महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी के सहयोग से SIES College एवं कथा यू॰ के के संयुक्त तत्वधन में आयोगित द्व-दिवसीय अंतराष्ट्रीय परिसंवाद 27-28 जनवरी 2012
अमेरिका के प्रवासी भारतीयों के हिन्दी साहित्य में हिन्दी कविता
“प्रवासी पुस्तक प्रदर्शनी“
(2008-विश्व हिन्दी सम्मेलन में प्रवासी पुस्तक प्रदर्शिनी, और प्रवासी भारतीय-साहित्यकारों की पुस्तकों के विमोचन विदेश राज्य मंत्री श्री आँनंद शर्मा के हाथों हुआ उस समय की तस्वीर है-पहली लाइन-कुसुम सिन्हा, देवी नागरानी, पूर्णिमा देसाई, डॉ॰ रामबाबू गौतम, डॉ॰ जयरामन, अमरेन्द्र कुमार, हिमांशु, अशोक व्यास॰ दूसरी लाइन-डॉ॰ अंजना संधीर, कुसुम टंडन, शशि पाधा, सुनीता जैन, डॉ॰ सुषम बेदी, डॉ॰ सरिता मेहता, रेखा मैत्र, इला प्रसाद, सुधा ओम ढींगरा, डॉ॰ विजय मेहता॰
यूएसए में और अनेक लेखक व लेखिकाएँ हैं जिनके यहाँ मैं नाम नहीं ले प रही हूँ, पर उन जिनको मैं जानती, पहचानती हूँ उनमें से कुछ नाम ये है– USA और भी कई रचनाकार-उमा सैनी, अनुराधा आमलेकर( seattle), अनुराधा चंदर (NY), texas), रचिता सिंह, डॉ॰ विजया गंभीर, सरोज शर्मा, बीना टोडी (Virginia), उषा देव (North Carolina), सोमा वीरा, शुक्ल शाह, सुजाता गुप्ता, डा. सुदर्शन प्रियदर्शिनी, कुसुम टूंडन,( कैलिफोर्निया), बीना टोडी,(virginia), संध्या भगत, मंजु तिवारी (Georgia ), मीरा गोयल (North Carolina ), गुलाब खंडेलवाल, राकेश खंडेलवाल, सारिका सक्सेना, बख्शीश कौर संधु CA, ,डॉ॰ देवबला रामनाथन, डॉ॰ बिंदेश्वरी अग्रवाल, सुषमा मल्होत्रा(NY )
अमेरिका के प्रवासी भारतीयों के हिन्दी साहित्य में हिन्दी कविता
रचना की हर विधा की अपनी एक पहचान है लेकिन उसके अस्तित्व का भव्य भवन शब्द के तानों-बानों से बुनी हुई एक वाटिका है जो सोच की उधेड़ बुन की उपज है. प्रो॰ रमेश तिवारी ‘विराम’ जी ने अनछुए को छुआ है और अनकहे को कहते हुए लिखा है “समर्थ साहित्यकार जब अपने मन को अभिव्यक्त करता है तब उसके शब्द बांसुरी बन जाते है, और जब वह सामाजिक विषयों पर प्रहार करता है तब उसके शब्द लाठी बन जाते हैं।“ उनका मानना है कि शब्द वेण की तरह होते है, वेणु अर्थात बांस, बांस से लाठी भी बनती है और बांसुरी भी….
