ग़ज़लः ४०

रिश्ता तो सब ही जताते है

पर कुछ ही खूब निभाते है.

 

दुख दर्द हैं ऐसे महमां जो

आहट के बिन आ जाते है.

 

गर्दिश में सितारे है जिनके

वो दिन में भी घबराते है.

 

विश्वास की दौलत वालों को

रातों के अंधेरे भाते है.

 

ज़ंजीर में यादों की देवी

हम खुद को जकड़ते जाते है.

चराग़ -दिल/ ६६

कितने आफ़ात से लड़ी हूँ मैं

ग़ज़लः ३८

कितने आफ़ात से लड़ी हूँ मैं
तब तेरे दर पे आ खड़ी हूं मैं.

वो किसी से वफ़ा नहीं करता
कहता है बेवफ़ा बड़ी हूं मैं.

आसमें पर हैं चांद तारे सब
इस ज़मीं पर फ़कत पड़ी हूं मैं.

कद में बेशक बड़ा है तू मुझसे
उम्र में चार दिन बड़ी हूं मैं.

मैं तो नायाब इक नगीना हूं
अपने ही सांस में जड़ी हूं मै.

नाम है ज़िंदगी मगर देवी
अस्ल में मौत की कड़ी हूं मैं.

चराग़े-दिल/ ६४

तर्क कर के दोस्ती फिरता है क्यों?

ग़ज़लः ३७
तर्क कर के दोस्ती फिरता है क्यों
बनके आखिर अजनबी फिरता है क्यों?
चल वहां होगी जहां शामे-गज़ल
साथ लेकर बेदिली फिरता है क्यों?
बैठ आपस में चलो बातें करें
ओढ़ कर तू ख़ामुशी फिरता है क्यों?
जब नहीं दिल में खुशी तो किस लिये
लेके होटों पर हंसी फिरता है क्यों?
चाहतों के फूल, रिश्तों की महक
लेके ये दीवानगी फिरता है क्यों?
दाग़ दामन के ज़रा तू धो तो ले
इतनी लेकर गँदगी फिरता है क्यों?
है हकीकत से सभी का वास्ता
करके उससे बेरुख़ी फिरता है क्यों?
चराग़े-दिल/ ६३

कोई षडयंत्र रच रहा है क्या

ग़ज़लः३६

कोई षडयंत्र रच रहा है क्या
जन्मदाता बना हुआ है क्या?

राहगीरों को मिलके राहों पर
राह को घर समझ रहा है क्या?

रात दिन किस ख़ुमार में है तू
तुझ को अपना भी कुछ पता है क्या?

सुर्खियां जुल्म की हैं चेहरे पर
इस पे खुश होने में मज़ा है क्या?

दुष्ट देवीहो कोई तुमको क्या
छोड़ इस सोच में रखा है क्या?

चराग़े-दिल/ ६२

यही रौशनी है, यही रौशनी है.

ग़ज़लः ३५
बुझे दीप को जो जलाती रही है
यही रौशनी है, यही रौशनी है.
जो बेलौस अपने ख़ज़ाने लुटा दे
यही सादगी है,यही सादगी है.
रहे दूर सुख मेँ, मगर पास दुख में
यही दोस्ती है, यही दोस्ती है.
पिया हो मगर प्यास फिर भी हो बाक़ी
यही तिशनगी है, यही तिशनगी है.

बिना कुछ कहे बात आए समझ में
यही आशिकी है, यही आशिकी है.

कभी शांति में ख़ुश, कभी शोर में ख़ुश
यही बेदिली है, यही बेदिली है.

जो चाहा था वो सब न कर पाई ‘देवी’
यही बेबसी है, यही बेबसी है.

चराग़े-दिल/ ६१

बहता रहा जो दर्द का सैलाब

ग़ज़लः ३४
बहता रहा जो दर्द का सैलाब था न कम
आंखें भी रो रही हैं, ये अशआर भी है नम.

