छवि ७. आईना अक्स

छवि ७. आईना अक्स
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द्रश्य मेरे जीवन का
सामने मेरे खडा़
ऐसे जैसे
आईना और अक्स
बाल अवस्था, काट जवानी
हरी भरी जो धानी धानी
अब पतझड़ में तन्हा तन्हा
खडा हुआ बिन दाना पानी
मूक, निराधार
पर मन में इक आस लिए
कोई तो उसका है
जो बिन बताये
छलकेगा उस पर
बनकर शबनमी सी बूँद
उसकी प्यास बुझाने॥

छवि ६. रूह के लिये

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ि. रूह के लिये

रूह के लिये कोई कै़द नहीं है

बस, इस पिंजर शरीर की सलाखें

उसे बाँधे हुए है बंधन में॥

मुक्त होने की छटपटाहट

पल पल महसूस होती है

रिहाई के तलबगार सभी हम,

पा सकते हैं अभी यहाँ

बस! उल्टे कुँए की गहराई से

पार होकर जाना है॥

वहीं पर, हाँ वहीं पर

इक नये सूरज की रौशनी

एक नहीं, अनेकों सूरज

चाँद, सितारे,

झिलमिलाती नूरानी वह ज्योति

जगमग जगमग जलकर

राह रौशन कर रही है,

अँधेरे को चीरकर

अभी उसी तक जाना

आगे जाकर पाना है॥

 ॰ 

छवि ६ . वो मेरे अँदर है

 

    

पुखतगी से बंद कर

ठक ठक करता यह कभी

कभी करे है वह

पर मैं

दाँत भींचे शांत

                                                       गुम होना चाहती हूँ, यूँ

 

भनक पडे न किसको ये

मैं अदर रहती हूँ

रौशनदान कभी इक खोल

साँस मैं ले लेती हूँ

दुनिया के सब रंग देख

आँखें बंद करती हूँ

उम्र गुजारी ऐसा करते

पर अब

इसमें कोई शक नहीं

जो मैं बाहर ढूँढ रही हूँ

वो मेरे अंदर है॥

छवि ५: मँजिल तेरी दूर

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मुसाफिर मंजि़ल तेरी दूर
जाना बहुत ज़रूर….मुसाफिर॥
लंबा रस्ता, कदम है भारी
तन है चकनाचूर…मुसाफिर॥
पाप की गठरी सिर पर भारी
फिर तू क्यों मग़रूर…मुसाफिर॥
आप किया है आप उठाना
खुद का तू मज़दूर…मुसाफिर॥
॰॰

छवि ५. हाइकू

श्रम दिव्य है
जीवन सुँदर ये
मँगलधाम

प्यास बुझाए
जीवन मरुथल
आँख का पानी
३.
सब पडाव
हार हो चाहे जीत
हमसफर

हमसफर
है मेरे सफर की
ये तन्हाइयाँ
५.
माया छळनी
पग पग मुझको
डँक लगाए
६.
पाप पुञ्य को
मजबूरी या मर्ज
न पहचाने
७.
बहरा गूँगा
शहर पत्थरों का,
सुनता कौन?

छवि ४. दस्तक दे रहा है

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दस्तक दे रहा है

वातावरण मौन
बाहर शोर
विपरीत उसके
वह लीन है
आँखें मूँदे बाहर
अंदर की वह खोल रहा है
कोशिश में वह डोल रहा है
पर
दस्तक फिर भी दे रहा है
हाँ!
दस्तक फिर भी दे रहा है॥
॰॰
छवि ४. एक आत्मपिंजर शरीर
पिघलती हुई भूख
ठंडी से ठिठुरकर
थम गई है
एक आस
तिनका तिनका
भूख प्यास
साँसों की सरगम बनकर
धौंकनी सी चल रही है
भूख से शरीर ठंडा हो सकता है
पर आत्मा नहीं
उसका विश्वास है
वह शरीर नहीं है
आत्मा है
परमात्मा की याद में
पडा पडा उसी में विलीन
होने का प्रयास करती
एक आत्मा
माध्यम शरीर॥

छवि ४. दोहेजीवन तो इक देन है, दौलत जिसकी साँस
काल शिकारी आएगा, बनके लुटेरा बाज॥

मायूसी मँडरा रही, मन भी बहुत उदास
घायल पँछी क्या करे, कैसे हो परवाज॥

खुश हो बोया कल उसे, पाना तुमको आज
लाठी उसकी से डरो, करे न वो आवाज॥

छवि ३. सँगम

 