कविता क्या है यह तय करना मुश्किल है, सिर्फ अभिव्यक्ति उसकी पहचान हो जाती है, कविता आत्मा की झंकार है. कवि के हृदय कि भाषा है, उसकी सोच को ज़हीर करने का मधायम है, पढ़ने पर जो अभिव्यक्ति मन को छू ले, अपने हृदय कि बात लगने लगे तो रचना अपनी कसौटी पर पूरी उतरती है, यही सबसे बड़ी सफ़लता है और यही उसकी सम्प्रेश्नीयता. लेखन कला ऐसा मधुबन है जिसमें हम शब्द बीज बोते है, परिश्रम का खाध जुगाड़ करते हैं, और सोच से सींचते है, तब कहीं जाकर इनमें इन्द्रधनुषी शब्द-सुमन निखरते हैं और महकते हैं, तब ही काव्य के सौंदर्य-बोध का आभास होता है।
सुधा ओम ढींगरा-Raleigh NC
अपने मनोभावों व उद्गारों की शब्दों में अभिव्यक्त करने की कला ही कविता का निर्माण करती है, हर कविता एक तजुर्बा है, एक ख़्वाब है, एक भाव है. जब दिल के भीतर मनोभावों का तहलका मचता है, मन डांवाडोल होता है, दिल में हलचल का शोर हो, जब लहरें अपने बांध को उलांघ जाए, शायद तब ही कविता बनती है। कविता अन्दर से बाहर की ओर बहने वाला निर्झर झरना है, जो शब्दों में अपना आकार पाती है, सोच के तिनके बुनकर, बुनावट और कसावट में अपने आप को प्रकट करती है। पहले-पहल रचनात्मक सृष्टि के लिए शब्द बहुत जरुरी है, जिनको करीने से सजाकर, सवांरकर एक भव्य भवन का निर्माण किया जाता है | दूसरी विशेषता जो कविता को मुखरित करती है वह है शब्दों को जीवंत बनाने की कलात्मक अभिव्यक्ति जो मन में उतर जाने में सक्षम हो, यही रचनाकार को कसौटी पर खरा उतारती है॰ इन्हीं सभी गुणों की नींव पर निर्माण करती, अपनी देश-परदेश की भूली-बिसरी यादों को जीवंत करती, जानी मानी प्रवासी रचनाकार सुधा ओम ढींगरा की सुन्दर और भावनात्मक कविताएँ ”धूप से रूठी चांदनी “ काव्य संग्रह के स्वरूप हमारे सामने है। एक परिपक्व मन की संवेदना भरी अभिव्यक्ति का यह अंश सुनें….
विस्मृतियों के गर्भ से / यादों की अंजुरी भर लाई हूँ ……..
कुछ यादें टिकी हैं इसमें / कुछ रिस रहीं हैं ………
आज की व्यवसायिक परिस्थितियों में आदमी अपनी उलझनों के दायरे से निकलने के प्रयासों में और गहरे धंसता चला जा रहा है | ऐसे दौर में मनोबल में सकारात्मक संचार कराती सुधा जी की कविता “मैं दीप बाँटती हूँ” अपने सर्वोत्तम दायित्व से हमें मालामाल करती है—
“मैं दीप बाँटती हूँ / इनमें तेल है मुहब्बत का/ बाती है प्यार की/ और लौ है प्रेम की/ रौशनी करती है जो हर अंधियारे ह्रदय और मस्तिष्क को“
कहीं, उनकी इस दिशा में एक और दावेदारी के तेवर देखिये:
“मैं दीप लेती भी हूँ/ पुराने टूटे-पुटे नफ़रत, ईर्ष्या, द्वेष के दीप /जिनमें तेल है/ कलह-कलेश का/ बाती है बैर-विरोध की / लौ करती है जिनकी जग- उजियारा
लेखन कला अपनी पूर्णता तब ही प्रकट कर पाती है जब भाषा या शैली अपने तेवरों के प्रयोग से कल्पना और यथार्थ का अंतर मिटा दे. अपने परिवेश में जो देखा गया, महसूस किया गया और भोगा गया, उसे विषय-वस्तु बनाकर सुधाजी अपनी रचनाओं द्वारा पाठक को अनुभव सागर से जोड़ लेती हैं.| जैसे इस कविता में देखें….
“परदेस से चिट्ठी आई, माँ की आँख भर आई/ लिखा था खुश हूँ मैं चिंता न करना/ घर ले लिया है किश्तों पर/ कार ले ली है किश्तों पर / फर्नीचर ले लिया किश्तों पर / यहाँ तो सब कुछ ख़रीदा जाता है किश्तों पर ” सोच की हर सलवट पीड़ा से भीगी हुई, आँख फिर भी नम नहीं॥
“स्रजनशीलता का प्रतीक- डॉ॰ अंजना संधीर जिनके जुड़वा संग्रह “प्रवासिनी के बोल” एवं “प्रवासी आवाज़” भारतीय प्रवासी लेखिकाओं को एक मंच प्रदान करने में सक्षम रहे हैं।
चलो एक बार/ चलते हैं हक़ीक़त में /
खिलते हैं फूल जहां /सरसों के फूल और लहलहाती हैं फसलें
सन 2006 में प्रवासिनी के बोल का आगमन प्रवासी नारियों के स्रजनशीलता का प्रतीक बन गया, जिसमें 81 अमरीकी हिन्दी कवियित्रियों की सचित्र रचनाएं, परिचय सहित प्रस्तुत है, तथा ३३ महिला प्रतिभाएं जो हिन्दी से जुड़ी हुई है, उनका परिचय, सचित्र रचनाओं के साथ एक संगठित बेमिसाल कार्य रहा. यह निश्चय ही एक संदर्भ- ग्रंथ है जिसे अपने पुस्तक-कोश में रखना हमारा सौभाग्य रहेगा.
