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	<title>चराग़े-दिल</title>
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		<title>चराग़े-दिल</title>
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			<item>
		<title>बहारों का आया है मौसम सुहाना</title>
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		<pubDate>Mon, 05 Oct 2009 20:54:11 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Devi Nangrani</dc:creator>
				<category><![CDATA[ग़ज़ल-देवी नागरानी]]></category>
		<category><![CDATA[चराग़े-दिल संग्रह]]></category>

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		<description><![CDATA[गजलः 41
बहारों का आया है मौसम सुहाना
नये साज़ पर कोई छेड़ो तराना.
ये कलियां, ये गुंचे ये रंग और खुशबू
सदा ही महकता रहे आशियाना.
हवा का तरन्नुम बिखेरे है जादू
कोई गीत तुम भी सुनाओ पुराना.
चलो दोस्ती की नई रस्म डालें
हमें याद रखेगा सदियों जमाना.
खुशी बाँटने से बढ़ेगी ज़ियादा
नफ़े का है सौदा इसे मत गवाना.

मैं देवी खुदा से [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=charagedil.wordpress.com&blog=1122253&post=314&subd=charagedil&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><h2 style="text-align:center;"><span style="color:#008080;">गजलः 41</span></h2>
<h2 style="text-align:center;"><span style="color:#008080;">बहारों का आया है मौसम सुहाना<br />
नये साज़ पर कोई छेड़ो तराना.</p>
<p>ये कलियां, ये गुंचे ये रंग और खुशबू<br />
सदा ही महकता रहे आशियाना.</p>
<p>हवा का तरन्नुम बिखेरे है जादू<br />
कोई गीत तुम भी सुनाओ पुराना.</p>
<p>चलो दोस्ती की नई रस्म डालें<br />
हमें याद रखेगा सदियों जमाना.</span></h2>
<h2 style="text-align:center;"><span style="color:#008080;">खुशी बाँटने से बढ़ेगी ज़ियादा<br />
नफ़े का है सौदा इसे मत गवाना.<br />
</span></h2>
<h2 style="text-align:center;"><span style="color:#008080;">मैं देवी खुदा से दुआ मांगती हूं<br />
बचाना, मुझे चश्मे-बद से बचाना.<br />
</span></h2>
<h2 style="text-align:center;"><span style="color:#008080;">चराग़े-दिल/ ६७<br />
</span></h2>
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			<media:title type="html">Devi</media:title>
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	</item>
		<item>
		<title>ड़ा अंजना संधीर के सन्मान में</title>
		<link>http://charagedil.wordpress.com/2009/09/22/309/</link>
		<comments>http://charagedil.wordpress.com/2009/09/22/309/#comments</comments>
		<pubDate>Tue, 22 Sep 2009 01:21:31 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Devi Nangrani</dc:creator>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>

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		<description><![CDATA[न्यू यार्क में, शिक्षायतन के देवालय में ड़ा अंजना संधीर के सन्मान में.एक काव्य गोष्टी 
 दिनांक 7, जून 2009 न्यू यार्क में पूर्णमासी के दिन,  श्रीमती पूर्णिमा देसाई के शिक्षायतन के देवालय में ड़ा अंजना संधीर के सन्मान में एक काव्या गोष्टी का आयोजन सफलता पूर्ण संपूर्ण हुआ. आगाज़ी शब्दों में पूर्णिमा देसाई शिक्षायतन की [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=charagedil.wordpress.com&blog=1122253&post=309&subd=charagedil&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p><span style="color:#ff0000;"><strong>न्यू</strong><strong> </strong><strong>यार्क</strong><strong> </strong><strong>में</strong><strong>, </strong><strong>शिक्षायतन के देवालय में ड़ा अंजना संधीर के सन्मान में.एक काव्य गोष्टी </strong></span></p>
<p><span style="color:#0000ff;"> </span><span style="color:#0000ff;"><span style="color:#0000ff;">दिनांक 7, जून 2009 न्यू यार्क में पूर्णमासी के दिन,  श्रीमती पूर्णिमा देसाई के शिक्षायतन के देवालय में ड़ा </span>अंजना संधीर के सन्मान में एक काव्या गोष्टी का आयोजन सफलता पूर्ण संपूर्ण हुआ. </span><span style="color:#0000ff;">आगाज़ी शब्दों में पूर्णिमा देसाई शिक्षायतन की संस्थापिका एवं निर्देशिका ने ये कहते हुए-</span><span style="color:#0000ff;">&#8221; मैं एक ऐसी विभूति को बुला रही हूँ जिन्होने साहित्य के प्रचार में, संस्कृति के प्रचार में अपना योगदान दिया है और वह है डा. अंजना संधीर&#8221; जिन्होने मंच की शान बढाते हुए दीप प्रज्वलित किया. शिक्षायतन संस्था के संगीत विभाग से जुड़े सुर-सागर के माहिर श्री पंडित कमल मिश्रा जी ने माता के चरणों में गुलाब के फूलों को अर्पित करते हुए सरस्वती वंदना की. वातावरण की पाकीजगी में माँ की सरस्वती का स्तुति गायन वन्दनीय रहा.</span></p>
<p><span style="color:#0000ff;"> अपने भावों को व्यक्त करते हुए अंजना जी ने कहा &#8221; मै यहीं हूँ, यहीं थी और यहाँ से कहीं नहीं गयी&#8221; और अपनी व्याख्यान में कुछ न कहते हुए उन्होने यू. के. से आए डा. कृष्णा कुमार जो को सादर आमंत्रित किया जिन्होंने अपने विचार प्रस्तुति करने से पहले पूर्णिमा जी को बधाई की पात्र मानते हुए अंजना के लिये कहा कि &#8221; अंजना जी का कम बोलता है&#8221; यह हर नारी जाति के लिए गर्व की बात रही जो &#8220;प्रवासिनी के बोल &#8221; और &#8220;प्रवासी आवाज़ &#8221; के मंच पर अपने आपको स्थापित कर पाई है. अंजना जी का कहना और मानना है कि अमेरिका के हर शहर में उसका एक घर है और सीमाओं से परे उनके रिश्ते हैं जिनकी कोई सरहदें नहीं बाँध पाएँगी.</span></p>
<p><span style="color:#0000ff;">         भावों के आदान प्रदान के पश्चात् काव्य गोष्टी प्रारंभ हुई जिसका स्वरुप अंतराष्टीय गोष्टी से कम न था. आगाज़ की रचना का पाठ किया डा. दाऊजी गुप्त ने, जो लखनऊ से पधारे थे. यू. के. से डा. कृष्ण कुमार जी ने अपनी रचना पाठ के बाद अपने साथी साहित्यकार और कविगन को आवाज़ दी जिनमें वहां मौजूद थे डॉ.कृष्ण कनैया, श्रीमती जय वर्मा, श्री नरेन्द्र ग्रोवर और श्रीमती स्वर्ण तलवाड़. उनके ही पश्चात अनूप और रजनी भार्गव ने अपनी नन्हीं नन्हीं कविताओं के कपोलों से ज़िन्दगी के अंकुरित नए रंग माहौल में भर दिए. टोरंटो से श्री गोपाल बगेल जी ने सुरमई धुन में अपनी रचना सुनाई. फिर मंच को थामा न्यू यार्क तथा न्यू जर्सी के कविओं में जिनमें शामिल रहे श्री अशोक व्यास, श्री ललित अल्लुवालिया, मंजू राइ, बिन्देश्वरी अग्रवाल, अंजना संधीर, पूर्णिमा देसाई, डा॰ राम बाबू गौतम, पुष्पा मल्होत्रा, नीना वाही, अनुराधा चंदर, डा. अनिल प्रभा, गिरीश वैद्य, देवी नागरानी, लखनऊ से आई श्रीमती शशि तिवारी और उनकी सुपुत्री शिवरंजनी. श्रोताओं में रहे श्री कथूरिया जी, परवीन शाहीन, रेनू नंदा और अनेकों साहित्यप्रेमी. यहाँ मैं डॉ. सरिता मेहता का ज़िक्र ज़रूर करना चाहूंगी, जो खुद विध्याधाम संस्था की निर्देशिका है और साथ में </span><span style="color:#0000ff;">अच्छी कवियित्री होने के नाते काव्य पाठ का मज़ा श्रोताओं तक पहुँचाया .इस काव्य सुधा की शाम में उनका पूरी तरह से सहकार रहा. समाप्ति की ओर कदम बढाते हुए पूर्णिमा जी ने अंजना जी का सन्मान &#8221; साहित्य मणि&#8217; की उपाधि से श्री दाऊजी गुप्त के हाथों से करवाया, और सभी कविगन का साधुवाद किया. शुभ शुरुवात की समाप्ति भोजन के साथ हुई.</span></p>
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	</item>
		<item>
		<title>रिश्ता तो सब ही जताते है</title>
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		<pubDate>Tue, 09 Dec 2008 04:09:10 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Devi Nangrani</dc:creator>
				<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://charagedil.wordpress.com/?p=305</guid>
		<description><![CDATA[ग़ज़लः ४०
रिश्ता तो सब ही जताते है
पर कुछ ही खूब निभाते है.
 दुख दर्द हैं ऐसे महमां जो
आहट के बिन आ जाते है. 
गर्दिश में सितारे है जिनके
वो दिन में भी घबराते है.
 विश्वास की दौलत वालों को
रातों के अंधेरे भाते है.
ज़ंजीर में यादों की देवी
हम खुद को जकड़ते जाते है.
चराग़े-दिल/ ६६
       [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=charagedil.wordpress.com&blog=1122253&post=305&subd=charagedil&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p style="text-align:center;"><span style="color:#339966;">ग़ज़लः ४०</span></p>
<p style="text-align:center;"><span style="color:#339966;">रिश्ता तो सब ही जताते है</span></p>
<p style="text-align:center;"><span style="color:#339966;">पर कुछ ही खूब निभाते है.</span></p>
<p style="text-align:center;"><span style="color:#339966;"> </span><span style="color:#339966;">दुख दर्द हैं ऐसे महमां जो</span></p>
<p style="text-align:center;"><span style="color:#339966;">आहट के बिन आ जाते है.</span><span style="color:#339966;"> </span></p>
<p style="text-align:center;"><span style="color:#339966;">गर्दिश में सितारे है जिनके</span></p>
<p style="text-align:center;"><span style="color:#339966;">वो दिन में भी घबराते है.</span></p>
<p style="text-align:center;"><span style="color:#339966;"> </span><span style="color:#339966;">विश्वास की दौलत वालों को</span></p>
<p style="text-align:center;"><span style="color:#339966;">रातों के अंधेरे भाते है.</span></p>
<p style="text-align:center;"><span style="color:#339966;">ज़ंजीर में यादों की देवी</span></p>
<p style="text-align:center;"><span style="color:#339966;">हम खुद को जकड़ते जाते है.</span></p>
<p style="text-align:center;"><span style="color:#339966;">चराग़े</span><span style="color:#339966;">-दिल/ </span><span style="font-family:Times New Roman;"><span style="color:#339966;">६६</span></span></p>
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	</item>
		<item>
		<title>लघुकथा की जीवनी</title>
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		<pubDate>Tue, 09 Dec 2008 04:03:09 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Devi Nangrani</dc:creator>
				<category><![CDATA[लेख]]></category>

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		<description><![CDATA[लघुकथा की जीवनी

