विभाग, कर्नाटक विश्वविद्यालय), डॉ. एस. के. पवार (कर्नाटक विश्वविद्यालय) और डॉ. बी. एम. मद्री (कर्नाटक विश्वविद्यालय) शामिल थे. साहित्य को अंधेरा चीरने वाला प्रकाश बताते हुए डॉ. राम अह्लाद चौधरी ने कहा कि ‘आज प्रतिकूल परिस्थितियों को अनुकूल बनाने की चुनौती साहित्यकारों के समक्ष है. भारतीय साहित्य में इतिहास, दर्शन और परंपरा का संगम होता है. लेकिन आज के साहित्य में यह संगम सिकुड़ता जा रहा है. समाकीलन साहित्य के सामने एक और खतरा है अभिव्यक्ति का खतरा. गंभीरता और जिम्मेदारी पर आज प्रश्न चिह्न लग रहा है क्योंकि सही मायने में साहित्य के अंतर्गत लोकतंत्र का विस्तार नहीं हो रहा है. हाशियाकृत समाजों को केंद्र में लाना भी आज के साहित्य के समक्ष चुनौती का कार्य है. आलोचना के अंतर्गत भी गुटबाजी चल रही है. आलोचना पद्धति के मानदंड को बदलना आवश्यक है. साहित्य का कारपोरेटीकरण हो रहा है. सौंदर्य और प्रेम साहित्य के बुनियाद हैं. साहित्य को प्रवृत्तिमूलक दृष्टिकोण से देखना अनुचित है. जब तक उसके स्रोत तक नहीं पहुँचेंगे तब तक सिर्फ प्रवृत्ति के आगे चक्कर लगाते ही रहेंगे. साहित्य हाथ छुड़ाने का काम नहीं बल्कि हाथ थामने का काम करता है. एक दूसरे को जोड़ने काम करता है.’ डॉ. ऋषभदेव शर्मा (हैदराबाद) ने कहा कि समकालीन कविता की चुनौतियों को यदि समझना हो तो पंकज राग की कविता ‘यह भूमंडल की रात है’ को देखा जा सकता है क्योंकि भूमंडलीकरण/ भूमंडीकरण आज की सबसे बड़ी चुनौती है. उन्होंने कहा कि ‘कविता के समक्ष कुछ शाश्वत चुनौतियाँ हैं – विषय चयन से लेकर भाषा, पठनीयता और संप्रेषण तक. कविता का धर्म मनुष्यता को बचाना है. व्यक्ति को जारूक बनाना है. कवि को अपने समय से दो चार होते हुए चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. कविता को लोकमंगल, लोक रक्षण की भूमिका निभाने के लिए नए पैतरों को अपनाना होगा.’ उन्होंने इस बात को रेखांकित किया कि ‘आज के समय में पठनीयता की समस्या अर्थात संप्रेषण की समस्या है. यदि कवि लोक से जुड़ने की अपेक्षा लोकप्रियता से जुड़ जाय तो कविता में गंभीरता की क्षति होती है. समाज को टुकड़ों में बांटने वाली कविता नहीं चाहिए जबकि जोड़ने वाली कविता चाहिए. उपदेशों तथा निबंधों का अनुवाद कविता में नहीं करना चाहिए. जीवन की सच्ची अनुभूति की अभिव्यक्ति सरल शब्दों में होना नितांत आवश्यक है.’साहित्य को जीवन प्रतिक्रया मानते हुए डॉ. श्रीराम परिहार (खंडवा) ने कहा कि जीवन की जो भी चुनौतियाँ होंगी वे सभी कविता की चुनौतियाँ होंगी. जयशंकर प्रसाद ने भी कहा था कि काव्य जीवन की संकल्पनात्मक अभिव्यक्ति है. श्रीराम परिहार ने इस बात को रेखांकित किया कि भारत और विदेश में मूलभूत अंतर है. विदेश में संस्कृति, धर्म और दर्शन जीवन के हिस्से हैं. लेकिन भारत में धर्म व्यापक है. संस्कृति, समाज और दर्शन सभी धर्म के हिस्से हैं. जीवन में जो आचरण होता है वह कहीं न कहीं धर्म से जुड़ा हुआ होता है. अतः भारतीय साहित्य और कविता को इस दृष्टि से समझना अनिवार्य है.’ उन्होंने यह पीड़ा व्यक्त की कि हम ऐसे आलोचक पैदा नहीं कर पा रहे हैं जो साहित्य के सभी विधाओं को बराबर आदर दे सकें. उन्होंने इस बात को उदाहरणों से पुष्ट करते हुए कहा कि हमारे आलोचक एक रचना को सिर्फ एकांगी दृष्टि से आंकते रहते हैं. उसको समग्रता में नहीं देखते. बैंकों का राष्ट्रीयकरण, डंकल, पेटेंट आदि ने समाज में नवउदारवादी नीति को आगे बढ़ाया जिसके फलस्वरूप भूमंडलीकरण और बाजारवाद का प्रभाव बढ़ता गया. तीन ‘एम’ – ‘माइंड’, ‘मनी’ और ‘मसल’ पूरी तरह से सभी क्षेत्रों में हावी हो गए. साहित्य भी इनके प्रभाव से अछूता नहीं रहा. उन्होंने यह अपील की कि साहित्य को एकांगी दृष्टि से न देखें. उसको समग्रता में देखें और समझें.