अपनी बुलंदियों को साहित्य जगत के क्षितिज की ओर ले जाने वाली डा॰ अंजना संधीर अब किसी परिचय की मोहताज नहीं है. उनकी संपादन क्षमता में एक अनोखा अद्भुत चमत्कार है जो आज उनकी पहचान बन गयी है॰ अंजना जी के इस कार्य में, एक अनबुझी प्यास का एक तत्व है , जो कहीं न कहीं सीने में जैसे सिसकता है, रोता है, बिलखता है, जैसे कोई बीज कहीं बोया, वो अंकुरित तो हुआ, पर खिल न पाया हो, खिला हो पर महक न पाया हो. ऐसी ही एक अनजान तड़प को, एक छटपटाहट को, नारी जाति के संगठित स्वर “प्रवासिनी के बोल” में उन्होंने अभिव्यक्त किया है जिसमें समोहित है परदेस में बस जाने वाले नारी मन के तड़पती हृदय वेदना, जो शब्दों की हर सीमा का बांध तोड़कर क़लम की नोक से पीड़ा बनकर सरिता की मांनिंद बहकर सामने आई है.
इसे प्रवासी साहित्य न कहकर अगर हम प्रवासी भारतियों का हिन्दी साहित्य कहें तो ज़ियादा उचित होगा, शायद इसलिए कि यह नारी शक्ति ही है जो परिवार, परिवेश, समाज को एक तार में, भारतीय संस्कृति और सभ्यता के सहारे बांधकर रहती है, चाहे वह यहाँ भारत में हो या भारत से बाहर उस प्रवास स्थान पर।
डॉ॰ अंजना संधीर ने प्रवासी नारी के अस्तित्व को अनूप और अनोखा सकारात्मक रूप देकर अपने संपादित किये हुए संग्रह में एक सूत्र की तरह पिरोकर प्रस्तुत किया है. यह निश्चित ही नारी जाति के सन्मान में एक नया मयूर पँख है. आइये उनकी रचनात्मक ऊर्जा और मन की पीड़ा से परिचित होते हैं।
“ख़्याल उसका हरेक लम्हा मन में रहता है
वो शम्मा बन के मेरी अंजुमन में रहता है
मैं तेरे पास हूं, परदेस में हूँ, खुश भी हूँ
मगर ख़्याल तो हर दम वतन में रहता है.”
हिन्दी भाषा से उनका लगाव इस बात से प्रमाणित होता है जब वह कहती है “हिन्दी मेरी साँसों की भाषा है, भला सांस लेना भी भूलता है कोई” उनकी एक कविता “चलो, एक बार फिर” के कुछ अंश इस बात का समर्थन करेंगे….
चलो / फिर एक बार लिखें/ खुशबू से भरे भीगे ख़त /
जिन्हें पढ़ते पढ़ते भीग जाते थे हम/
इंतज़ार करते थे डाकिये का/ बंद करके दरवाजा/
पढ़ते थे चुपके-चुपके / वे भीगे खत तकिये पर सिर रखकर/
चौंकते थे आहात पर / धड़कते थे दिल टेलीफोन की घंटी पर /
कशा समय थम जाता और मैं अंजना जी के साथ सोचों में उसी अतीत में लौट जाती….