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में 16,17 फरवरी दो दिन का सृजन-सम्मान कार्यक्रम सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। यह एक सुनहरा ऐतिहासिक स्मरणीय कुंभ रहा जहाँ पर विश्व के हर दिशा से साहित्यकार भाग लेकर लघुकथा की विषय-वस्तु, उसके शिल्प, कला-कौशल, आकार-प्रकार, वर्तमान और भविष्य की बारीकी को जानते और परखते रहे। कार्यक्रम का आगाज़ 16 [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=charagedil.wordpress.com&blog=1122253&post=301&subd=charagedil&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><h2><span style="color:#ff0000;">लघुकथा की जीवनी</span></h2>
<p><strong></strong></p>
<p><strong><span style="color:#000080;">छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में 16,17 फरवरी दो दिन का सृजन-सम्मान कार्यक्रम सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। यह एक सुनहरा ऐतिहासिक स्मरणीय कुंभ रहा जहाँ पर विश्व के हर दिशा से साहित्यकार भाग लेकर लघुकथा की विषय-वस्तु, उसके शिल्प, कला-कौशल, आकार-प्रकार, वर्तमान और भविष्य की बारीकी को जानते और परखते रहे। कार्यक्रम का आगाज़ 16 तारीख मुख्य अतिथि श्री केसरीनाथ त्रिपाठी के हाथों दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ । साथ में मंच की शोभा बढ़ाते रहे थे जाने-माने आलोचक व लघुकथा के प्रथम व्याकरणाचार्य श्री कमल किशोरे गोयनका, विशिष्ट अतिथि थे फिराक गोरखपुरी के नाती, वरिष्ठ कवि व छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक श्री विश्वरंजन, श्री विश्वनाथ सचदेव, संपादक नवनीत, मुंबई से, श्री मोहनदास नैमिशराय, मेरठ से, सुश्री पूर्णिमा वर्मन, शारजाह से, श्री कुमुद अधिकारी नेपाल से, श्री रोहित कुमार हैपी न्यूजीलैंड से, मै, देवी नागरानी न्यू जर्सी से, और सृजन-सम्मान के अध्यक्ष व पूर्व शिक्षामंत्री श्री सत्यनारायण शर्मा। मुख्यअतिथि श्री केसरीनाथ त्रिपाठी ने दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए कहा कि पहले कभी साहित्य का गढ़ इलाहाबाद और दिल्ली हुआ करता था । सृजन-सम्मान ने विगत 6 आयोजनों और अपनी सतत् क्रियाशीलता से छत्तीसगढ़ और रायपुर को साहित्य का गढ़ बना दिया है ।</p>
<p>यह शीर्षक &#8220;लघुकथा&#8221; सिर्फ़ शीर्षक नहीं एक सूत्र भी है &#8216; ब्राह्म वाक़्य भी है. रायपुर में 16-17 फरवरी 2008 में, इन दो जुड़वा दिनों में विस्तार से लघुकथा पर केंद्रित जो चर्चा हुई, वह तो सागर की गागर में एक प्रविष्ट थी; जिसका डेफ़ीनेशन बीज वक्तव्य</span></strong><strong><span style="color:#000080;"> देते हुए श्री जय प्रकाश मानस जी के शब्दों में &#8220;लघु और कथा एक दूसरे के पूरक है लघुता ही उसकी पूर्णता है, लघुता ही उसकी प्रभुता है. लघुकथा जीवन का साक्षात्कार है, गध्य और शिल्प निजी व्यवहार है और लेखक का परिचय भी.<br />
यह सच है कि इस विषय पर पूर्ण रूप से जानना और उसकी शैली को प्रस्तुत करने का सफ़र मुश्किल है पर नामुमकिन नहीं. इस सुनहरे ऐतिहासिक स्मरणीय कुंभ में जहाँ पर विश्व की कई दिशाओं से साहित्यकार भाग लेकर लघुकथा की विषय-वस्तु, कला- कौशल, आकर-प्रकार,वर्तमान और भविष्य की बारीकियों को जानते रहे एवम वाद विवाद से परखते भी रहे, जिससे कई बातें स्पष्ट होती रहीं. इस पर गौरव पूर्ण रूप से रोशनी डालते अपने भाव व्यक्त करते हुए श्री कमल किशोर गोयनका जी ने कहा &#8220;इतना बड़ा सम्मेलन पहली बार इतने बड़े पैमाने पर आयोजित करने की कल्पना का साकार स्वरूप एक महान उपलब्द्धि है. हमारे समाज की गरिमा बनाये रखने का यहा एक अंतराष्ट्रीय स्तर पर सफल प्रयास है.</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#000080;">&#8221; छत्तीसगढ़ अब साहित्य का भी गढ़ है&#8221; यह केसरीनाथ त्रिपाठी जी का मानना है , इसमें कोई अतिशययोक्ति नहीं. अलग अलग ढंग से प्रमुख लघुकथाकारों ने अपने अपने दृष्टिकोण से विस्तुत वर्णन किया. श्री केसरीनाथ जी के शब्दो में &#8220;कविता, लेख, लघुकताएँ, आलोचनाएँ सब हिन्दी भाषा की धाराए है.&#8221; लघुकता का वर्तमान, इस विधा की कलात्मक सुज़नता के साथ आने वाले कल की नींव रख रहा है. इस विषय के जाने माने माहिर लघुकथाकार कर्नाल के श्री अशोक भाटिया जी का कहना है &#8220;रचना वही है जो हमारे साथ-साथ यात्रा करे. रचनाकार में अगर संवेदना नहीं है तो उसकी रचना में जान नहीं आ सकती &#8221; श्री सुकेश साहनी जी के शब्दों में &#8220;रचनाकार का एक चिंतन होता है, जो अपने आप को व्यक्त करता है . साहित्य तो बहता हुआ पानी है जो अपना रास्ता खुद तय करता है. &#8220;</span></strong></p>
<p align="justify"><strong><span style="color:#000080;">राजस्थान के अजमेर जिले की निवासी डा॰ शकुन्तला किरण द्वारा जयपुर विश्वविद्यालय से आठवें दशक की ‘हिन्दी लघुकथा’ पर केन्द्रित शोध-कार्य के अवसर पर हिन्दी लघुकथा की रचनात्मक-पड़ताल के लिये उनकी दृष्टि-पटल पर देश ही नहीं, विदेश की परम्परा भी बीज-रूप में विद्यमान रही है। साहित्य-जगत में अपना विधागत मुकाम हासिल करने में लघुकथा भले ही अब कामयाब हो सकी हो, किन्तु डा0 शकुन्तला किरण आठवें दशक में उपलब्ध साहित्य के साक्ष्य में एक पारखी शोधार्थी के नाते ऐसी स्थापना को बहुत पहले शब्द दे चुकी थीं&#8212;&#8221;आठवें दशक में उदित आधुनिक हिन्दी लघुकथा ने अपनी विशिष्टताओं, क्षमताओं एवं उपयोगिताओं के कारण अभिव्यक्ति के एक नये व प्रभावशाली माध्यम के रूप में अपनी स्वतन्त्र पहचान दी…।&#8221;</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#000080;">लघुकथा की रचना क्यों होनी चाहिए?<br />
लघुकथा-लघु का अर्थ दर्शाते हुए अपना अर्थ विस्तार अनंत की ओर ले जाती है. कथा यानी कहानी -छोटी सी कथा जिसका स्ट्रक्चर (stucture) और टेक्सचर (texture) उसकी निजी मान्यता है. </span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#000080;">है लघु सी ये कथा, विस्तार जिसका है बड़ा<br />
गध्य औ&#8217; फिर शिल्प उसकी कह रहा है लघुकता. </span></strong><br />
<strong><span style="color:#000080;">लघुकथा की लघुता पर विस्तार पूर्वक विशेषण शब्दो से सजाए हुए अनेक definations सामने आने लगते है, जिससे यही लगता है- जीवन के छोटे छोटे जिये जाने वाले पल ही लघुकता है. शायद यहीं हम लघुकता का निर्माण करते है, जिसकी व्याख्यान की सीमा असीमित है. हद और सरहद के बीच का फासला तय करना ही इसकी लघुता है. सच तो यह है कि लघुकथा का लघुपन ही उसका कथा तत्व है.<br />
जब लघुकता का निर्माण होता है तो मानव जीवन इसका विस्तार हो जाता है और परिधि भी. यह एक नया पाठकीय अस्वाद है, एक अनूठी अद्धभूत विध्या है, लेखक विहीन विध्या जिसमें लेखक अद्रश्य रहता है. हाँ लघुकथा की कला में वह उपस्थित रहता है. कथा अपनी लघुता में प्रवेश करके संवाद करती है. कथा कथा है विधा है, जो अपने आकर और रूप द्वारा लघुकथा का प्रभाव प्रस्तुत करती है. महत्व प्रभाव का है, कलाकार की कलाक्रुति से उसकी माहिरता झाँकती है. अपने आँचल में सामयिकता, सार्वजनीनता, वैचारिक उत्कँण्ठा, बौधिक प्रहार, तथा मानसिक उद्वेलन समाया हुआ होता है. एक आम आदमी की जिंदगी में पेश आए हुए रोज़मर्रा की जिंदगी की अनुभूतियाँ इसमें शामिल रहती है, जिनमें प्रेरकता तथा प्रेरणात्मकता के अनेक गुण और दोष उभरकर सामने आते है-जिनके द्वारा वो जिए गये तजुर्बात एक तस्वीर बनकर स्पष्ट रूप धारण करते है. विडंबनाओ तथा विविश्ताओं को शब्दाँकन करने के साथ साथ उसे सकारात्मक मोड़ पर ला खड़ा करना भी लघुकथा की एक विशेषता है.<br />
लघुकथा हर साहित्य के क्षेत्र में कई पड़ावों से गुजर कर अपना अधिकृत स्थान पाने में सफल हो रही है. विषय भी अनंत है और मानव जीवन इसकी विराटता. दीर्घता इसकी दुश्मन, लघुता इसकी दोस्त. लघुकथा तब ही जीवित होकर साँसे लेती है जब वह पाठकों तक पहुंचती है, उनके हृदय को टटोल कर उनके मनोभावों को झंझोर कर रख देती है, फिर चाहे उसमें चुटकीलापन ही क्यों न हो, चुलबुलापन हो या आत्मीयता, जीवन की हर शैली को अपनी लघुता में प्रदर्शित करने कराने की क्षमता रखती हो- जहाँ पर लघुकथाकार द्रश्य न रहकर पात्रों के रूप में अपनी बात कर पाने में समर्थ हो. जीवन के द्रष्टांतों को लेकर मानव समाज को सही राह चुनने का अवसर देती है लघुकथा. जब तक कोई लेखक समाज से रू-ब-रू नहीं होगा, संवाद का कोई भी माध्यम उसकी संवेदना को जगाए नहीं रख सकता। साहित्य अगर समाज का दर्पण है तो सिर्फ इसलिए कि उसका रचयिता समाज के अन्तर्विरोधों को उसके बीच अपनी उपस्थिति बनाकर झेलता-है महसूस करता है. जितनी गहराई से वह महसूस करेगा, उतनी ही गहराई से वो प्रस्तुतीकरण भी कर पायेगा. अन्त:जगत से जुड़े बिना बाहर की हर यात्रा व्यर्थ और निरर्थक है। </span></strong><strong><span style="color:#000080;">लघुकथा में एक साधारण सी गुफ़्तगू का स्वरूप देखें कितना असरदार है, एक परिपुर्ण तस्वीर अंकित करने में- वह अपनी अनबोली भाषा में खुद को व्यक्त करती है.<br />
एक: क्या करते हो<br />
दूसरा: ख़ुद को ढूँढता हूँ<br />
एक: कहाँ पर<br />
दूसरा: किसी सॉफ आईने में</span></strong><strong><span style="color:#000080;">मन की हल- चल, अस्थिरता स्पष्ट होती है संक्षिप्त गुफ्तगू में. एक कहानीकार,लघुकथाकार बन जाता है. अपनी विराटता को लघुकथा में समेट कर एक बिंदु पर ला खड़ा करना या उसमें परिवर्तित करते हुए कथनी और करनी को लयात्मक स्वरूप देना इस लोकप्रिय विधा की विशेषता भी है और पहचान भी. </span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#000080;">लघुकथा के बारे में एक प्रचलित सत्य ये भी है की लघुकथा की साइज़ जितना छोटा उतना अच्छा, मगर उसके विषय और कथ्य में समझौता नहीं होना चाहिए. यही लघुकता का प्रभावशाली गुण है जो साहित्य में उसे इतनी मान्यता मिल रही है. लघुकथा का महत्व उसकी लघुता में है जो वह कथा को प्रदान करती है। लघुकथा सिर्फ़ बोध की बात नहीं करती, आपकी सारी चेतना को भी झिंझोड़ कर रखती है। छोटी बात से बड़े अर्थ पाए जायें यह उसकी एक ख़ासियत है और अपनी बात पैग़ाम स्वरूप कम से कम शब्दों में मानवता तक पहुचाई जाए यही लघुकथा की सफलता है . लघु और कथा एक दूसरे के पूरक है, फिर भी लघुकता ही इसकी प्राथमिकता है. शिल्प की दृष्टि से लघुकथा किसी गद्य-गीत जैसी सुगठित होनी चाहिए। शाब्दिक गद्य और शिल्प की शिलापर टिकी उसकी लघुता में कल्पना की गुंजाइश नहीं. उसकी हस्ती अद्रुश्यता में उपस्थित होती है. शायद लघुकता की पेशगी के सलीके में शामिल होती है उसकी अपनी शैली, बुनावट, कसावट, कथ्य, शिल्प और शैली जो प्रस्तुतीकरण के दौरान कितने दिलों के मनोभावों को अपने साथ जोड़ती है, झंझोड़ती है और जागृता उत्पन करती है. </span></strong></p>
<p align="justify"><strong><span style="color:#000080;">प्रत्येक कहानी में एक ‘सत्व’ होता है और हम इसे ‘कहानी की आत्मा’ कहते हैं।‘लघुकथा’ ‘कहानी की आत्मा’ है, उसका ‘सत्व’ है, अत: हम कह सकते हैं कि ‘लघुकथा’ केवल आकारगत, शिल्पगत, शैलीगत और प्रभावगत ही नहीं, शब्दगत और सम्प्रेषणगत समस्त गुणों की कथा-रचना है। कहानी और लघुकथा के बीच अन्तर को इन स्पष्ट तत्वों के माप के द्वारा स्पष्ट रूप से जाना जा सकता है। बहुत कुछ कहने के बाद बहुत कुछ सोचने के लिए पाठक के मनोभावों को उकेरना इसकी आवश्यकता है. लघुकथा और कहानी को एक दूजे से अलग कर पाना मुश्किल है &#8220;कथा किसी एक व्यक्ति के द्वारा कही गयी कोई घटना है या उसकी आत्मकथा है, पर उस विषय में कथा होनी चाहिए. जिसमें कथा ना हो, वो लघुकता कैसी? </span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#000080;">लघुकथा एक स्वाभाविक आकर की रेखांकित की गई विधा है,. एक दृष्टिकोण है जिसका अंकुर मानव मन से अंकुरित हो कर भाषा का आधार पाकर अपने आपको प्रत्यक्ष कर पाता है. जीवन का प्रत्यक्षीकरण है लघुकता, जहाँ हर घटना घट जाने के बाद भी अपने स्वरूप में साकार रहती है, साँस लेती है. हाँ इस बात से नकारा नहीं जा सकता की रचनाकार में अगर संवेदना नहीं है तो उसकी रचना में जान नहीं आ सकती. सहजता उसकी नीव है. कथ हृदय-स्पर्षी होने के साथ साथ हक़ीक़तों से ताल-मेल खाती हुई रोज़मर्रा जीवन की शैली में व्यक्त की हुई हो तो ज़्यादा मन को छू पाती है. कभी कभी कल्पना से खींचा हुआ चित्र भी यतार्थ सा लगता है. एक मुकाम बनाने की चेष्टा में अपना स्रजन आप करती है लघुकता. जैसे कोई मधुबन का माली फूलों की क्यारियों को जल से सींचता है, खाद्ध डालता है और आस पास के सूखे पत्तों को उनसे अलग करके उनकी ताज़गी को बरकरार रखने के कोशिश करता है, ठीक उसी तरह एक रचनाकार लघुकथा लिखते वक़्त लक्ष्य को मधे-नज़र रखते हुए अपनी रचना को सोच से सींच कर शब्दों के शिल्प से तराश कर एक आकृति तैयार करता है जो अपने आप को खुद कम शब्दों में व्यक्त करती है. कम शब्दों में बहुत कुछ कहने की कला है लघुकथा, जिसका स्रजन लघुकथाकार का मन कर सकता है, जिसके मन में संवेदना है, जो अहसासों को अभिव्यक्त करने की कला से परिचित है.<br />
यह तक आधुनिक विधा है, संक्षिप्त होते हुए भी परिपूर्णता से लदी हुई, पौराणिक साहित्य सम्रद्धि प्रदान करती हुई, जिसका संबंध रचना की आँतरिक प्रक्रुति, अंत वस्तु, रूप, बिंब, और रचनाकार की मानसिकता आदि से रूबरू कराती है. एक साहित्सिक आवश्यकता इस युग की, जिसकी शैली और लघुता जीवन की विभिन्नता को एकता का स्वरूप प्रदान करती है. इसके अनेक संकेतो में इसकी परिभाषा छुपी हुई होती है. श्री कमल किशोर गोयनका जी के शब्दो में &#8220;लघुकता जिंदगी का एक चित्र है, आम नागरिक के जीवन का प्रतीक है&#8221; आज कथा मनोरंजन के लिये नहीं आपितु यथार्थ‍ &#8211; दर्शन के लिये लिखी जाती है. यही कारण है कि लघुकथा आज मानव-जीवन के किसी क्षण-विशेष का ही नहीं, उसके किसी पक्ष-विशेष का भी चित्रण करने में पूर्ण सक्षम है।<br />
‘लघुकथा’ में संवादों की स्थिति क्या हो? उन्हें होना चाहिए या नहीं? होना चाहिए तो किस अनुशासन के साथ और नहीं तो क्यों? ये सवाल वैसे ही अनर्गल हैं जैसे कि इसके आकार या इसकी शब्द-संख्या के निर्धारण को लेकर अक्सर सामने आते रहते हैं। वस्तुत: लघुकथा ‘लिखी’ या ‘कही जाती’ प्रतीत न होकर ‘घटित होती’ प्रतीत होनी चाहिए। लघुकथा की रचना-प्रक्रिया का यह प्रमुख सूत्र है। </span></strong><strong><span style="color:#000080;">लघुकथा वही साकार होती है जो मानसिक पक्षों को उजगार करे. मानव मन से जुड़े भाव-दर्द, करुणा, या विरोधाभास को उजगार करे और जीवन की जटिलताओं को आप बीती से जाग बीती के स्तर पर प्रस्तुत करने की कला का प्रयोग करे, तब कहीं जाकर लघुकथा जीवन से जुड़े हुए अनुभव रेखांकित कर पाती है, फिर मार्मिकता के कारण जीवन के निकट आती है प्रियवध स्वीकारी जा रही है. लघुकथा अपने समय की सच्चाइयों का जीवंत दस्तावेज़ होने के साथ ही अपनी स्वतंत्र शैली भी विकसित की है. हक़ीक़त में आज के इस मशीनी दौर में जहाँ आम आदमी कुछ पल सुकून के ट्रेन में खड़ा होकर, कभी बस की लाइन में खड़े खड़े अपने आपको लघुक्था के इस मध्यम से साहित्य से जोड़ पता है, तो कहीं न कहीं इस विधा की सफलता का आभास होता है. संक्षिप्त यात्रा के बीच लघुकथा पूरे विश्व में पढ़ी जाने वाली पसंदीदा साहित्य साहित्य है, जिसकी भाषा, सरल शैली से गंभीर चिंतन देती है, हर बंधन से मुक्त पर फिर भी दाइरे में रहकर शब्द की कसावट और बुनावट लघुकथा का महत्वपूर्ण कला पक्ष है.</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#000080;">यहाँ मैं डा॰ राजेंद्र सोनी और श्री जयप्रकाश मानस द्वारा संपादित &#8220;लघुकथा का गढ़ छत्तीसगढ़&#8221; को मधे ‍ नज़र रखते हुए यही कहूँगी कि इस सत्य के स्तंभ में इनका योगदान महत्वपुर्णा है. कुछ पंक्तिया अपनी जोड़ते हुए:</p>
<p>उसकी शैली, उसकी लघुता, उसकी परिभाषा बनी<br />
</span></strong><strong><span style="color:#000080;">अब स्वाभाविक प्रकट है आकर बनकर लघुकथा.</p>
<p>है लघु सी ये कथा, विस्तार जिसका है बड़ा<br />
</span></strong><strong><span style="color:#000080;">अंकुरित भाषा सी उपजै, आधार बनकर लघुकथा.</p>
<p>देवी नागरानी</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#000080;">९ डी, </span></strong><strong><span style="color:#000080;">, कॉर्नर व्यू सोसाइटी, 15/33 रोड, बांद्रा, मुंबई , </span></strong><strong><span style="color:#000080;">400052 , PH: 9867855751, dnangrani@gmail.com</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#000080;"> </span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#000080;"> </span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#000080;"> </span></strong></p>
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		<title>सर्व भारतीय भाषा सम्मेलन</title>
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		<pubDate>Thu, 27 Nov 2008 07:20:34 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Devi Nangrani</dc:creator>
				<category><![CDATA[भाषा विमर्ष]]></category>