 

  • संगोष्ठी के विभिन्न सत्रों में कविता, नाटक, उपन्यास और कहानी के समक्ष उपस्थित समकालीन चुनौतियों पर तो चर्चा हुई ही, एक सत्र में राम साहित्य की प्रासंगिकता पर भी विचार विमर्श हुआ जिससे यह बात उभरकर आई कि उत्तरआधुनिकता से आगे तरल आधुनिक होते जा रहे समकालीन विश्व में मनुष्यता, मानवीय संबंध और जीवन मूल्य खतरे में हैं और यह ख़तरा साम्राज्यवादी ताकतों तथा मुनाफाखोर बाजार से उपजी उपभोक्तावादी संस्कृति से है. इसका सामना करने के लिए रचनाकारों को यथार्थ का अंकन करने के साथ साथ मनुष्य और मनुष्य को जोड़ने वाले मूल्यों की स्थापना करने वाले साहित्य की रचना करनी होगी. यह बात भी उभरकर सामने आई कि रचनाकार जब तक अपने पाठक से सीधे संवाद स्थापित नहीं करेंगे और सामाजिक कार्यकर्ता की सक्रिय भूमिका में नहीं उभरेंगे तब तक साहित्य की प्रासंगिकता प्रश्नों के घेरे में रहेगी.
  • साहित्य की पठनीयता के संकट की चर्चा करते हुए डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा (हैदराबाद) ने कहा कि मुख्य चुनौती संप्रेषणीयता की चुनौती है. अर्थात काव्यभाषा की समस्या. जनभाषा का स्तर एक है तथा कविता की भाषा का स्तर एक. प्रायः यह माना जाता है कि साहित्यकार बनना हर किसी के बस की बात नहीं है. यह बात कवि और कविता पर भी लागू होती है. कविता लिखना हर किसी के लिए साध्य नहीं है. जिस तरह साहित्यकार को शब्द और भाषिक युक्तियों का चयन सतर्क होकर करना चाहिए उसी प्रकार कविता में भी शब्दों का सार्थक और सतर्क प्रयोग वांछित है. कवि को इस बात का ध्यान रखना आवश्यक है कि उसे किस शब्दावली और भाषा का चयन करना होगा.
  • समकालीन रचनाकार एक ऐसे वातावरण में जी रहा है जहाँ यथार्थ को समग्र रूप में देखने के बजाय टुकड़ों में देखने का प्रचलन है. युगों तक हाशिए पर रहने के लिए विवश विविध समुदाय आज अपनी अस्मिता को रेखांकित कर रहे हैं जिससे विविध विमर्श सामने आए हैं. इस संदर्भ में डॉ. प्रतिभा मुदलियार (मैसूर) ने कहा कि ‘समकालीन हिंदी कविता में मानवाधिकारों से वंचित वर्ग ने अपनी अस्मिता कायम करने के लिए अभिव्यक्ति का शस्त्र अपनाया. हिंदी दलित विमर्श ने एक मुकाम हासिल की है. निर्मला पुतुल, ओमप्रकाश वाल्मीकि, तुलसीराम आदि साहित्यकार अपनी रचनाओं के माध्यम से भोगे हुए यथार्थ को अभिव्यक्त किया है. उनकी रचनाओं में उनकी वैचारिकता को रेखांकित किया जा सकता है. ये रचनाएँ अस्तित्व की लड़ाई की रचनाएँ हैं, विद्रोह और संघर्ष की रचनाएँ हैं. इनमें पीड़ा का रस है. घृणा के स्थान पर प्रेम को स्थापित करना की मुहीम है.’