**
यह महक है प्रवासी भारतीय लेखकों व लेखिकाओं की रचनाओं की जो दिलों पर अपनी अमिट छाप अंकित कर पाने में सक्षम है। मेरी एक ग़ज़ल का शेर इसी ओर इशारा कर रहा है…
कहा किसने इन कोरे कागज़ों से कुछ नहीं मिलता
कभी शब्दों में घुल-मिल जाती है मल्हार की खुशबू.. देवी नगरानी
कल्पना सिंह चिटनिस:
साहित्य जगत की एक और और जानी मानी हस्ताक्षर है कल्पना सिंह चिटनिस: (NY ) जो कविता की परिभाषा इस तरह करती है “मनुष्य, में आत्म अभिव्यक्ति की इच्छा आरंभ से होती रही है, अपनी कविताओं में अपने आप को अभिव्यक्त करना उसी स्वाभाविक इच्छा का प्रतिफल है,” और देखिये भाषा के प्रति अपनी निष्ठा वे कैसे ज़ाहिर कर रही है, और भाषा के प्रति अपने भावों का इजिहार करते हुए वे कहती हैं। “हिन्दी मेरी आत्मा है, मेरी पहचान है, मेरी ज़ुबान है। जिनको अपनी भाषा के लिए इतना प्रेम है, आत्मीयता और निष्ठा है, वे अपनी आत्मा को अपनी पहचान को, अपनी ज़ुबान को प्रवासी कैसे मान ले?
सहरा में उठी रेत की अंधियाँ / जैसे झुके तुम्हारे सिर प्रार्थना में / इससे पहले /
कि तुम्हारी विजयी बंदूकों से / पहली गोलियां निकली…
लहू, शब, सिसकियाँ, और धुआँ, हमारी सभ्यता को एक बार फिर से/ परिभाषित करते!!
प्रवासी भारतीय लेखिकाओं में NY की निवासी डॉ॰ सुषम बेदी (NY), कोलम्बिया यूनिवरसिटि में हिन्दी भाषा और साहित्य का अध्यापन कर रही है। उनकी रचनधर्मिता ही उनकी पहचान है, एक सशक्त उपन्यासकार और कहानीकार होने के साथ-साथ वे एक रचनाकार भी है। शिक्षा प्रणाली से जुड़ी हुई सुधम बेदी जी, रचना की अभिव्यक्ति को इस प्रकार परिभाषित कहते हुए लिखती हैं - “कविता मेरे भीतर के व्यक्तित्व की निजी अभिव्यक्ति है, और यह लेखनी का ही जौहर है जो भाषा को और लेखक को अपनी पहचान दिला पाएगा॰” उनका काव्य संग्रह “शब्दों की खिड़कियाँ” –का एक अंश आपके सामने है— न्यू यॉर्क एक मशाल है/ एक ऊंची अटारी पे धरा दिया/ जिसकी रौशनी दूर तलक जाती है/ न / उसे बुझाने की जुगत मत करना/ वरना / अंधेरा भी जाएगा/ बहुत दूर तलक /
यह है क़लम के सिपाहियों का बयान जो रचना के भीतर रचना का निर्माण शब्दों से करते ही चल जाता है॰
डॉ॰ उषादेवी विजय कोलहटकर (NY ) मराठी भाषा के साहित्य संसार का एक जाना माना नाम, डॉ॰ उषादेवी विजय कोलहटकर जो अपने लेखन में अमेरिकी जन-जीवन को, अनुभव-चित्र, कहानियों तथा उपन्यासों में रेखांकित करने की पूरी कोशिश में शायद इसी देस-परदेस की पीढ़ा से द्रवित होकर लिखती हैं—
आँसू समझते हैं, सच्चे प्यार की भाषा / आँसू जीते हैं ममता की आशा/
आँसू समझते हैं, बिदाई का दर्द / जब चला जाता है कोई अपना हमदर्द/
आँसू बनते हैं मोती / जब गिरते हैं, हमदम की हथेली पर/
डॉ॰ कमलेश कपूर : Buffalo NY की रहवासी हैं, उनका काव्य संग्रह ”अस्तित्व के परमाणु” बहुत चर्चित रहा है॰ उन्होने श्रीमद भगवत गीता का अंगेजी में अनुवाद किया है॰ उनके लिए कविता आत्मा का रुझान तथा मन का लुभान है तथापि इस रुझान और लुभान से ही जीवन के तथ्य व सत्य झाँकने लगते हैं। इसी संदर्भ में उनकी कविता की चार पंक्तियाँ —-
तुम मेरे जीवन साथी जो बनो/ तो मेरी तलाश के सांझीदार भी बनो/
मेरे व्यक्तित्व को नए नुस्खे न दो/ इस के भीतर का सत्य पहचानो
इला प्रसाद –Houston
आज की कवितायें काव्य-शिल्प, और काव्य-भाव की समस्त भूमिका तोड़ती हैं और व्यवस्था की प्रतिगामी शक्तियों के प्रति समवेत रूप से हस्तक्षेप करती हैं. यूस्टेन की जानी मानी साहित्यकारा इला प्रसाद की कवितायें मानव संघर्षों के इतिवृत्त को लक्षित करती हुई आगे बढ़ती हैं, जहाँ सुख के क्षण और दुःख के क्षण भी हैं . वहाँ अश्रु भी है, मन का खिलना भी है, मुरझाना भी. जहाँ असफलता के साथ-साथ हौसला है, वहीं गिर कर उठने का साहस भी । उनका काव्य संग्रह शब्दों की शिलाकृति – धूप का टुकड़ा उनके हृदय की पारदर्शी अभिवयक्ति का संकलन है…जिनकी आहट उनके शब्दों में सुनते हैं…
वक्त की शाखों से /गिरते हैं पत्ते / दिनों के /आज, कल परसों/ हर पत्ते के साथ / मुरझाता जाता है मन
इला जी ने ज़िन्दगी के महाभारत को लगातार जाना है, लड़ा है और शब्दों की शिलाकृतियों के माध्यम से अपनी जद्दो-जहद को व्यक्त किया है. ऐसी ही ‘दरार” नामक इस रचना के अंश में उसके भावार्थ से जुड़िये और महसूस कीजिये..