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		<description><![CDATA[महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी द्वारा 3-4-5 अक्टूबर २००८, मुंबई में आयोजित सर्व भारतीय  सम्मेलन के अवसर पर विषयः &#8220;विदेश में भारतीय भाषाएं&#8221; के अंर्तगत इस विचारधारा का प्रस्तुतीकरण हुआ&#8230;देवी नागरानी

सर्व भारतीय भाषा सम्मेलन
 
हमें अपनी हिंदी ज़ुबाँ चाहिये
सुनाए जो लोरी वो माँ चाहिये
कहा किसने सारा जहाँ चाहिये
हमें सिर्फ़ हिन्दोस्ताँ चाहिये
तिरंगा हमारा हो ऊँचा [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=charagedil.wordpress.com&blog=1122253&post=297&subd=charagedil&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><h4><span style="color:#0000ff;">महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी द्वारा 3-4-5 अक्टूबर २००८, मुंबई में आयोजित सर्व भारतीय  सम्मेलन के अवसर पर विषयः &#8220;विदेश में भारतीय भाषाएं&#8221; के अंर्तगत इस विचारधारा का प्रस्तुतीकरण हुआ&#8230;देवी नागरानी<br />
</span></h4>
<h2><span style="color:#008000;">सर्व भारतीय भाषा सम्मेलन</span></h2>
<h4><span style="color:#ff0000;"> </span></h4>
<h4><span style="color:#ff0000;">हमें अपनी हिंदी ज़ुबाँ चाहिये</span></h4>
<h4><span style="color:#ff0000;">सुनाए जो लोरी वो माँ चाहिये</span></h4>
<h4><span style="color:#ff0000;">कहा किसने सारा जहाँ चाहिये</span></h4>
<h4><span style="color:#ff0000;">हमें सिर्फ़ हिन्दोस्ताँ चाहिये</span></h4>
<h4><span style="color:#ff0000;">तिरंगा हमारा हो ऊँचा जहाँ</span></h4>
<h4><span style="color:#ff0000;">निगाहों में वो आसमाँ चाहिये</span></h4>
<h4><span style="color:#ff0000;">मुहब्बत के बहते हों धारे जहाँ</span></h4>
<h4><span style="color:#ff0000;">वतन ऐसा जन्नत निशाँ चाहुये</span></h4>
<h4><span style="color:#ff0000;">जहाँ देवी भाषा के महके सुमन</span></h4>
<h4><span style="color:#ff0000;">वो सुन्दर हमें गुलसिताँ चाहिये</span></h4>
<p><span style="color:#ff0000;"><span style="color:#0000ff;"><br />
</span></span><span style="color:#0000ff;"> भारतवर्ष की बुनियाद &#8220;विविधता में एकता&#8221; की विशेषता पर टिकी है और इसी डोर में बंधी है देश की विभिन्न जातियाँ, धर्म व भाषाएँ. सर्व भारतीय भाषा सम्मेलन के इस मंच पर भारतीय भाषाओं के इतिहास में एक नवसंगठित सोच से नव निर्माण की बुनियाद रखी जा रही है. भाषा, सभ्यता, संस्कृति, का चोली दामन का साथ है. भारत से विभिन्न देशों में हमारे भारतीय जाकर बसे हैं -मारिशियस, सूरीनाम, जापान, मास्को, Thailand, England, USA, Canada, जहाँ उनके साथ गई है कशमीर से कन्याकुमारी तक के अनेक प्राँतों की भाषाएँ, जिसमें है उत्तर की पंजाबी, सिंधी, उड़ीया, म.पी, यू.पी की भाषाएँ, गुजराती, बंगाली, राजस्थानी,मराठी, और दक्षिण प्रंतों की तमिल, तेलुगू और कोंकणी भाषा. यही भाषाएँ अपनी अपनी संस्कृति से जुड़ी रहकर अपने प्राँतीय चरित्र को उजागर करती है.  संस्कृति को नष्ट होने से बचाना है तो सर्व भाषा प्रथम भाषा को बचाना पड़ेगा.</span></p>
<p><span style="color:#0000ff;">आज़ादी के पहले और आज़ादी के बाद जो भारतीय विदेशों में जाकर बसे उनमें सामाजिक फ़र्क है. आज़ादी के पहले वाले मजबूर, मज़दूर, कुछ अनपढ़ लोग ग़रीबी का समाधान पाने के लिये मारिशियस, सूरीनाम, गयाना, त्रिनदाद में जा बसे जहाँ  उन्हें अपनी ज़रूरतों के लिये सँघर्ष करना पडा़.</span></p>
<p><span style="color:#0000ff;">आज़ादी के बाद जो भारतीय गए वो कुशल श्रमिक भारतीय थे, पढ़े लिखे थे,  और महत्वकांक्षा वाले व्यक्ति थे. उनमें आत्म विकास की चाह और साथ साथ अपनी मात्र भूमि के विकास की चाह भी थी. भारतीय धर्म,  संस्कृति, साहित्य की पुष्ठ भूमि उनके पास भी है, लेकिन उन्हें जो अभाव विदेशों में महसूस होता है वह है, आपसी संबंधों का अभाव, पुरानी और नई पीढ़ी के बीच बढ़ता हुआ generation gap.</span></p>
<p><span style="color:#0000ff;">वहाँ की विकसित जीवन शैली और भारतीय सभ्यता, इन दोनों जीवन के रहन-सहन के अंतर के कारण एक असुरक्षा की भावना उत्पन्न होती है. संस्कृतिक मूल्यों को लेकर, पारिवारिक सँबंधों को लेकर, एक अंतर-द्वंद्व पैदा होता है,  और यही अंतर-द्वंद्व इस भारतीय भाषा के लिये बड़ी बुनियाद है.</span></p>
<p><span style="color:#0000ff;">हर इक देश की तरक्की उसकी भाषा से जुड़ी हुई होती है, जो हमारे अस्तित्व की पहचान है, उसकी अपनी गरिमा है. भाषा केवल अभिव्यक्ति ही नहीं, बोलने वाले की अस्मिता भी है, और संस्कृति  भी है जिसमें शामिल रहते हैं आपसी संबाधों के मूल्य, बड़ों का आदर-सन्मान, परिवार के सामाजिक सरोकार, रीति-रस्मों के सामूहिक तौर तरीके.<br />
विदेशों में गए हुए भारतीय परिवारों की मुलाकात जिस सभ्यता के साथ होती है, उस सभ्यता में  किशोर अवस्था आने से पहले बच्चा माँ-बाप से अलग हो जाता है, पति-पत्नि के रिश्ते की कड़ियाँ आर्थिक आज़ादी के कारण ढीली पड़ जाती हैं,  समझौते पर जीवन व्यतीत हुए जा रहे हैं. कुछ पाकर कुछ खोने के बीच के अंतरद्वंद्व का समाधान पाने के लिये, मानवीय, नैतिक, अदर्श मूल्य बनाए रखने के लिये, भारतीय संस्कृति की स्थापना करने और हिंदी को विश्व मंच पर स्थान दिलाने का कार्य किया जा रहा है. इस महायज्ञ में हिंदी भाषी ही नहीं, पंजाबी और गुजराती भाषियों का भी योगदान है, जो निरंतर वे करते आये हैं-<br />
धर्म के रूप में, साहित्य के रूप में, और भाषा के रूप में.</span></p>
<p><span style="color:#0000ff;">अब तो सरिता का बहाव अंतराष्ट्रीयता की ओर बढ़ रहा है, और अगर मैं अमेरीका की बात करूं तो इस दिशा में मक्सद को मुकाम तक लाने के लिये निम्न रूपों से प्रयत्न हो रहे हैं,<br />
१. संस्था गत<br />
२. व्यक्ति गत व<br />
३. मीडिया गत रूप में</span></p>
<p><span style="color:#0000ff;">१. संस्था गत रूप में न्यू यार्क के भारतीय विध्या भवन की ओर से हिंदी को एक दिशा हासिल हुई है,  जिसके अध्यक्ष है श्री नवीन मेहता व डा॰ पी जयरामन के निर्देशन के अंतरगत हिंदी शिक्षण और संस्थाओं के साहित्य और संस्कृतिक कार्य सफलता पूर्वक हो रहे हैं</span></p>
<p><span style="color:#0000ff;">अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति, एक ऐसा संस्थान है जो विश्व में हिन्दी भाषा और साहित्य के माध्यम से भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार के लिये काम कर रही है. इसके नेत्रित्व में भाषा की प्रगति को दशा और दिशा मिल रही है. उसके वर्तमान अध्यक्ष हैं श्री उदय शुकला.  (http://hindi.org/joomla/), इस समिति मुख्य उदेश्य हैं-<br />
हिन्दी शिक्षण &#8211; द्वितीय भाषा के रूप में<br />
प्रकाशित पत्रिका: विश्वा और ई-विश्वा<br />
समारोह और स्तरीय काव्य गोष्ठियाँ<br />
हिंदी  शिक्षण की दिशा में सफल प्रयासों के कारण आज अमेरिका में कई विश्वविध्यालयों में हिंदी पढ़ाई जाती है, लायोला, आयोवा, ओरेगन. शिकागो, वाशिंगटन, अलबामा, फ्लोरिडा, यूनीवर्सिर्टी ओफ टेक्सास, रटगर्स, एन,वाइ,यू, कोलम्बिया, हवाई, कई और भी.<br />
हिंदी को विदेशी भाषा के रूप में मान्यता हासिल हो इसके लिये निश्चित पठ्यक्रम पढ़ाने के प्रयास किये जा रहे हैं, जिससे क्षात्रों को हिंदी ज्ञान के लिये गुण (credit) मिलें.<br />
विद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों में हिन्दी को द्वितीय भाषा के रूप में पढ़ाने के लिए शैक्षणिक पाठ्यक्रम तैयार करना और शासन द्वारा हिंदी को विदेशी भाषा के रूप में मान्यता के लिये प्रयास ज़ारी हैं. न्यू जर्सी के कुछ स्कूलों में हिंदी को दूसरी भाषा के रूप में मान्यता हासिल हुई है. हम भारतीयों का लक्षय यही है कि German, French, spanish, Russi, चीनी व जापानी भाषाओं की तरह हिंदी भी हर स्कूल में पढ़ाई जाए. अमेरिका शिक्षा विभाग का ध्यान इस ओर आकर्षित किया जा रहा है. हिंदी प्रसार के इन प्रयत्नों के अतिरिक्त इसी दशक में समिति ने अपनी वेब-साइट को विकसित किया है, जिसका नाम है www.hindi.org<br />
American Council For Teaching Foreingn Language( ACTFL) की व्यवस्था के अंतरगत जून से अगस्त २००७ में  तक एक कार्यशाला हुई जिसमें चीनी, फारसी, अरबी, उर्दू को शामिल किया गया था.  इस साल ९ जून से २० जून तक Texas में Dallas के Fortworth शहर में हिंदी की कार्यशाला हुई जिसमें भावी शिक्षकों के सत्र में फ़कत सात क्षात्र थे-गुजराती, पंजाबी, मराठी, बिहारी, सिंधी और एक अमेरिकन. पेन्सिलवेनिया यूनिवर्सटी से आई प्रो॰ विजय गम्भीर की भाषा विग्यान से सम्बन्धित कक्षाएं प्रतिभागियों को बहुत अच्छी लगी. Houston की कहानीकार इला प्रसाद द्वारा ऐसी रिपोर्ट साहित्यकुँज पर पढ़ने को मिली.<br />
समारोह और स्तरीय काव्य गोष्ठियाँ  व पत्रकाएँ<br />
अंतर्राष्टीय हिन्दी समिति, हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार से जुड़ी अमेरिका की पहली और सबसे पुरानी संस्था है. इस संस्था की एक विशिष्ट परम्परा रही है , वह है अमेरिका में कवि सम्मेलनों का आयोजन. अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति का  चौदहवाँ अधिवेशन और हास्य कवि सम्मेलन वाशिंगटन डी सी में अप्रेल २००८ में आयोजित किया गया, जिसका मुख़्य विषय रहा &#8220;वैश्वीकरण के युग में हिंदी&#8221; . अधिवेशन का शुभारंभ हिन्दी के छात्रों द्वारा प्रस्तुत रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम से हुआ. अमरीका में जन्मे और पले बड़े भारतीय मूल के एवं अमरीकी बच्चों ने हिन्दी में कविता पाठ और भाषण प्रस्तुत कर उपस्थित हिन्दी प्रेमियों को रोमांचित कर दिया. इस तीन दिवसीय अधिवेशन में ९ सत्रों के आयोजन में चर्चा के मुख्य विषय थे- हिन्दी शिक्षण, प्रवासी साहित्य, व्यवसाय जगत में हिन्दी, वास्तु शास्त्र, हिन्दी शब्दावली, एवं रामचरित मानस. डॉ. सुधा ओम ढींगरा की भेजी रिपोर्ट में आयोजन की पूरी जानकारी पाई गई.<br />
इस समिति की त्रेमासिक मुख्य पत्रिका है विश्वा, जिसके संपादक है श्री शेलेन्द्र गुप्ता. Shailendra.Gupta@hindi.org).  साथ में ई- विश्वा नामक त्रेमासिक वेब पत्रिका भी देश विदेश के रचनाकारों को साहित्य से जोड़ने का बखूबी प्रयास कर रही है.  श्री अमरेंद्र कुमार. ई- विश्वा के संपादक है  (evishwa@hindi.org)<br />