 

 

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“मौत की गोद
में ज़िंदगी आबाद
अब हो रही”

खोखला जिस्म
खोखली साँसें
पर, फिर भी रुक रुककर
चलने की चाह ज़िंदा है
शायद इसलिए ही
कच्ची उम्र की डोर
पीढी़ ढो रही है.
कदम लड़खडा़कर
सँभलने लगे है
ढलती उम्र है पर
सूर्यास्त शायद दूर.
सीने से लिपटी
हर खुशी दम तोड़ती है
हर आस रेत सी
क्यों हाथ से फिसलती है?
जीवन की गरमी
मौत की ठंडक
दोनों समुद्र के किनारे
पर मिलती हैं जब गले
हैरान होकर ज़िंदगी
पूछती है मौत से
“पहले क्यों ना तू मिला?
क्यूँ मिली थी ज़िंदगी?”
“ढळ गई थी उम्र पर
ढला न था सूरज तेरा ए जिँदगी!
चलो छोडो गिले शिकवे
जीवन है यतार्थ
जब तू मिली है मुझसे
और
मैं मिला हूँ तुझसे.”

**
छवि ३. रौशन मीनार

आस उम्मीद जिंदा मुझमें
और रहेगी तब तक
जब तक
चलती रहेगी, निडर हो
मेरी साँसें
सँग सँग मेरे
उस क्षितिज की ओर
जहाँ कल
उम्मीद का इक नया सूरज
फिर से उदय हो
मेरे वजूद का
रौशन मीनार कहलाएगा.
॰॰
छवि ३. ‍‍‍‍ ‍अः सच की सरहद

ज़िंदगी की शान है
सूरज अस्त होने तक
इन्सान की आन है
ज़िंदगी ढलने तक.
सच यह भी है
सच वह भी है
हर दौर से गुजर कर ज़िंदगी
हर पडा़व पर
ले साँसें, उनको सहलाती
सोच रही है
“जाना था सफ़र पर मुझे
क्यों मैं होश में बेहोश रही
क्यों ना भरम की हद को पार कर
सच की सरहद छू सकी
हाँ छू सकी!!!

छवि २:. साथी‍‌

 

 

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तन के साथी, मन के साथी
मिलकर बोझ उठाएँगे
मेहनत मजदूरी को दोनों
अपना ध्येय बनाएँगे.

 

पत्थर गारा जो भी होगा
हाथ से हाथ बटाएँगे
एक हंसे दूजा मुस्काये
मिलकर बोझ उठाएँगे.

 

वादा किया जो इक दूजे से
मिलकर उसे निभाएँगे
जीवन पथ पर कदम मिलाकर
दोनों बढ़ते जाएँगे.

छवि १. कण कण में

 

छवि १. कण कण में

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रेतीले कण कण में
इस वीरान दायरे के अंदर
खामोशी का दुशाला ओढे़
खड़ा है यकटक
पूरी आन बान के साथ
ऊपर आसमान की ओर देखता हुआ
द्रढ़ सा नागफनी
मानो कह रहा हो
” मैं अकेला नहीं हूँ
तन्हाई मेरे साथ है”

छवि १. कोई तो आएगा

छवि १. कोई तो आएगा

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सूनी सी पगडंडी पर,
इक आस
अभी भी साँस ले रही है
आँखो में निर्जीव सी आशा
बुझ कर फिर भी जल रही है
कोई तो आ॓एगा इस राह पर?
देखे हैं चिह्न मैंने जीवन के !
चिह्न कहो पदचिह्न कहो, या
साँसों की धीमी सी आहट
इंतजार में हवाओं के
सरसराहट सुन रही है
हाँ ! सुन रही है जिंदगी
“कोई तो आएगा”
ये सोच रही है.

***

चित्रावली 

छवि की आक्रतियाँ कलाकार की तूलिका से उतरकर लेखनी की नोक से स्याही में ढलकर एक अलग रूप धारण करती हैं, और सजीव होकर अपने भाव प्रकट करने की क्षमता रखती हैं. ऐसा एक सिसिला चला है हमारे चित्रकार कलाकार श्री विजेंद्र “विज” की इन अनुभूतियों का जिन में जिनके साथ उनमें जान फूंक कर पूरा इन्साफ किया है. अब कलम की नोक ने मेरे मन की भाननाओं को उजगार करते हुए कितना इन्साफ किया है यह आप पढ़े, परखें और…..


देवी नागरानी

ttp://photos.groups.yahoo.com/group/anubhuti-hindi/lst

 

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