सच की ज़मीन पर खड़ी/ विश्वास की इमारत तो/ कब की ढह गई
अब तो नज़र आने लगी है/ बीच में उग आई / औपचारिकता की दरार…
इन शब्दों की गहराई में एक सच अपने दर्द की पीढ़ा अभिव्यक्त कर रहा है, जहां सुंदर शब्दों में आपबीती-जगबीती बनकर सामने आई है
शशि पाधा–अनंत को ओर : शब्द-शिल्प सौंदर्य को साथ प्राकृतिक सौंदर्य की वादियों में अपनी सशक्त लेखनी की रौ में हमें बहा ले जाने वाली परवासी नारी शशि पाधा जी जम्मू नगरी के पर्वतों की गोद में पली बढ़ी, अब अमेरिका में निवास करते हुए उसी सौंदर्य की परिभाषा अपनी रचनात्मक लय-ताल में इस तरह रखती है कि उनसे अजनबी रह पाना बहुत ही मुश्किल है. आइये सुनकर महसूस करते हैं… उनकी “पाती” नामक रचना का अंश….
“हवाओं के कागद पर लिख भेजी पाती/ क्या तुमने पढ़ी ?
न था कोई अक्षर / न स्याही के रंग/ थी यादों की खुशबू / पुरवा के संग—”
डा॰ किशोर काबरा ने एक जगह लिखा है- “सच्ची कविता की पहली शर्त यह है कि हमें उसका कोई भार नहीं लगता. जिस प्रकार पक्षी अपने परों से स्वच्छंद आकाश में विचरण करता है, उसी प्रकार कवि “स्वान्तः सुखाय” और “लोक हिताय” के दो पंखों पर अपन काव्य यात्रा का गणित बिठाता है”. ऐसी होती है शशि जी की रचनाएँ।
शशि पाधा जी एक सैनिक की पत्नी होने के नाते सैनिकों के अदम्य साहस और बलिदान के अपने अनुभवों को उन्होने कागज़ पर भी उतारा है। कारगिल युद्ध के समय सैनिकों द्वारा एक संदेश स्वरूप रचना का निर्माण किया है जिन के शब्दों से मात्रभूमि के प्रति सैनिकों की सद्भावना और उनकी निष्ठा से साक्षतकार होने का गौरव हमें हासिल हो रहा है…
हम लौटें कल या न लौटें/ न आँच तिरंगे पर आएगी
इस मातृ भूमि के चरणों में/चाहे जान हमारी जाएगी
है अमरत्व का वरदान मुझे/ये बात उन्हें बतला देना
ऐसे जाँ बाज़ वीरों का हमारा नमन!
*
लावण्या शाह
हिन्दी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार पं॰ नरेंद्र शर्मा जी की सुपुत्री लावण्या शाह जो Cincinati-Ohio में रहती हैं। लावण्या जी को पढ़ते ही लगता है जैसे हम अपने आराध्य के सामने मंदिर में उपस्थित हुए हैं, सब कुछ अर्पित भावना को लेकर उनके साथ कह रहे हैं—-
ज्योति का जो दीप से /मोती का जो सीप से /वही रिश्ता मेरा, तुम से !