इस के अतिरिक्त ’अखिल विश्व हिन्दी समिति&#8221;  संस्थागत रूप में कई स्कूलों की स्थापना करती रही  है जहाँ पर भाषा प्रेमी अटलाँटा, क्रानबरी, में अपनी सेवाएं प्रेषित कर रहे हैं इस समिति  के अध्यक्ष हैं Dr. Bijoy K. Mehta    ( http://www.hindisamiti.org/ ). इस समिति के द्वारा आयोजित एक अधिवेशन २७‍, २८ जून २००८ को NY के Hindu Center, Flushing में संपन्न हुआ.  इन सभी कार्यों से यह स्पष्ट है कि संस्थाओं द्वारा प्रवासी भारतीय भाषा की जड़ें मज़बूत करने में लगे हुए है.<br />
न्यू यार्क स्थित &#8221; विश्व हिंदी न्यास समिति&#8221;  की ओर से आयोजित सातवाँ अधिवेशन  6 और  7  अक्टूबर, 2007 में हुआ  जिसमें मैं भी शामिल रही. लोक इकाई की संपदा है लोक भाषा, लोक गीत, लोक गाथा, नाटक, कथन और प्रस्तुतीकरण, जिसका अनूठा संगम इस अधिवेशन के दौरान देखने को मिला. श्री राम चौधरी, श्री कैलाश शर्मा, और उनकी पूरी टीम ने आश्चर्यजनक रूप से &#8220;विभिन्नता में एकता&#8221; का जो समन्वय प्रस्तुत किया, वह काबिले तारीफ़ रहा. देखने को मिली हमारे देश के तीज त्यौहार की झलकियाँ, विभिन्न प्राँतों की शादियों की रस्मों के साथ पेशगी, जलियनवाला बाग की अंधाधुंध गोलियों की बौछार, और देश के वीरों के स्वतंत्रता संग्राम की स्म्रतियाँ.  समिति की ओर से प्रकाशित त्रेमाहिक पत्रिका &#8220;हिंदी जगत&#8221; देश विदेश को जोड़ने का काम कर रही है. इस कार्य में जापान से श्री सुरेश ऋतुपर्ण जुड़े हुए हैं.<br />
कुछ और भी  पत्रिकाए जो  अमेरिका व कैनेडा से साहित्य का संचार कर रही है वे है हिंदी चेतना (श्यान त्रिपाठी )वसुधा ( स्नेह ठाकुर), साहित्यकुँज(सुमन घई), अनुभूति एवं अभिव्यक्ति(पुर्णिमा वर्मन) जो भूगोल के दायरों को मिटाने में कामयाब रही है.<br />
२.  व्यक्ति गत रूप में<br />
व्यक्तिगत रूप में कुछ सस्थाएं है जो न्यू यार्क व न्यू जर्सी में बड़े ही सक्रिय रूप से कार्य कर रही हैः<br />
हिंदी.यू एस.ए अमेरिका स्थित न्यू जर्सी की जमीं पर हिंदी को नई पीढ़ी को हिंदी के साथ जोड़ने का काम कर रही है. इसके स्वयं सेवक श्री देवेंद्र सिंह अनेक गतिविधियों द्वारा प्रवासी बच्चों को भारतीय संस्कृति से जोड़े रखने में कामयाब रहे है.  पच्चीस से ज़्यादा पाठशालाएं चला रही है यह संस्था और ७०० से अधिक छात्र व छात्राएं छट्टी कक्षा तक शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं. पच्चास स्वंय सेवक इस कार्य को अंजाम दे रहे हैं. कई कार्यशालाओं का आयोजन,  मंदिरों में हिंदी बाल- विहार, घरों में, सार्वजनिक स्थानों में साप्ताहिक तौर पर हो रहा है. हिंदी.यू एस.ए हर साल हिंदी महोत्सव का आयोजन करता है जहाँ. social and cultural activities के साथ तीज त्यौहार के पर्व भी मनाए जाते हैं. हिंदी भाषा वह धागा है जो हर प्रंतीय भाषा को अपने साथ गूंथ कर उसे अपनी आत्मीयता से जोड़ लेता है.</span></p>
<p><span style="color:#0000ff;">शिक्षायतन, संस्कृति व सभ्यता का महाविश्वविद्यालय है जिसकी निर्देशिका श्रीमती पूर्णिमा देसाई पिछले १९ साल से इस संगठन का विकास अनेक त्रिवेणियों के रूप में विकसित कर रही है &#8211; हिन्दी भाषा का विकास, संगीत, नाट्य, वायलिन वादन,शास्त्रीय संगीत, अमरीका में यह एक अद्भुत महा विश्वविद्यालय है जहाँ पर वतन का दिल धड़क रहा है. हर साल दो बार संस्कृतिक कार्यक्रम होते है जहाँ संस्था के छात्रों के अलावा कई रचनाकार, लेखक भी भागीदारी लेते है जहाँ उनका सन्मान भी किया जाता है.</span></p>
<p><span style="color:#0000ff;">विध्याधाम एक और व्यक्तिगत रूप में संचार करती हुई संस्था, डा॰ सरिता मेहता के नैत्रित्व में भाषा की सरिता का प्रवाह ज़री है. न्यू यार्क के स्वामी नारायण मंदिर में हर रविवार के दिन गीतों द्वारा, चित्रावली के माध्यम से शब्दावली का उपयोग एक अनोखा संगम है. उनकी नवनीतम बाल पुस्तक &#8220;आओ हिंदी सीखें&#8221;  बाल मनोविग्यान के आधार पर एक आधार शिला बन कर राह रौशन करते हुए,  भारतीय इतिहास से जुड़ने की प्रेरणा देती है.  विध्यधाम की ओर से हर साल मंदिर में बहुभाषी सम्मेलन आयोजित किया जाता है जिसमें प्राँतीय भाषाओं के रचनाकार शामिल रहते है.</span></p>
<p><span style="color:#0000ff;">Hindu Religion classes Chinnmaya mission and Sadhu Vaswani Mission of NJ के अंतरगत आयोजित होते है, जहाँ गीता सार, संस्कृति के श्लोक व संगीत सिखाया जाता है. मात्रभाषाओं को भी प्रमुखता मिल रही है जिसमें पंजाबी, गुरमुखी, सिंध, तमिल भी देवनागरी लिपी में सिखाई जाती है. किसी ने खुब कहा है-<br />
&#8221; तुम्हारे पास लिपी है, भाषा है, इसलिये तुम हो,<br />
लिपी गुम हो जाये, भाषा लुप्त हो जाये, तुम अपनी पहचान खो बैठोगे.&#8221;</span></p>
<p><span style="color:#0000ff;">हिंदी और क्षेत्रिय भाषाओं का आपस में कोई टकराव नहीं, बल्कि वे एक दूसरे के पूरक हैं. किसी कवि की कल्पना इस संद्रभ में किस सुंदरता से भाषा की सजावट बुन रही है देखिये-<br />
भाषाएं आपस में बहनें<br />
बदल बदल कर गहने पहनें<br />
A program of Indian Cultural Foundation of America (ICFA), स्वयं सेवको द्वारा अटलाँटा में हिदी भाषा व संस्कृति को बनाये रखने का प्रयास कर रहे हैं<br />
बाल विहार हिंदी स्कूल,  1990 से अटलाँटा में कार्यरत है (a non-profit program of VHPA &#8211; Atlanta &lt;http://atlanta.vhp-america.org/&gt;  जहां भाषा व सभ्यता की प्रगति दिन ब दिन बढ रही है.<br />
३. मीडियाः<br />
वैश्वीकरण के इस दौर में संचार प्रणाली द्वारा पूरे विश्व में Telephone, mobile, computer, T.V Cinema, radio व internet जैसे माध्यमों से भौगोलिक दूरियों का मतलब बदल गया है. जनमानस पर हिंदी का प्रभाव गहरा हो गया है.<br />
ब्लाग के माध्यम से देश‍ विदेश के लोग आपस में जुड़े हैं<br />
अनेकों वेब पत्रिकाएं नई दुनिया,  वेब दुनिया, देनिक जागरण, नवभारत internet द्वारा विदेशों में बसे भारतीय जनता को प्राप्त होती है, यह एक globalisation का सफल संकेत है और इस प्रकार का आदान-प्रदान हिंदी को विश्व मंच पर स्थापित करने का महत्वपूर्ण कदम है.<br />
डलास से एक साप्ताहिक रेडियो पत्रिका &#8221; कवितांजली&#8221; हर रविवार को  प्रसारित होती है जो नेट द्वारा विश्व में सुनी जाती है. भाषाई विकास की दिशा में यह अच्छा प्रयास है. (इस प्रसारण के संयोजक: डा० नंदलाल सिंह प्रस्तुतकर्ता : आदित्य प्रकाश सिंह)<br />
हिंदी फिल्म उध्योग का भाषा के प्रचार प्रसार में बड़ा हाथ है, फिल्मी गानों के उपयोग के द्वारा हिंदी सिखाने के लिये डा॰ अंजना संधीर ने Learning Hindi and Hindi Filmi songs  पुस्तक व सी.डी. की प्रणाली से भारतीय व अमरिकन क्षात्रों को हिंदी सिखाने का सफ़ल प्रयास किया है. हिंदी को बढ़ावा देने के लिये शिक्षण रोचक बनाया जा रहा है. पुस्तकों से ज़्यादा audio-video cassets  और cds उपयोगी पाये जा रहे हैं, जहाँ सुकर, ध्वनि को पकड, कर बच्चे शब्दावली सीख रहे हैं.<br />
Internet की प्रणाली द्वारा दुनिया के किसी राष्ट्र की सीमा रेखा नहीं रही,  कंम्प्यूटर पर विभिन्न भाषाओं के font उपलब्द्ध होने के कारण वेब साईट सँस्करण अंग्रेज़ी या अन्य कई भाषाओं में पड़ा जा सकता है, जैसे &#8220;चिट्ठाजगत&#8221;. इसीसे दुनिया को global village  का रूप हासिल हुआ है. महात्मा गाँधी का विश्व ग्राम का सपना सभी भौगोलिक सीमाएं तोड़कर आधुनिक संचार प्रणालियों द्वारा साकार होता हुआ दिखाई दे रहा है.<br />
श्री सुरेन्द्र गम्भीर  ने प्रंतीय भाषाओं के संदर्भ में जो कहा , वही सत्य दोहराते हुए यह मानना होगा कि &#8220;मौलिक चिंतन यदि अपनी मात्र भाषा में ही किया जाये तो उसका परिणाम अनुकूल होता है. भाषा की स्थिति जटिल तब होती है जब वह प्रयोग में नहीं आती हो या अपनी पहचान खो देती है.&#8221;<br />
इन्सान मानव जाति का प्रतिनिधि है ओर भाषा माँ सम्मान होती है जो हर प्राँत से मात्रभाषा का सैलाब बनकर बहती है, और वह तब तक सुरक्षित है जब तक प्रचार-प्रसार के हर अंग का पालन होता रहेगा. Charity begins at home , के इस सत्य का अनुकरण करते हुए अगर भाषा की शुरूवात शिशु से होती है, उसके साथ आंगन में लोरी बनकर, या गायत्री मंत्र की गूंज बनकर गूंजती है तो सच मानिये, हमें किसी भाषा भय से परीचित होना पड़े, या उस भाषा के लुप्त होने को लेकर किसी शंका या समाधान के बारे में चिंतित होने की आवश्यक्ता नहीं. जब तक यही मात्र भाषा व संस्कृति की मिली जुली वसीयत विरासत के रूप में आने वाली पीढ़ियों को मिलती रहेगी, तय है कि हमारे साथ साथ हमारी भाषा भी जी पायेगी. संस्कृति तोड़ने की नहीं जोड़ने की प्रतिक्रिया है. प्रवासियों ने भारतीय भाषा और संस्कृति को जिस तरह विश्व भर में फैलाया है, वह प्रयास अद्वतीय है. इसीसे विदेश में हिंदी भाषा के प्रचार में इज़ाफा हुआ जा रहा है. यह उनके साहित्य के प्रति प्रेम, जागरूकता व निष्ठा का फल है, इस सच्चाई से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता.<br />
इस सफल भाषा के महायग्य के लिये बधाई के पात्र है महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी के कार्याध्यक्ष श्री नंदकिशोर नौटियाल, सफल संयोजक डा॰ सुशीला गुप्ता, सदस्य सचीव श्री अनुराग त्रिपाठी व उनकी समस्त टीम जिनके एवज़ इस भाषायी नवजागरण का नया आगाज़ मुमकिन रहा.<br />
विशव मंच पर इस प्रतिभाशाली नव युग की पीढ़ी को सर्व भाषाओं की दिशा में विकसित होता देखकर यह महसूस होता है, कि हर युग में रविंद्रनाथ टैगोर का एक शंतिकेतन स्थापित हो रहा है. विश्वास सा बंधता चला जा रहा है की देश हमसे दूर नहीं है, जहाँ जहाँ इस तरह की संस्कृति पनपती रहेगी वहीं वहीं हिंदुस्तान का दिल धड़कता रहेगा और उसकी सुगन्ध चहूँ ओर रोके नहीं रुकेगी. मेरी ग़ज़ल का एक शेर इसी भाव में भीना भीना सा-<br />
रहती महक है इसमें, मिट्टी की सौंधी सौंधी<br />
मेरे वतन की खुशबू, केसर लुटा रही है.<br />
इस सफल प्रयास के महायग्य के लिये बधाई के हक़दार है महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी के कार्याध्यक्ष श्री नंदकिशोर नौटियाल, सदस्य सचिव श्री अनुराग त्रिपाठी, सम्मेलन‌‌ -संयोजक डा॰ सुशीला गुप्ता और अकादमी की समस्त कुशल कार्यकर्ता टीम, जिनके एवज। इस भाषाई नवजागरण का आगाज़ मुमकिन रहा<br />
जयहिंद<br />
देवी नागरानी, अक्टूबर ४, २००८, dnangrani@gmail.com</span></p>
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		<title>हिंदी का प्रवासी साहित्य</title>
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		<pubDate>Thu, 27 Nov 2008 07:11:39 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Devi Nangrani</dc:creator>
				<category><![CDATA[भाषा विमर्ष]]></category>