  • उद्घाटन भाषण में देवी नागरानी ने कहा कि उन्हें भारत और अमेरिका में कोई विशेष अंतर नहीं दीखता क्योंकि जब कोई भारत से विदेश में जाते हैं तो वे सभ्यता, संस्कृति और संस्कार को भी अपने साँसों में बसाकर ले जाते हैं. एक हिंदुस्तानी जहाँ जहाँ खड़ा होता है वहाँ वहाँ एक छोटा सा हिंदुस्तान बसता है. उन्होंने भाषा और संस्कृति के बीच निहित संबंध को रेखांकित करते हुए कहा कि विदेशों में तो ‘हाय, बाय और सी यू लेटर’ की संस्कृति है जबकि हमारे भारत में विनम्रता से अभिवादन करने का रिवाज है. लेकिन आजकल यहाँ कुछ तथाकथित लोग विदेशी संस्कृति को अपनाकर हमारी संस्कृति की उपेक्षा कर रहे हैं जबकि विदेशों में बसे प्रवासी भारतीय अपनी भाषा और संस्कृति को बचाए रखने के लिए पुरजोर कोशिश कर रहे हैं. विश्वा (सं. रमेश जोशी), सौरभ (सं. अखिल मिश्रा), अनुभूति एवं अभिव्यक्ति (सं. पूर्णिमा वर्मन) आदि अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाएँ अंतर्जाल के माध्यम से हिंदी भाषा, साहित्य और संस्कृति को बचाए रखने में महती भूमिका निभा रही हैं. उन्होंने सबसे अपील की कि ‘हमें अपनी भाषा को, अपनी सभ्यता एवं संस्कृति को बचाए रखने के लिए कदम उठाना चाहिए चूँकि भाषा ही हमें विरासत में प्राप्त हुई है. अतः इसे सींचना और संजोना हमारा कर्तव्य है.’
  • पिछले डेढ़ सौ – दो सौ वर्षों में हमारे परिवेश और चिंतन में बड़े बदलाव आए हैं. वैज्ञानिक क्रांति के साथ आधुनिकता की आहटें सुनाई देने से लेकर उत्तरआधुनिकता और उससे जुड़े विमर्शों तक की इस यात्रा ने हमें आज जिस मुकाम पर ला खड़ा किया है वहाँ हम सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक मोर्चों पर नई नई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं. राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में देखें तो भी सब ओर काफी धुंधलका बरसता दिखाई देता है. इस धुंधलके में रचनाकार को अपनी राह तलाशने की बड़ी चुनौती का सामना है. समकाल की वे चुनौतियाँ उन स्थायी चुनौतियों के अतिरिक्त हैं जिनका सामना वस्तु, विचार, अभिव्यक्ति और शिल्प की खोज के स्तर पर किसी भी रचनाकार को करना होता है.
  • डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा (सह-संपादक ‘स्रवन्ति’)दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद – 50004
  • प्राध्यापक, उच्च शिक्षा और शोध संसथान,