जिस शाख पर खड़ा था वो, उसको ही काटता
नादां न जाने खुद पे ही करता था क्यों सितम.

रिश्तों के नाम जो भी लिखे रेगज़ार पर
कुछ लेके आंधियां गईं, कुछ तोड़ते हैं दम.

मुरझा गई बहार में, वो बन सकी न फूल
मासूम-सी कली पे ये कितना बड़ा सितम.

रोते हुए-से जश्न मनाते हैं लोग क्यों
चेहरे जो उनके देखे तो, असली लगे वो कम.
चराग़े-दिल/ ६०

बताऊँ तुम्हें क्या है दिल का लगाना

ग़ज़लः ३३
ख़ता अब बनी है सजा का फ़साना
बताऊँ तुम्हें क्या है दिल का लगाना.
हवा में न जाने ये कैसा नशा है
पिये बिन ही झूमे है सारा ज़माना.
यहां रोज सजती है खुशियों की महफ़िल
मचलता है लब पर खुशी का तराना.
सदा घूमते हैं सरे-आम खतरे
बहुत ही है दुश्वार खुद को बचाना.
करें कैसे अपने-पराये की बातें
दिलों ने अगर दिल से रिश्ता न माना.
चराग़े-दिल/ ५९

करम ख़ुदा का है सब पर

ग़ज़लः ३२

ये सायबां है जहां, मुझको सर छुपाने दो

करम ख़ुदा का है सब पर, वो आज़माने दो.

जो दिल के तार छेड़े थे हमने बरसों से

उन्हें तो आज अभी छेड़ कर बजाने दो.

ख़फा न तुम हो किसी से भी देखकर कांटे

कि फूल कहता है जो कुछ, उसे बताने दो.

कभी तो दर्द भुलाकर भी मुस्कराओ तुम

दर्द के वो पुराने कभी बहाने दो.

ख़फ़ा हुई है खुशी इस क़दर भी क्यों हमसे

ग़मों का श् ने-मुबारक हमें मनाने दो.

उदासियों को छुपाओ दिल में तुम देवी

कभी लबों को भी कुछ देर मुस्कराने दो.

चराग़े-दिल/ ५८

अंधेरी गली में मेरा घर रहा है

गज़लः ३१
अंधेरी गली में मेरा घर रहा है
जहां तेल-बाती बिना इक दिया है.
जो रौशन मेरी आरजू का दिया है
मेरे साथ वो मेरी मां की दुआ है.
अजब है, उसी के तले है अंधेरा
दिया हर तरफ़ रौशनी बांटता है.
यहां मैं भी मेहमान हूं और तू भी
यहां तेरा क्या है, यहां मेरा क्या है.

खुली आंख में खाहिशों का समुंदर
न अंजाम जिनका कोई जानता है.

जहां देख पाई न अपनी ख़ुदी मैं
न जाने वहीं मेरा सर क्यों झुका है.

तुझे वो कहां ‘देवी’ बाहर मिलेगा
धड़कते हुए दिल के अंदर खुदा है.

चराग़े-दिल/ ५७

रूठा वो बे सबब न था मुझसे

ग़ज़लः ३०
जाने क्या कुछ हुई ख़ता मुझसे
रूठा वो बे सबब न था मुझसे.
जिसको हासिल न कुछ हुआ मुझसे
मौन का अर्थ पूछता मुझसे.
लोग क्या जाने जानने आए
नाता जिनका न था जुड़ा मुझसे.
जिसने रक्खा था कै़द में मुझको
खुद रिहाई था चाहता मुझसे.
ना-शनासों की बस्तियों में, कब
किसने रक्खा है राब्ता मुझसे.
सिलसिला राहतों का टूट गया
दिल की धड़कन हुई खफ़ा मुझसे.
चराग़े-दिल/ ५६

« Previous entries

  • Blog Stats

  • Meta