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		<description><![CDATA[हिंदी का प्रवासी साहित्य&#8230;..

गर्भनाल के २१ वे अंक में प्रकाशित श्री कमल किशोर गोयनका से डा॰ सुधा ओम ढींगरा की बातचीत पर प्रतिक्रिया गर्भनाल के २४ वे अंक

प्रेमचंद स्कालर और प्रेमचंद विशेषज्ञ श्री कमल किशोर गोयनका से रूबरू हुई अमेरिका की साहित्यकारा सुधा ओम ढींगरा, जो अपनी साहित्य की रचनात्मक दुनिया में कई संस्थानों से [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=charagedil.wordpress.com&blog=1122253&post=295&subd=charagedil&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><h1><span style="color:#ff0000;">हिंदी का प्रवासी साहित्य&#8230;..<br />
</span></h1>
<h4><span style="color:#0000ff;">गर्भनाल के २१ वे अंक में प्रकाशित श्री कमल किशोर गोयनका से डा॰ सुधा ओम ढींगरा की बातचीत पर प्रतिक्रिया गर्भनाल के २४ वे अंक</span></h4>
<h4><span style="color:#0000ff;"><br />
प्रेमचंद स्कालर और प्रेमचंद विशेषज्ञ श्री कमल किशोर गोयनका से रूबरू हुई अमेरिका की साहित्यकारा सुधा ओम ढींगरा, जो अपनी साहित्य की रचनात्मक दुनिया में कई संस्थानों से जुड़ी रहकर हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार को नियमित रूप से आगे बढ़ा रही हैं। उनकी बातचीत साहित्य की चौखट पार करती हुई सवालों के दरमियान मुड़ी है प्रवासी साहित्य के भविष्य की ओर। प्रवासी साहित्य की इस नई प्रवृत्ति की ओर ध्यान नहीं दिया गया है और उपेक्षा-भाव रखा जा रहा है, इस सिलसिले में कुछ मान्यताएँ, कुछ शंकायें, कुछ समाधान जो श्री कमल किशोर जी ने अपनी बातचीत के दौरान विस्तार से खुलासा किये हैं, उनको जानते हुये उनका लगाव हिन्दी के प्रवासी साहित्य के प्रति जाहिर होता है। हिन्दी साहित्य के प्रचार-प्रसार तथा प्रतिष्ठा के लिये वह जो प्रोत्साहन का कार्य कर रहे हैं वह काबिले-तारीफ  है।</span></h4>
<h4><span style="color:#0000ff;"> गुफ्तगू की धारा में आते-जाते हिन्दी भाषा को लेकर जो साहित्य का सफ़र है इसी की राह की विडंबनाएँ, अड़चनाएँ, उपेक्षाएँ पढ़ते हुये जहाँ मुझे हैरानी हुई, वहीं खुशी भी हुई। हैरानी इसलिये हुई यह जानकर कि साहित्य का मूल्यांकन करने वाले अपनी विचारधारा, अपनी सोच से समीक्षात्मक टिप्पणियों से यह जतलाते हैं कि प्रवासी साहित्य तो साहित्य ही नहीं है और अगर है तो वह आधुनिकता से शून्य है। खुशी इस सोच की प्रस्तुति से हुई कि श्री कमल किशोर जी की मान्यता एक नहीं अनेकों विचारधाराओं से स्पष्टीकरण करती है कि हिन्दी का प्रवासी साहित्य हिन्दी का ही साहित्य है, जो परदेश में रचा गया है।</span></h4>
<h4><span style="color:#0000ff;"> हिन्दी हमारे भारत देश की राष्ट्रभाषा के पहले हमारी मातृभाषा भी है जो आदान-प्रदान का माध्यम है, हर क्षेत्र में, घरों में, स्कूल-कालेज में, कई कार्यशालाओं में, जहाँ के कर्मचारी अंग्रेजी भाषा से ज्यादा परिचित नहीं हैं। बात भाषा की है- हिन्दी भाषा की, कोई भी साहित्य जो हिन्दी में रचा है या रचा जा रहा है वह हिन्दी का साहित्य ही है, अन्यथा कुछ नहीं, साहित्य की धारायें तो अपनी-अपनी विचारधाराओं की उपज हैं।</span></h4>
<h4><span style="color:#0000ff;"> जिस किसी भाषा में एक रचनाकार कलम के जरिये साहित्य कला को प्रस्तुत करेगा वह उसी भाषा का साहित्य होगा। अगर सिंधी भाषा में लिखा गया कोई लेख, आलेख, संस्मरण, कहानी, गीत या ग़ज़ल &#8211; जो भी स्वरूप रचना का हो तो वह सिंधी साहित्य का हिस्सा ही है, चाहे वह भारत में बैठकर लिखा गया हो या विदेश में और वह बिल्कुल पत्रिकाओं और अखबारों में छपता है क्योंकि सिंधी लेखक की रचना उसकी मूलभाषा में है। कभी तो संपादकों की माँग रहती है कि कुछ प्रवास की रोजमर्रा जिन्दगी के बारे में, आचार-विचार के बारे में, या वहाँ जो दिक्कतें, दुश्वारियाँ सामने आती हैं उनके बारे में लिख भेजें।</span></h4>
<h4><span style="color:#0000ff;"> श्री कमल किशोर जी की विचारधारा से मैं शामिल राय हूँ, जिनका कहना है- &#8221;प्रवासी साहित्य हिन्दी का साहित्य है जिसका रंग-रूप, उसकी चेतना और संवेदना भारत के हिन्दी पाठकों के लिये नई वस्तु है, एक नये भाव-बोध का साहित्य है, एक नई व्याकुलता और बेचैनी का साहित्य है जो हिन्दी साहित्य को अपनी मौलिकता एवं नये साहित्य संसार से समृध्द करता है। इस प्रवासी साहित्य की बुनियाद भारत-प्रेम तथा स्वदेश-परदेश के द्वन्द्व पर टिकी है।&#8221; साहित्य तो एक माध्यम है अपने विचारों को अभिव्यक्त करने का, समाज में एक-दूसरे के साथ जुड़ने का शंकाओं से निकलकर समाधान पाने के रास्तों पर बढ़ने का। </span></h4>
<h4><span style="color:#0000ff;">यहाँ पर श्री कमल किशोर की पारखी नजर और दूरदेशी को मान्यता देते हुये यही कह सकती हूँ कि उनके सुझाये हुये समाधान जो प्रवासी हिन्दी साहित्य को, हिन्दी की मुख्यधारा का अंग बना सके और इस बात को भी उजागर कर सके कि साहित्य का उद्देश्य साहित्यिक ही है, राजनीतिक नहीं। अगर कोई दलित लेखक या उस साहित्य का शोध करने वाला दलितों के बारे में, उनकी समस्याओं के बारे में, कुछ शंकाओं, समाधानों का विवरण एक राय के तौर पर प्रस्तुत करता है तो वह दलित साहित्य ही हो जाता है और वह पूरे हक के साथ प्रकाशित होता है और होना भी चाहिये। साहित्य राजनीति नहीं है।</span></h4>
<h4><span style="color:#0000ff;"> इस आधुनिक युग में जहाँ युवा पीढ़ी अपनी पढ़ाई के उपरांत बाहर जाती है विकास के लिये तो भारत की वह संतान अपने साथ भारतीय परम्पराएँ और संस्कृति भी ले जाती है, जिसे वह अपनी आने वाली नस्ल को भी प्रदान करने की भरपूर चेष्टा में लगी हुई है। यह इस बात का पुष्टीकरण है कि जैसे-जैसे अमेरिका में भारतीयों की संख्या बढ़ती जा रही है वैसे-वैसे हमारे कुछ कर्मठ हिन्दी प्रेमी बड़ी लगन के साथ हिन्दी के प्रचार-प्रसार में तन-मन और धन से लगे हुये हैं। वह भारतीयता का जज़्बा अभी जिन्दा है जिसको लेकर हिन्दी प्रेमी व्यक्तियों ने हिन्दी की कक्षाएँ शुरू की हैं। यह इन प्रवासी भारतीयों का योगदान है जो निरंतर भारतीय संस्कृति को बनाए रखने में लगे हुये हैं।</span></h4>
<h4><span style="color:#0000ff;"> आज अमेरिका के कई विश्वविद्यालयों में हिन्दी पढ़ाई जाती है। भारतीय बच्चों को भाषा और संस्कृति सिखाने के लिये जगह-जगह भारतीय शालाएँ प्रारम्भ हुई हैं। लोग साप्ताहिक कार्यक्रम के तहत मंदिरों में, घरों में या सार्वजनिक स्थानों में बच्चों को हिन्दी पढ़ाने में लगे हुये हैं। अमेरिकी शिक्षा विभाग का ध्यान भी इस ओर आकर्षित किया जा रहा है ताकि जर्मन, फ्रेंच, रूसी, चीनी और जापानी भाषाओं की तरह प्रत्येक स्कूल में हिन्दुस्तानी भाषा भी पढ़ाई जाये। यह उन्हीं प्रवासी हिन्दुस्तानियों की बदौलत, उनकी साहित्य निष्ठा की एवज आज यू.एस.ए में हिन्दी भाषा और अनेक मातृभाषाओं के सीखने-सिखाने की हलचल शुरू हो चुकी है। अमेरिका विश्व के उन देशों में से है जहाँ प्रवासी भारतीयों और भारतवंशियों की सबसे ज़्यादा उपस्थिति है, न्यूयार्क विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जहँ भारतीय मूल के वासी अपनी प्रतिभा लगन और मेहनत से बनाए हुए हैं. हिन्दी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिल रही है उसका एक मूल कारण है प्रवासी भारतीय, जो भारत की संस्कृति को जोड़ने का महत्वपूर्ण प्रयास करती आ रहा है। इस भाषा के विकास में अनिवासी भारतीयों तथा विद्वानों, लेखकों और शिक्षकों का योगदान है। इससे ज़ाहिर है कि जो जन देश से परदेस  में जा बसा है और अपनी मात्रभाषा या राष्ट्रभाषा में साहित्य का स्रजन करता है, वह स्वदेशी साहित्य है, परदेसी नहीं. अपनी सोच से खींची हुई अगर ये भाषाई रेखाएं व उनकी हदों सरहदों की लकीरें मिटा दें तो यह साफ़ साफ़ नज़र आएगा कि अपने देश की भाषा में रचित साहित्य देश का है, क्योंकि हम भारतवासी हैं और भाषा बोतले और लिखते वक्त हमारी वाणी व लेखनी द्वारा जाति के अध्याय का गौरव छलकता है, इस बात को नकारा नहीं जा सकता। हम इस देश के वारिस है, यहां की स्स्क्रुति के वारिस हैं, अतिशयोक्ति न होगी कहने में में अंग्रेज़ी माहौल के बीच में हिंदी भाषा व उस स्स्क्रुति को बनाये रखने की दिशा में जो लगन व निश्चय से काम कर रहे हैं वह काबिले तारीफ है. अंधेरों से एक सुरंग जिससे अपनी भाषा की रौशनी की किरणें फैलकर अंतराष्ट्रीय स्तर पर उजाला प्रदान करने वाले साहित्य के सेनानी है उन्हें नज़र  अंदाज़ नहीं किया जा सकता.</span></h4>