साहित्य शिरोमणि सम्मान

0-31 आक्टोबर-2014, को कर्नाटक विश्वविद्यालय (धारवाड़), अयोध्या शोध संस्थान (अयोध्या) और साहित्यिक सांस्कृतिक शोध संस्था (उल्हासनगर) के संयुक्त तत्वावधान में धारवाड में ‘समकालीन हिंदी साहित्य की चुनौतियाँ’ विषयक द्विदिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया. कार्यक्रम के आगाज में दीप प्रज्वलन व सरस्वती वंदना की परंपरा संगीत विभाग के विद्यर्थियों द्वारा निभाई गई। पुष्प गुच्छ से महानुभूतियों का स्वागत किया गया। उदघाटन भाषण में श्रीमती देवी नागरानी जी ने विदेश में हिन्दी के उज्वल भविष्य की दिशा में हो रहे प्रयासों का विवरण दिया जो संस्थागत, व्यक्तिगत रूप में हिन्दी को अंतरार्ष्ट्रीय मंच पर स्थापित करने की पहल कर रहे हैं। कर्नाटक विश्वविध्यालय, धारवाड़, ने श्रीमती देवी नागरानी को “साहित्य शिरोमणि सम्मान” से सम्मानित किया।

उद्घाटन सत्र की मुख्य अतिथि अमेरिका से पधारी देवी नागरानी थीं. विशिष्ट अतिथियों में डॉ. विनय कुमार (हिंदी विभागाध्यक्ष, गया कॉलेज), डॉ. योगेंद्र प्रताप सिंह (निदेशक, अयोध्या शोध संस्थान, अयोध्या), डॉ. प्रदीप कुमार सिंह (सचिव, साहित्यिक सांस्कृतिक शोध संस्था, उल्हासनगर), डॉ. राम आह्लाद चौधरी (पूर्व अध्यक्ष, हिंदी विभाग, कोलकाता), डॉ. प्रभा भट्ट (अध्यक्ष, हिंदी विभाग, कर्नाटक विश्वविद्यालय), डॉ. एस. के. पवार (कर्नाटक विश्वविद्यालय) और डॉ. बी. एम. मद्री (कर्नाटक विश्वविद्यालय) शामिल थे.

उद्घाटन भाषण में देवी नागरानी ने कहा कि उन्हें भारत और अमेरिका में कोई विशेष अंतर नहीं दीखता क्योंकि जब कोई भारत से विदेश में जाते हैं तो वे सभ्यता, संस्कृति और संस्कार को भी अपने साँसों में बसाकर ले जाते हैं. एक हिंदुस्तानी जहाँ जहाँ खड़ा होता है वहाँ वहाँ एक छोटा सा हिंदुस्तान बसता है. उन्होंने भाषा और संस्कृति के बीच निहित संबंध को रेखांकित करते हुए कहा कि विदेशों में तो ‘हाय, बाय और सी यू लेटर’ की संस्कृति है जबकि हमारे भारत में विनम्रता से अभिवादन करने का रिवाज है. लेकिन आजकल यहाँ कुछ तथाकथित लोग विदेशी संस्कृति को अपनाकर हमारी संस्कृति की उपेक्षा कर रहे हैं जबकि विदेशों में बसे प्रवासी भारतीय अपनी भाषा और संस्कृति को बचाए रखने के लिए पुरजोर कोशिश कर रहे हैं.

Kim addressing

Kim addressing

महत्वपूर्ण बात यह की संक्षिप्त समय में भी समकालीन साहित्य पर प्रपत्र पढे गए व आलेख एक संग्रह -“समकालीन हिन्दी साहित्य की चुनौतियाँ” के रूप में आया जिसका लोकार्पन पहले सत्र में हुआ। 432 पन्नों का यह संदर्भ ग्रंथ जिसमें 122 प्रपत्र एक तार में पिरोकर सँजोये गए हैं , यह एक उपलब्धि है जिसका श्रेय जाता है प्रधान संपादक-डॉ. प्रदीप कुमार सिह , डॉ. वियनी कुमार, डॉ. भगवती प्रसाद उपाध्याय, डॉ. एस. के. पवार, प्रो. प्रभा भट्ट- , प्रो. बी. एम. मद्री जी व समस्त संपादकीय मण्डल को !