प्रणय का जो मीत से /स्वरों का जो गीत से /वही रिश्ता मेरा, तुम से !
गुलाब का जो इत्र से /तूलिका का जो चित्र से /वही रिश्ता मेरा, तुम से !
सागर का जो नैय्या से /पीपल का जो छैय्याँ से /वही रिश्ता मेरा, तुम से !
किसी ने खूब कहा है ‘कवि और शब्द का अटूट बंधन होता है, कवि के बिना शब्द तो हो सकते हैं, परंतु शब्द बिना कवि नहीं होता. लावण्या जी की शब्दावली का गणित देखिये कैसे सोच और शब्द का तालमेल बनाए रखता है है।
*
डॉ॰ स्वदेश राणा (Ny) और इन्होने ग़ज़ल की सिन्फ़ पर कलम आज़माई है।
परिवार से, परिवेश से, अलग रहने की पीढ़ा अंतर्मन के मंथन के पश्चात उनके ह्रदय की मौन को शब्दों के ज्वालामुखी द्वारा हम तक पहुंचती है। स्वदेश राणा इस शेर के माध्यम से अपने मनोभावों को हमसे परिचित कराती है
इतनी रंजिश का सबब क्या है बताए कोई / किसलिए रूठे हैं, बोलें तो मनाए कोई *
अनंत कौर NJ , एक ऐसी शायरा है जिनकी ज़बान में उर्दू भाषा की मिठास घुल-मिल रही है. उनका ग़ज़ल संग्रह “रायगाँ नही हूँ” एक “बेमिसाल नगीना जो यादों से गुज़रकर सांसो में जड़ गया है। किसी शायर “ग़ज़ल एक सहराई पौधे की तरह होती है जो पानी की कमी के बावजूद भी अपना विकास जारी रखता है।“ अनंत कौर, पंजाब की खुशबू सीने में लिए हुए देश-परदेश की पीड़ा को ज़ब्त करते हुए कहती है- मैं अपना आप कहीं और छोड़ आई हूँ / जहाँ पे रहती हूँ शायद वहां नहीं हूँ मैं
मुझको मोम समझता है पर ख्याल रहे/ मैं एक शम्मा हूँ लेकिन पिघलने वाली नहीं हूँ मैं
*
रचना का जन्म कोरे सिद्धांतों या वैचारिक आदर्शों की प्रेरणा से नहीं बल्कि कवि की वास्तविक स्रजनात्मक अनिभूति से होता है, जहां विचार मन की सर्वश्रेष्ट क्रिया है. और जब उसकी रचनात्मक ऊर्जा की परिधि में संवेदना का संचार होता है तब कहीं जाकर वह भीतर और बाहर की दुनिया से जुड़ पाता है.
रेखा मैत्र –Chicago, एक ऐसी कवियित्रि है जो देस-परदेस के जीवन के बीच में एक संधि पूर्ण पहलू से हमारा परिचय कराती है। जब कल्पना यथार्थ में परिवर्तित होती है तब कहीं अपने वजूद से परिचित होने की अनुभूति का आभास होता है. ऐसी ही एक अद्भुत तहरीर जिसमें रेखा जी ने अपने काव्य-संगृह “बेनाम रिश्ते” में रेखांकित ते हुए लिखा है:
मिटने के डर से / उंगलियाँ कहाँ थमती है
उन्हें रौशनाई मयस्सर न हो/ तो भी वे लिखती हैं / लिखना उनकी फितरत है /
और शायद लिखना ही हर रचनाकार की फ़ितरत है !!
मृदुल किर्ति-Atlanta
अध्यात्मक ऊर्जा से भरपूर अनेक शास्त्रों को छंद-बध करने वाली परमज्ञानी विदूषि डॉ॰ मृदुल कीर्ती के मनोभाव भी उस एक परम सच से परिचय कराते हुए कह रहे हैं….:
लक्ष्य का संधान / रति के बाद की विरति /
भोग के बाद का अवसाद / कर्म के बाद का निष्काम / श्रम के बाद का विश्राम / ही
सिखा पाते हैं कि / ममत्व में कुछ भी तेरा नहीं हैं. / समत्व में सब कुछ तेरा है.
अंतिम लक्ष्य का संधान करना हो तो / हमारी प्रार्थना का मूल यही हो कि
हे ईश्वर!/ तन परिश्रमी हो / मन संयमी हो/ बुद्धि विरागी हो / हृदय अनुरागी हो.