<h4><span style="color:#0000ff;"> भारतीय राष्ट्र की इमारत किसी विदेशी भाषा की नींव पर नहीं रखी जा सकती। भारतीय भाषा को सीखने और सिखाने के इस निष्फल प्रयास को अभिनंदन करते हुये यही कहा जा सकता है कि ये प्रवासी भारतीय सैनिक की भांति अपने वतन से दूर, गर्दिशों से जूझते, मुश्किलों के बीच से भाषा की एक सुरंग खोद रहे हैं जहाँ पर भारतीय भाषा और उस भारतीय संस्कृति को जीवंत रख कर ये सच्चे सिपाही इन्हीं संस्थाओं, शिक्षा घरों, विद्यालयों में तैनात अगर कुछ कर पा रहे हैं तो एकमात्र, हाँ एकमात्र वह सिर्फ हिन्दुस्तान की महिमा बढ़ा रहे हैं। अगर ऐसा न होता तो कौन पहचानता वहाँ पर हिन्दुस्तानियों को जो अब प्रवासी कहलाये जा रहे हैं और जो साहित्य वहाँ रचा जा रहा है उसे प्रवासी साहित्य से अलंकृत किया जा रहा है। हिन्दी साहित्य जहाँ भी लिखा जा रहा है देश में हो चाहे परदेश में वह हिन्दी साहित्य ही है।</span></h4>
<h4><span style="color:#0000ff;"> महात्मा गाँधी ने विश्वग्राम का जो सपना देखते हुये कहा था- &#8221;मैं नहीं चाहता कि मेरा घर चारों ओर दीवारों से घिरा रहे। न मैं अपनी खिड़कियों को ही कसकर बंद रखना चाहता हूँ। मैं तो सभी देशों की संस्कृति का अपने घर में बेरोक-टोक संचार चाहता हूँ।&#8221; आज विज्ञान के प्रसारित ज्ञान के एवज में इंटरनेट के द्वारा विश्व जुड़ता हुआ नजर आता है। अपनी सारी भौगोलिक सीमाएँ तोड़कर एक &#8216;विश्वग्राम&#8217; को साकार स्वरूप देकर।</span></h4>
<h4><span style="color:#0000ff;"> द्वितीय विश्व हिन्दी सम्मेलन मारिशस में प्रस्तुत डॉ. ओदोलेन स्मेकल के भाषण के एक अंश में हिन्दी-राष्ट्रीयता और अंतरराष्ट्रीयता के संदर्भ में कहा था- &#8221;मेरी दृष्टि में जो स्वदेशी सज्जन अपनी मातृभाषा या किसी अपनी मूल भारतीय भाषा की अवहेलना करके किसी एक विदेशी भाषा का प्रयोग प्रात: से रात्रि तक दिनों दिन करता है, वह अपने देश में स्वदेशी नहीं, परदेशी है।&#8221; </span></h4>
<h4><span style="color:#0000ff;"> हिन्दी की न केवल भौगोलिक परन्तु भाषागत सीमाएँ वास्तव में असीम हैं। इस सत्य के आइने में यह विचारधारा सरासर अनुचित है कि जो लेखक प्रवास में, देश से परे रहकर अपनी मातृभाषा में या राष्ट्रभाषा हिन्दी में लिखते हैं तो वह साहित्य &#8216;प्रवासी&#8217; है। देश के वासी क्या वतन से दूर रहकर अपने देश के वासी नहीं रहते? क्या वे परदेशी हो जाते हैं? </span></h4>
<h4><span style="color:#0000ff;"> आठवें विश्व हिन्दी सम्मेलन के अवसर पर विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी के संदेश का यह अंश- &#8221;हिन्दी का महत्व केवल इसलिये नहीं है कि यह देश के एक बड़े भू-भाग में बोली जाती है बल्कि इसलिये भी है कि इसमें अन्य भाषाओं को अपने अंदर समाहित करने की उदारता है।&#8221; आज इसी बात को लेकर यह सवाल मन में उभरकर आता है कि अन्य भाषाओं की बात तो दूर है, पर विदेश में लिखी हुई हिन्दी भाषा के साहित्य को अपने देश के हिन्दी साहित्य की मुख्यधारा का अंग भी माना जाता है या नहीं? हिन्दी का साहित्य और प्रवासी साहित्य एक है या नहीं? हालाँकि इस बात में कोई शक नहीं कि हिन्दी के प्रवासी साहित्य का रंग-रूप, उसकी चेतना और संवेदना भारत के हिन्दी पाठकों के लिये नई वस्तु है। ऐसा साहित्य जो अपनी मौलिकता एवं नये साहित्य संसार से हिन्दी साहित्य को समृध्द करता है।</span></h4>
<h4><span style="color:#0000ff;"> डॉ. अंजना संधीर द्वारा संपादित कहानी संग्रह &#8216;प्रवासी आवाज&#8217; के प्रवेश पन्नों में डॉ. कमल किशोर गोयनका का यह अंश इस बात की ओर बखूबी इशारा कर रहा है कि अमेरिका में रचा हुआ यह संकलन हिन्दी की मुख्यधारा का अंग बनेगा। उनके शब्दों में- &#8221;अमेरिका के 44  प्रवासी हिन्दी कहानीकारों की कहानियों का यह संकलन निश्चय ही हिन्दी में नई संवेदना, नया परिवेश, नयी जीवनदृष्टि तथा नये सरोकारों का  द्वार खोलेगा।&#8221; उसी संकलन में दिल्ली की राजी सेठ का कहना है- &#8221;हिन्दी साहित्य लेखन की मुख्यधारा में वृध्दि, समृध्दि और विश्वास का वातावरण पैदा करेगी। इतना ही नहीं, प्रवासी भारतीयों के इस योगदान के चलते सांस्कृतिक राष्ट्रीय धरातल पर उनका स्थान भी सुरक्षित करेगी। हिन्दी लेखन की मुख्यधारा को ऐसी समावेशिता के लिये कृतज्ञ होना होगा। अंजना का भी, जिसके यत्नों ने इन सब मुद्दों को विचारणीय और दर्शनीय धरातल पर ला दिया है।&#8221; इस सशक्त व्यक्तित्व की मलिका डॉ. अंजना संधीर ने विश्व हिन्दी सम्मेलन के दौरान अमेरिका के रचनाकारों की प्रदर्शिनी, उनकी गतिविधियों के चित्रों की पिक्टोरियल गैलरी लगाई। बस एक ही जज्बा था जो धड़क-धड़क कर कह रहा था- &#8221;हम भी लिखते हैं, यहाँ समुद्र नहीं तो रेगिस्तान भी नहीं।&#8221; विदेश राज्यमंत्री श्री आनंद शर्मा ने उस प्रदर्शनी का उद्धाटन किया और सचमुच वहाँ पर हिन्दी रचनाकारों की  पुस्तकें, पुरानी पत्रिकाएँ और तस्वीरें देखकर उन्हें आश्चर्य हुआ और उसी रोज 13 जुलाई 2007 शाम को 25 अमेरिकी रचनाकारों की एक ही वर्ष में प्रकाशित 36 पुस्तकों का विमोचन शाम 6.30 बजे टी-मरफी हाल में श्री आनंद शर्मा के हाथों लोकार्पण हुआ जिसमें मेरा गजल संग्रह &#8216;चरागे दिल&#8217; भी शामिल था।</span></h4>
<h4><span style="color:#0000ff;"> यह सब उदाहरण अपने संकेतों से स्पष्टीकरण कर रहे हैं कि साहित्य राजनीति नहीं है जिसके हम उसे किसी धारा के तहत रखें, परखें या नामकरण दें। साहित्य साहित्य है और कुछ नहीं। अगर भारत के हिन्दी साहित्य को एक धारा के अंतर्गत शामिल किया जाता है और प्रवासी हिन्दी साहित्य धारा को एक और धारा के अंतर्गत रखा जाता है तो फिर भाषा के विकास में उतनी गति नहीं आ पायेगी। भारत में लिखे जाने वाले हिन्दी साहित्य को अन्य देशों तक और अन्य देशों में साहित्यकारों की हिन्दी रचनाओं को भारत तक पहुँचाना एक महत्वपूर्ण कार्य है। आज जब हिन्दी राष्ट्र भाषा से विश्वभाषा बनने जा रही है उस राष्ट्रभाषा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी साहित्यकारों का बड़ा हाथ होगा, चाहे वो भारत देश का हो या भारत के बाहर रहने वाले प्रवासी भारतीय। जब राष्ट्रभाषा में इतना संगठन, इतना एकात्मपन न होगा कि वह एक भाषा में बात कर सके तो विचार करने योग्य बात है कि उस भाषा का प्रचार कैसे बढ़े। 1934, 29 दिसम्बर को भारत हिन्दी प्रचार सभा मद्रास में एक भाषण में मुंशी प्रेमचंद के विचार &#8216;राष्ट्रभाषा और उसकी समस्याओं&#8217; के तहत कुछ यूँ थे- &#8221;मैं जो कुछ अनाप-शनाप बकूँ, उसकी खूब तारीफ कीजिये, उसमें जो अर्थ न हो, वह पैदा कीजिये, उसमें अध्यात्म के और साहित्य के तत्व खोज निकालिये&#8230;।&#8221;  तमिलनाडू हिन्दी अकादमी के अध्यक्ष डा॰ बालशौरि रेड्डी का इस विषय पर एक सिद्धाँतमय कथन है &#8220;हिंदी का साहित्य जहाँ भी रचा गया हो  और जिसने भी रचा हो, चाहे वह जंगलों में बैठ कर लिखा गया हो या ख़लिहानों में,  देश में हो या विदेश में, लिखने वाला कोई आदिवासी हो, या अमेरिका के भव्य भवन का रहवासी, वर्ण, जाति धर्म और वर्ग की सोच से परे,  अपनी अनुभूतियों को  हिंदी भाषा में एक कलात्मक स्वरूप देता है,  तो वह लेखक हिन्दी भाषा में लिखने वाला कलमकार होता है और उसका रचा साहित्य हिन्दी का ही साहित्य है.&#8221; </span></h4>
<h4><span style="color:#0000ff;"> हिन्दी का साहित्य विश्व में, हिन्दी की अंतरराष्ट्रीयता को बुलंदी के साथ स्थापित कर रहा है, इस बात में कोई शक नहीं,चाहे वह मारिशस का हिन्दी साहित्य हो या अमेरिका का हिन्दी साहित्य, मास्को का हो या चीन का, सूरीनाम का हो या इंग्लैंड का। हिन्दी के साहित्य की हर धारा उसी में मिलकर एक राष्ट्रीय भाषा हिन्दी की सरिता जब बनकर बहेगी तब ही वह सैलाब अंतरराष्ट्रीय धरातल पर अपना स्थान पा सकेगा। जयहिंन्द</span></h4>
<h4><span style="color:#0000ff;">देवी नागरानी,न्यू जर्सी, अगस्त २००८</span></h4>
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		<title>यूं उसकी बेवफाई का मुझको गिला न था</title>
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		<pubDate>Thu, 27 Nov 2008 07:04:11 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Devi Nangrani</dc:creator>
				<category><![CDATA[ग़ज़ल-देवी नागरानी]]></category>
		<category><![CDATA[चराग़े-दिल संग्रह]]></category>