अध्यक्ष प्रो. चंद्रमा कणगलि की उपस्थिती में बीज वक्तव्य श्री राम अल्हाद (कलकता) ने प्रस्तुत किया। मंच पर उपस्थित शिरोमणि रहे डॉ. योगेंद्रप्रताप सिंह (अयोध्या), डॉ. विनय कुमार (गया) , डॉ. प्रदीप कुमार, (मुंबई), डॉ. एस. के. पवार (धारवाड़), प्रो. प्रभा भट्ट- अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, कर्नाटक विश्वविध्यालय, धारवाड़, प्रो. बी. एम. मद्री-निदेशक अंतराष्ट्रीय संगोष्ठी, कर्नाटक विश्वविध्यालय, धारवाड़, संचालन को बखूबी निभाया डॉ. भगवती प्रसाद उपाध्याय ने।

साहित्य को अंधेरा चीरने वाला प्रकाश बताते हुए डॉ. राम अह्लाद चौधरी ने कहा कि ‘आज प्रतिकूल परिस्थितियों को अनुकूल बनाने की चुनौती साहित्यकारों के समक्ष है. भारतीय साहित्य में इतिहास, दर्शन और परंपरा का संगम होता है. लेकिन आज के साहित्य में यह संगम सिकुड़ता जा रहा है. समाकीलन साहित्य के सामने एक और खतरा है अभिव्यक्ति का खतरा. गंभीरता और जिम्मेदारी पर आज प्रश्न चिह्न लग रहा है क्योंकि सही मायने में साहित्य के अंतर्गत लोकतंत्र का विस्तार नहीं हो रहा है. हाशियाकृत समाजों को केंद्र में लाना भी आज के साहित्य के समक्ष चुनौती का कार्य है.

इस दो दिवसीय संगोष्ठी में छः सत्रों के अंतर्गत समकालीन साहित्य पर प्रपत्र पढे गए व अध्यक्षीय भाषण के दौरान चर्चा भी हुई। विषय रहे –समकालीन हिन्दी कविता, राम कथा की प्रासंगिता,  समकालीन हिन्दी नाटक, समकालीन उपन्यास, समकालीन कहानी साहित्य, समकालीन हिन्दी उपन्यास साहित्य, समकालीन हिन्दी कहानी।

इन विषयों पर अध्यक्षता के अंतरगत प्रपत्रवाचक समस्त भारत से शामिल रहे- प्रमुख वक्ता,  श्री राम परिहार (खंडवा, म. प्र.), डॉ. प्रतिभा मुदलियार (मैसूर), डॉ. ऋषभदेव शर्मा (हैदराबाद), डॉ. कविता रेगे (मुंबई), डॉ. भारतसिंह (बिहार), डॉ. आर. एस. सरज्जू (हैदराबाद), डॉ. उमा हेगड़े (शिमोगा) डॉ. एम.एस. हुलगूर, डॉ. मधुकर पाडवी (गुजरात), डॉ. अनिल सिंध (मुंबई), डॉ. नारायण (तिरुपति), डॉ. रोहितश्व शर्मा(गोवा), डॉ. अर्जुन चौहान (कोल्हापुर), डॉ. उत्तम भाई पटेल (सूरत), डॉ. चंद्रशेखर रेड्डी (तिरुपति), डॉ. को. जो. किम (दक्षिण कोरिया), प्रो. परिमाला अंबेडकर (गुलबर्गा), डॉ. बी. बी. ख्रोत (धारवाड़), डॉ. बाबू जोसफ (कोटयम)॥

समापन समारोह के दौरान विद्वानों का सम्मान किया गया –डॉ  एस. एस. चुलकिमठ,  डॉ. देवी नागरानी,  डॉ. कविता रेगे, डॉ. को. जो. किम, डॉ. आर. टी. भट्ट, डॉ. टी. वी. कट्टीमनी, डॉ. सुमंगला मुमिगट्टी, एवं श्री परसमल जैन ! इस वैभवपूर्ण एवं विशाल समारोह की संपन्नता सदा नींव का निर्माण बन कर याद रहेगी। जयहिंद

 

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