लौ दर्दे - दिल की
शब्द सादे भाव गहरे, काव्य की गरिमा मही,
‘लौ दर्दे दिल की’ संकलित, गजलों में ‘देवी’ ने कही
न कोई आडम्बर कहीं, बस बात कह दी सार की,
है पीर अंतस की कहीं, पीड़ा कहीं संसार की.
आघात संघातों की पीड़ा, मर्म में उतरीं घनी, उसी आहत पीर से ‘लौ दर्दे-दिल की’ गजलें बनीं .
जीवन-दर्शन को इतनी सहजता और सरलता से कहा जा सकता है, यह ‘देवी’ जी की लेखन शैली से ही जाना. जैसे किसी बच्चे ने कागज़ की नाव इस किनारे डाली हो और वह लहरों को अपनी बात सुनाती हुई उस पार चली गयी हो. कहीं कोई पांडित्य पूर्ण भाषा नहीं पर भाव में पांडित्य पूर्ण संदेशं हैं. क्लिष्ट भावों की क्लिष्टता नहीं तो लगता है, मेरे अपने ही पीर की बात हो रही है और मैं इन पंक्तियों में जीवंत हो जाती हूँ . जब पाठक स्वयं को उस भाव व्यंजना में समाहित कर लेता है, तब ही रचना में प्राण प्रतिष्ठा होती है.
देवी जी के ही शब्दों में —–
करती हैं रश्क झूम के सागर की मस्तियाँ
पतवार बिन भी पार थी कागज की कश्तियाँ .
यह ‘ दर्दे दिल की लौ’ उजाला बनने को व्याकुल है , सबके दर्द समेट लेने चाहत ही किसी को सबका बनाती है, परान्तः-सुखाय चिंतन ही तो परमार्थ की ओर वृतियों को ले जाती हैं और शुद्ध चिंतन ही चैतन्य तक जीव को ले जाता है. औरों के दर्द से द्रवित और उन्हें समेट लेने की चाह में ही,’ मालिक है कोई मजदूर कोई, बेफिक्र कोई मजबूर कोई.’ संवेदना कहती है ‘ बहता हुआ देखते है सिर्फ पसीना, देखी है कहाँ किसने गरीबों की उदासी’ . ठंडे चूल्हे रहे थे जिस घर के, उनसे पूछा गया कि पका क्या है’ यह सब पंक्तियाँ देवी जी के अंतस को उजागर करतीं हैं. वे सारगर्भित मान्यताओं की भी पक्षधर है कि व्यक्ति केवल अपने कर्मों से ही तो उंचा होता है. ‘ भले छोटा हो कद किरदार से इंसान ऊँचा हो, उसी का जिक्र यारों महफ़िलों में आम होता है’ .
जीवन के मूल सिद्धांतों के प्रति गहरी आस्था है, सब इनका पालन क्यों नहीं करते इसकी छटपटाहट है, साथ ही यथार्थ से भी गहरा परिचय रखतीं है तब ही तो लिख दिया
‘ उसूलों पे चलना जो आसान होता,
जमीरों के सौदे यकीनन ना होते,
कसौटी पे पूरा यहाँ कौन ‘देवी ‘
जो होते, तो क्यों आइने आज रोते’.
सामाजिक, सांप्रदायिक , न्यायिक और राजनैतिक दुर्दशा के प्रति आक्रोश है, धार्मिक मान्यताओं के प्रति उनके उदगार नमन के योग्य हैं.’ वहीँ है शिवाला, वहीँ एक मस्जिद , कहीं सर झुका है, कहीं दिल झुका है.’पुनः है जहॉं मंदिर वहीँ है पास में मस्जिद कोई , साथ ही गूंजी अजाने , शंख भी बजते रहे. न्यायिक व्यवस्था के प्रति आक्रोश है. तिजारत गवाहों की जब तक सलामत क्या इन्साफ कर पायेगी ये अदालत.
भारतीयता, हिंदी देश प्रेम, वतन और शहीदों के प्रति रोम-रोम से समर्पित भावनाएं उन्हें प्रणम्य बनाती है.
हमें अपनी हिन्दी जवाँ चाहिए,
सुनाये जो लोरी वो माँ चाहिए.
तिरंगा हमारा हो ऊँचा जहाँ ,
निगाहों में वह आसमाँ चाहिए.
वतन के लिए वह समर्पित जोश और उमंगें हैं कि पढ़ कर रोमांच होने लगता है.
दहशतें रक्शौं है , रोजो शब् यहॉं
कब सुकून पायेंगे मेरे हम वतन.
जान देते जो तिरंगे के लिए
उन शहीदों का तिरंगा है कफ़न.
देवी नागरानी एक प्रबुद्ध व्यक्तित्व है, बुद्ध का अर्थ बोध गम्यता. इस मोड़ पर जब चिंतन वृत्ति आ जाती है तो सब कुछ आडम्बर हीन हो जाता है, भावों को सहजता से व्यक्त करना एक स्वभाव बन जाता है. कितनी सहजता है, ‘ यूँ तो पड़ाव आये गए लाख राह में, खेमे कभी भी हमने लगाए नहीं कहीं’ . वे मानती हैं कि अभिमान ठीक नहीं पर स्वाभिमान की पक्षधर हैं, ‘ नफरत से अगर बख्शे कोई, अमृत भी निगलना मुश्किल है , देवी शतरंज है ये दुनिया, शह उससे पाना मुश्किल है’ ‘
” लौ दर्दे दिल की ” भावनाओं का गहरा समंदर है , अहसासों की लहरें हैं, निश्छल से संवेदित भाव हैं , कागज़ की नाव है और स्नेहिल मन की पतवार है. सतहों को हटा कर मन की तहों तक जाती एक यात्रा है . सादगी से अनुभूतियों को अंतस में उतारने की कला का अद्भुत प्रयास है.
न हिला सके इसे जलजले , न वो बारिशों में ही बह सके.
उसे क्या बुझा सके आधियाँ , ये चरागे दिल है दिया नहीं.
मृदुल कीर्ति, Atlanta, USA