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		<description><![CDATA[ग़ज़लः३९
यूं उसकी बेवफाई का मुझको गिला न था
इक मैं ही तो नहीं जिसे सब कुछ मिला न था.
लिपटे हुए थे झूठ से कोई सच्चा न था
खोटे तमाम सिक्के थे, इक भी खरा न था.
उठता चला गया मेरी सोचों का कारवां
आकाश की तरफ कभी, वो यूं उड़ा न था.
माहौल था वही सदा, फि़तरत भी थी वही
मजबूर [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=charagedil.wordpress.com&blog=1122253&post=292&subd=charagedil&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><h4 style="text-align:center;"><span style="color:#800000;">ग़ज़लः३९</span></h4>
<h4 style="text-align:center;"><span style="color:#800000;">यूं उसकी बेवफाई का मुझको गिला न था</span></h4>
<h4 style="text-align:center;"><span style="color:#800000;">इक मैं ही तो नहीं जिसे सब कुछ मिला न था.</span></h4>
<h4 style="text-align:center;"><span style="color:#800000;">लिपटे हुए थे झूठ से कोई सच्चा न था<br />
खोटे तमाम सिक्के थे, इक भी खरा न था.</span></h4>
<h4 style="text-align:center;"><span style="color:#800000;">उठता चला गया मेरी सोचों का कारवां<br />
आकाश की तरफ कभी, वो यूं उड़ा न था.</span></h4>
<h4 style="text-align:center;"><span style="color:#800000;">माहौल था वही सदा, फि़तरत भी थी वही<br />
मजबूर आदतों से था, आदम बुरा न था.</span></h4>
<h4 style="text-align:center;"><span style="color:#800000;">जिस दर्द को छुपा रखा मुस्कान के तले<br />
बरसों में एक बार भी कम तो हुआ न था.</span></h4>
<h4 style="text-align:center;"><span style="color:#800000;">ढ़ोते रहे है बोझ सदा तेरा जिंदगी<br />
जीने में लुत्फ़ क्यों कोई बाक़ी बचा न था.</span></h4>
<h4 style="text-align:center;"><span style="color:#800000;">कितने नक़ाब ओढ़ के &#8216;देवी&#8217; दिये फरेब<br />
जो बेनकाब कर सके वो आईना न था.<br />
चराग़े-दिल/ ६५</span></h4>
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		<title>काव्य गोष्टी संपन्न</title>
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		<pubDate>Sun, 17 Aug 2008 17:25:09 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Devi Nangrani</dc:creator>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[Add new tag]]></category>

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		<description><![CDATA[&#8220;कुतुबनुमा&#8221; का तीसरे अंक का लोकार्पण एवं काव्य गोष्टी संपन्न
आयोजित काव्य गोष्टी रविवार दिनांक १० अगस्त २००८ को श्रीमती देवी नागरानी जी के निवास स्थान, बांद्रा पर वरिष्ट ग़ज़लकार श्री मा.ना. नरहरी, की अध्यक्षता तथा श्री अनंत श्रीमाली जी के कुशल संचालन के साथ संपन्न हुई.
अभिव्यक्ति की आज़ादी की पैरोकार त्रेमासिक पत्रिका &#8220;कुतुबनुमा&#8221;. के तीसरे [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=charagedil.wordpress.com&blog=1122253&post=284&subd=charagedil&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><h2><span style="color:#ff6600;"><a href="http://charagedil.files.wordpress.com/2008/08/10-ag-kavyag.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-286" src="http://charagedil.files.wordpress.com/2008/08/10-ag-kavyag.jpg?w=219&#038;h=166" alt="" width="219" height="166" /></a>&#8220;कुतुबनुमा&#8221; का तीसरे अंक का लोकार्पण एवं काव्य गोष्टी संपन्न</span></h2>
<h4><span style="color:#0000ff;">आयोजित काव्य गोष्टी रविवार दिनांक १० अगस्त २००८ को श्रीमती देवी नागरानी जी के निवास स्थान, बांद्रा पर वरिष्ट ग़ज़लकार श्री मा.ना. नरहरी, की अध्यक्षता तथा श्री अनंत श्रीमाली जी के कुशल संचालन के साथ संपन्न हुई.</span></h4>
<h4><span style="color:#0000ff;">अभिव्यक्ति की आज़ादी की पैरोकार त्रेमासिक पत्रिका &#8220;कुतुबनुमा&#8221;. के तीसरे अंक, जून-अगस्त २००८, में अपने श्रेष्ट संपादन का सिक्का जमाया है डा॰ राजम नटराजन पिल्लै जी ने जिनका परिचय देना सूरज को उंगली दिखाने के समान है. उनका संपादन ही उनका परिचय है और पहचान भी है. विशेष रूप से राजम जी ने बरलिन से आई साहित्यकारा सुशीला शर्मा जी, नरहरि जी का स्वागत फूलों से किया और देवी नागरानी ने मुंबई की वरिष्ट ग़ज़लकारा मरियम ग़ज़ाला का सन्मान फूल व शाल के साथ किया. पत्रिका का लोकार्पण साहित्यकारा सुशीला शर्मा जी ने किया जिसके साथ उपस्थित रहीं डा॰ राजम, श्री मा.ना. नरहरी, देवी नागरानी, और अनंत श्रीमाली.</span></h4>
<h4><span style="color:#0000ff;">+चित्र में दाये से बायें सुशिला शर्मा, देवी नागरानी, राजम पिलै, अनंत श्रीमाली, श्री मा.ना. नरहरी, श्री अक्षय जैन</span></h4>
<h4><span style="color:#0000ff;">इस गोष्टी में पधारे मुंबई के अनेक शाइर व रचनाकार, मुख्य महमान रहे &#8220;दाल रोटी&#8221; के प्रधान संपादक श्री अक्षय जैन जिनकी पुस्तक &#8221; आगे और लड़ाई है&#8221; का विमोचन डा॰ राजम नटराजन के हाथों संपन्न हुआ. गोष्टी में अपनी रचनाओं का पाठ करते हुए एक सप्तरंगी श्रिंगार से सजी माला पेश हुई जिसमें पिरोये गए थे मुक्तक, दोहे, गीत, ग़ज़ल और लघुकथा. संवाद करने के लिये भाषा का विस्तार जो हर सीमा को तोड़ता हुआ आगे बढ़ रहा है उसको सुसजित किया शामिल रचनाकार कुमार शैलेन्द्र जी, खन्ना मुज़फ्फ़रपुरी, मुरलीधर पाण्डेय, रमेश श्रीवास्तव, मरियम ग़ज़ला, देवमणी पांडेय, अरविंद शर्मा &#8220;राही&#8221; , रामप्यारे रघुवंशी, अक्षय जैन, संजीव निगम, संगीता सहजवाणी, शिवदत &#8220;अक्स&#8221;, रेखा &#8220;रौशनी&#8221;, कुलवंत सिंह, रवींद्र प्रकाश हंस, रज़ा साहब, ताज वारसी साहब, रत्ना झा और मेघा श्रीमाली ने </span></h4>
<h4><span style="color:#0000ff;">डा॰ राजम जी को इस दिशा सूचक &#8220;कुतुबनुमा&#8221; के लिये अपनी दिली मुबारकबाद और शुभकामनायें प्रेषित करते हुए देवी नागरानी जी सभी आए हुए कविगण व अतिथि गण का सन्मान सहित आभार प्रकट किया. जयहिंद</span></h4>
<p> </p>
<h4><span style="color:#0000ff;">देवी नागरानी</span></h4>
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	</item>
		<item>
		<title>बहारों का आया है मौसम</title>
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		<pubDate>Sun, 17 Aug 2008 17:20:53 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Devi Nangrani</dc:creator>
				<category><![CDATA[ग़ज़ल-देवी नागरानी]]></category>
		<category><![CDATA[चराग़े-दिल संग्रह]]></category>