*
अनूप भार्गव: NJ, USA में रहते हैं गहरी और भावनात्मक अभिव्यक्ति के मालिक हैं, I ई-कविता ग्रूप के संचार और संचालन से जुड़े हुए मौन साधक की तरह NJ में हिन्दी भाषा का प्रचार प्रसार कर रहे हैं श्री अनूप भार्गव और उनकी पत्नि रजनी भार्गव, उनकी रचनाएँ गहराई और गीराई के रंग में ओतप्रोत अपनी बात पुरअसर रंग और ढंग से पाठक के सामने रखतीं हैं। अनूप जी का कहना है—- कल रात एक अनहोनी बात हो गई / मैं तो जागता रहा खुद रात सो गई । उनकी एक कविता जो मुझे बहुत प्रिय है…..
मैं और तुम/ वक़्त की परिधि के / लग अलग कोनों में /बैठे दो बिन्दु हैं,
मैनें तो /अपनें हिस्से का / अर्धव्यास पूरा कर लिया,
क्या तुम /मुझसे मिलनें के लिये / केन्द्र पर आओगी ?
काव्य में शब्दों की सरलता एवं सौंदर्य-बोध का दर्शन होता है।
*
रजनी भार्गव(NJ ) हिन्दी के शिक्षा माध्यम से जुड़ी हुई हैं, और बहुत से आयोजनों में अनूप भार्गव की सहकारिणी रजनी भार्गव की कविता के तेवर अपनी एक अलग पहचान परिचय खुद देते हैं सुनें:
किताबों में कुछ किस्से हैं,/ मेरी उम्र के कुछ गुज़रे हुए हिस्से हैं
उनकी अभिमान नामक कविता का यह अंश क्या कहता है आइये देखते हैं:
यह अभिमान मेरा / है मुखरित मौन मेरा / ऑस की बूंद की तरह/
बैठा है हरी दूब पर / ठंडा और नम सा है /ये अभिमान मेरा/
अमरेन्द्र कुमार, मिशिगन प्रांत में रहते हैं। साहित्य, चित्रकला, संगीत एवं भ्रमण में आपकी रुचि है। आप संयुक्त राज्य अमेरिका से निकलने वाली पत्रिका ’क्षितिज’ और ’ई-विश्वा’का सम्पादन भी करते रहे हैं। हिन्दी साहित्य का प्रचार-प्रसार अपने लेखन के माध्यम से करते हैं. अमरेन्द्र जी गध्य भी कुछ ऐसे लिखते हैं जैसे काव्य का कोई निर्झर झरना बह रहा हो….
उंचे आदर्शों के उतंग शिखरों से / कवि, निकले तेरी ऐसी कविता धारा ।
फोड़ कर संकुचित वृत्ति के पाषाणों को /बहा ले जाये जो कलुषित विचार सारा ।
सुरेन्द्रनाथ तिवारी न्यू जर्सी के जाने-माने माने लेखक है, उनका एक संग्रह ‘पार्थ गाँडीव उठाओ, उनकी पहचान बन है,
दो पंक्तियाँ उसी पुस्तक से तत्व को परिभाषित करती हुई …
उठो पार्थ गाँडीव सँभलो / दूर करो अपनी दुविधा
युद्ध धर्म है, युद्ध कर्म है/ मात्र शेष यदि युद्ध-विधा
श्री रामबाबू गौतम –नवतरंग ; भारतीयता से ओत-प्रोत रचनाओं का गुलदस्ता “नवतरंग”, न्यू जर्सी के आँचल से- अमेरिका में हिंदी का परचम लहराने वाले अन्तराष्ट्रीय हिंदी समिति के प्रख्यात हिंदी सेवी डॉ.कुंवर चन्द्र प्रकाश की रखी नींव पर अब भारत की राष्ट्र भाषा हिंदी का एक नया सूर्योदय रोशन हुआ है, जहाँ से भारत की सभ्यता और संस्कृति की नयी किरणें प्रवासी भारतियों की नई पीड़ी और पुरानी पीढ़ी के बीच की राहें रौशन कर रही है। न्यू जर्सी चैप्टर के अध्यक्ष श्री रामबाबू गौतम की इन पंक्तिओं में सभी रचनाओं की प्रतिभा दिखाई देती है.
माटी मेरे देश की चंदन, माथे पे लगाकर देखो
याद में बहती गंगा जमुना, आँखों से बहाकर देखो.