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		<description><![CDATA[ग़ज़लः ४१
बहारों का आया है मौसम सुहाना
नये साज़ पर कोई छेड़ो तराना.
ये कलियां, ये गुंचे ये रंग और खुशबू
सदा ही महकता रहे आशियाना.
हवा का तरन्नुम बिखेरे है जादू
कोई गीत तुम भी सुनाओ पुराना. 
चलो दोस्ती की नई रस्म डालें
हमें याद रखेगा सदियों जमाना.
खुशी बाँटने से बढ़ेगी जि़यादा
नफ़े का है सौदा इसे मत गवाना.
मैं देवी खुदा से [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=charagedil.wordpress.com&blog=1122253&post=282&subd=charagedil&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><h3 style="text-align:center;"><span style="color:#0000ff;">ग़ज़लः ४१</span></h3>
<h3 style="text-align:center;"><span style="color:#0000ff;">बहारों का आया है मौसम सुहाना</span></h3>
<h3 style="text-align:center;"><span style="color:#0000ff;">नये साज़ पर कोई छेड़ो तराना.</span></h3>
<h3 style="text-align:center;"><span style="color:#0000ff;">ये कलियां, ये गुंचे ये रंग और खुशबू</span></h3>
<h3 style="text-align:center;"><span style="color:#0000ff;">सदा ही महकता रहे आशियाना.</span></h3>
<h3 style="text-align:center;"><span style="color:#0000ff;">हवा का तरन्नुम बिखेरे है जादू</span></h3>
<h3 style="text-align:center;"><span style="color:#0000ff;">कोई गीत तुम भी सुनाओ पुराना.</span><span style="color:#0000ff;"> </span></h3>
<h3 style="text-align:center;"><span style="color:#0000ff;">चलो दोस्ती की नई रस्म डालें</span></h3>
<h3 style="text-align:center;"><span style="color:#0000ff;">हमें याद रखेगा सदियों जमाना.</span></h3>
<h3 style="text-align:center;"><span style="color:#0000ff;">खुशी बाँटने से बढ़ेगी जि़यादा</span></h3>
<h3 style="text-align:center;"><span style="color:#0000ff;">नफ़े का है सौदा इसे मत गवाना.</span></h3>
<h3 style="text-align:center;"><span style="color:#0000ff;">मैं देवी खुदा से दुआ मांगती हूं</span></h3>
<h3 style="text-align:center;"><span style="color:#0000ff;">बचाना, मुझे चश्मे-बद से बचाना.</span></h3>
<h3 style="text-align:center;"><span style="color:#0000ff;">चराग़े</span><span style="color:#0000ff;">-दिल/ ६७</span></h3>
<img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/categories/charagedil.wordpress.com/282/" /> <img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/tags/charagedil.wordpress.com/282/" /> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/charagedil.wordpress.com/282/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/charagedil.wordpress.com/282/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/charagedil.wordpress.com/282/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/charagedil.wordpress.com/282/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/charagedil.wordpress.com/282/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/charagedil.wordpress.com/282/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/charagedil.wordpress.com/282/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/charagedil.wordpress.com/282/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/charagedil.wordpress.com/282/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/charagedil.wordpress.com/282/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=charagedil.wordpress.com&blog=1122253&post=282&subd=charagedil&ref=&feed=1" /></div>]]></content:encoded>
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	</item>
		<item>
		<title>&#8216;महावीर&#8217; ब्लॉग पर मुशायरा</title>
		<link>http://charagedil.wordpress.com/2008/07/13/blog-mushaira/</link>
		<comments>http://charagedil.wordpress.com/2008/07/13/blog-mushaira/#comments</comments>
		<pubDate>Sun, 13 Jul 2008 11:34:59 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Devi Nangrani</dc:creator>
				<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://charagedil.wordpress.com/?p=274</guid>
		<description><![CDATA[ सूचना

&#8216;महावीर&#8216; ब्लॉग पर मुशायरा (कवि-सम्मेलन)
&#8220;बरखा-बहार&#8221;

वरिष्ठ लेखक, समीक्षक, ग़ज़लकार श्री प्राण शर्मा जी की प्रेरणा से जुलाई १५, २००८ एवं जुलाई २२,२००८ को &#8216;इस ब्लॉग पर मुशायरे का आयोजन किया जा रहा है। 
इस ब्लाग पर मुशायरे में शिरकत के लिए कवियों की बड़ी तादाद होने की वजह से मुशायरे को दो भागों में दिया [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=charagedil.wordpress.com&blog=1122253&post=274&subd=charagedil&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p style="text-align:center;"><span style="color:#0000ff;"><strong> </strong><strong><span style="font-family:Mangal;">सूचना</span></strong></span><span style="color:#ff6600;"><span><br />
</span></span></p>
<p style="text-align:center;"><span style="color:#ff6600;"><span><strong>&#8216;</strong></span><strong><span style="font-family:Mangal;"><a href="http://mahavir.wordpress.com/">महावीर</a></span></strong><strong><span>&#8216; </span></strong><strong><span style="font-family:Mangal;">ब्लॉग पर मुशायरा (कवि-सम्मेलन)</span></strong></span><span style="color:#ff6600;"><strong></strong></span></p>
<p style="text-align:center;"><span style="color:#ff6600;"><strong>&#8220;बरखा-बहार&#8221;</strong></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:center;" align="center"><span style="color:#ff0000;"><strong></strong></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:center;" align="center"><span style="font-family:Mangal;">वरिष्ठ लेखक</span><span>, </span><span style="font-family:Mangal;">समीक्षक</span><span>, </span><span style="font-family:Mangal;">ग़ज़लकार</span><span lang="HI"> </span><strong><span style="font-family:Mangal;">श्री प्राण शर्मा जी</span></strong><span lang="HI"> </span><span style="font-family:Mangal;">की प्रेरणा से जुलाई १५</span><span>, </span><span style="font-family:Mangal;">२००८ एवं जुलाई २२</span><span>,</span><span style="font-family:Mangal;">२००८ को </span><span style="color:#000000;"><span>&#8216;</span><span style="font-family:Mangal;">इस</span><span> </span><span style="font-family:Mangal;">ब्लॉग</span></span><span lang="HI"> </span><span style="font-family:Mangal;">पर मुशायरे का आयोजन किया जा रहा है।</span><span lang="HI"> </span><span><br />
</span><span style="font-family:Mangal;"><a href="http://mahavir.wordpress.com/">इस ब्लाग</a> पर मुशायरे में शिरकत के लिए कवियों की बड़ी तादाद होने की वजह से मुशायरे को</span><span lang="HI"> </span><strong><span style="font-family:Mangal;">दो भागों</span></strong><span lang="HI"> </span><span style="font-family:Mangal;">में दिया जा रहा है।</span><span lang="HI"> </span><strong><span style="font-family:Mangal;">पहला भाग १५ जुलाई</span></strong><span lang="HI"> </span><span style="font-family:Mangal;">और</span><span lang="HI"> </span><strong><span style="font-family:Mangal;">दूसरा भाग २२ जुलाई २००८</span></strong><span lang="HI"> </span><span style="font-family:Mangal;">को दिया जायेगा।</span><span lang="HI"> </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:center;" align="center"><em><span style="font-family:Mangal;">देश-वदेश</span></em><em><span lang="HI"> </span></em><em><span style="font-family:Mangal;">से शायरों और कवियों में प्राण शर्मा</span></em><em><span>, </span></em><em><span style="font-family:Mangal;">लावण्या शाह</span></em><em><span>, </span></em><em><span style="font-family:Mangal;">तेजेन्द्र शर्मा</span></em><em><span>, </span></em><em><span style="font-family:Mangal;">देवमणि पांडेय</span></em><em><span>, </span></em><em><span style="font-family:Mangal;">राकेश खण्डेलवाल</span></em><em><span>, </span></em><em><span style="font-family:Mangal;">सुरेश चन्द्र &#8220;शौक़&#8221;</span></em><em><span>,</span></em><em><span style="font-family:Mangal;">कवि कुलवंत सिंह</span></em><em><span>, </span></em><em><span style="font-family:Mangal;">समीर लाल &#8220;समीर&#8221;</span></em><em><span>,</span></em><em><span style="font-family:Mangal;">नीरज गोस्वामी</span></em><em><span>, </span></em><em><span style="font-family:Mangal;">चाँद शुक्ला &#8220;हदियाबादी&#8221;</span></em><em><span>,</span></em><em><span style="font-family:Mangal;">देवी नागरानी</span></em><em><span>, </span></em><em><span style="font-family:Mangal;">रंजना भाटिया</span></em><em><span>, </span></em><em><span style="font-family:Mangal;">डॉ. मंजुलता</span></em><em><span>, </span></em><em><span style="font-family:Mangal;">कंचन चौहान</span></em><em><span>,</span></em><em><span style="font-family:Mangal;">डॉ. महक</span></em><em><span>, </span></em><em><span style="font-family:Mangal;">रज़िया अकबरमिर्ज़ा</span></em><em><span>, </span></em><em><span style="font-family:Mangal;">हेमज्योत्सना &#8220;दीप&#8221;</span></em><em>, नीरज त्रिपाठी</em><em><span style="font-family:Mangal;"> आदि पधार रहे हैं।</span></em><span lang="HI"> </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:center;" align="center"><span style="font-family:Mangal;">आप से निवेदन है कि उनकी रचनाओं का रसास्वादन करते हुए ज़ोरदार तालियों (टिप्पणियों) से मुशायरे की शान बढ़ाएं।</span><span><br />
</span><span style="font-family:Mangal;">महावीर शर्मा</span><span><br />
</span><span style="font-family:Mangal;">प्राण शर्मा</span><span><br />
</span><strong><span style="font-family:Mangal;">पत्र-व्यवहार इस ईमेल पर कीजिए :</span></strong><span><br />
</span><span>mahavirpsharma@yahoo.co.uk</span><span><br />
&#8216;</span><span style="font-family:Mangal;"><a href="http://mahavir.wordpress.com/">महावीर</a></span><span>&#8216; &#8211; http://mahavir.wordpress.com</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:center;" align="center">*****************</p>
<img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/categories/charagedil.wordpress.com/274/" /> <img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/tags/charagedil.wordpress.com/274/" /> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/charagedil.wordpress.com/274/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/charagedil.wordpress.com/274/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/charagedil.wordpress.com/274/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/charagedil.wordpress.com/274/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/charagedil.wordpress.com/274/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/charagedil.wordpress.com/274/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/charagedil.wordpress.com/274/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/charagedil.wordpress.com/274/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/charagedil.wordpress.com/274/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/charagedil.wordpress.com/274/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=charagedil.wordpress.com&blog=1122253&post=274&subd=charagedil&ref=&feed=1" /></div>]]></content:encoded>
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