*
काविता कोरी मानवीय चिंता से नहीं रची जाती, उसका स्वरूप तब ही खिल पाता है जब उसमें ऊर्जामय भाव-बोध, सम्रद्ध कल्पना, रचनात्मक भाषा और सौंदर्य के बारीक और नये संवेदन हों. अपनी संवेदना को लगातार विकास के नये क्षितिज प्रदान करते हुए इस शेर में वे कहती है….
श्रीमती सीमा अरोरा (Philadelphia) का दुखद निधन का समाचार साहित्य जगत में एक न भरने वाला खालीपन छोड़ गया है….उनके शब्दों की गूँज हमारे बीच में उनकी याद को प्रतिध्वनित करती रहेगी उनके इन रचनात्मक पंक्तियों में की गूंज आज भी हमारे कानों तक आकार कहती है —
“हिन्दी को मैं अपनी माँ मानती हूँ जो सारी ज़िंदगी मेरे साथ रह रही है।“ आगे वह कहती है, ” मैं लिखती हूँ क्योंकि काव्य मेरी केवल कल्पना मात्र नहीं, परन्तु यह ह्रदय में उठी वो “हूक” है जो स्वयं में गुंजन पैदा करके मुझे आत्मवल, प्रोत्साहन तथा मनोवृति को संतुलित रखने की अनुभूति देती है. मेरे लिए यह औषधि और उपचार दोनों का काम करती है.” नारी मन की पीढ़ा, अपने होने और न होने के अंतर को अभिव्यक्त करते हुए कहती है
टूटी हुई टहनी का पत्ता समझ कर/ हवा में यूं कितना उड़ाते हो मुझको
मुझे रोंदने की, मसलने की इच्छा ले/ पैरों से ठोकर लगाते हो मुझको
डा. सुदर्शन प्रियदर्शिनी-
NJ की जानी-मानी कवियित्रि डा. सुदर्शन प्रियदर्शिनी- एक मँजी हुई कहानीकार और उपन्यासकार भी है जो जिंदगी के हर पहलू को अपनी कहानियों की रूप रेखा में सुसजित करती हैं, उनकी एक रचना का अंश आपके सामने है, देखिये कैसे शब्द प्रवाहित हो रहे हैं…
ज़िंदगी नदी पर बना हुआ /लकड़ी का एक अस्थायी पुल है /
जिस पर हम डगमगाते / डोलते / हिलोरे खाते / उस पार की ललक लिए / चले जाते हैं
*
पूर्णिमा देसाई न्यू यॉर्क में शिक्षायतन नमक संस्था की संस्थापिका एवं निर्देशिका लिखती है….
मैं हिन्दी हूँ, भारत माँ की बिंदी हूँ / मैं भारत की राष्ट्रभाषा हिन्दी हूँ
डॉ॰ सरिता मेहता (Huston –Texas) आजकल ह्यूस्टन में हिन्दी शिक्षा के प्रचार-प्रसार में लगी हुई हैं। बच्चों को मनोवैज्ञानिक रूप से शिक्षा देने में वे माहिर हैं।
दिवाली आई अब की बार फिर बरस के बाद /
पर अबकी बार बैठी हूँ मैं अकेली साथ समंदर पार
इन कविताओं को पढ़कर, सुनकर यही लगता है देस से दूर ये भारतीय प्रवासी अब भी भारत को, उसकी संस्कृति को, सभ्यता को अपने सीने में धड़कता हुआ पाते है, तब ही तो वे उस पीढ़ा की तड़प को महसूस करते है, इज़हार करते है। इसी दर्द की एक झलक मेरी इस ग़ज़ल में भी छलक़ती हुई दिखाई देती है॥
बादे-सबा वतन कि चन्दन सी आ रही है /यादों के पालने में मुझको झूला रही है।
शादाब मेरे दिल में इक याद है वतन की / तेरी भी याद उसमें घुल-मिल के आ रही है।
‘देवी’ महक है इसमें, मिट्टी की सौंधी सौंधी / मेरे वतन की खुशबू, केसर लुटा रही है.
जयहिंद
देवी नागरानी,
न्यू जर्सी, यू. एस. ए. 27 & 28 जन 2012 , ९ कार्नर व्यू सोसाइटी,15/33 रोड, बाँद्रा, मुंबई 40 ४०००५० फोन: 9987928358,





