सारी ख़ामोशियों की हदें पार कर

गज़ल
राज़ दिल में छिपाए है वो किस क़दर
सारी ख़ामोशियों की हदें पार कर

यूँ तो जीते रहे रोज़ मर मर के हम
कर रहे हैं अभी एक गिनती मगर

 

मुस्कराता था वो ऐसे अँदाज़ से
जैसे ज़ख़्मों से उसका भरा हो जिगर

ज़िंदगी ने मुझे है बहुत जी लिया
सीख पाई उससे कभी ये हुनर

कितने रौशन सभी के है चेहरे यहां
मन में उनके बसा है अंधेरा मगर

दीन ईमान दुनियां में जाने कहां
पांव इक है इधर, दूसरा है उधर

तीर शब्दों के ऐसे निकलते रहे
छेदते ही रहे जो हमारा जिगर

ज़िंदगी को कभी भी समझे थे हम
ख़्वाब थी, ख़्वाब ही में गई वो गुज़र

डर की आहट देवी कभी सुन सकी
सामने मौत आई तो देखा था डर. ४२

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6s टिप्पणियाँ

  1. दिसम्बर 14, 2009 at 2:39 पूर्वाह्न

    यूँ तो जीते रहे रोज़ मर मर के हम
    कर रहे हैं अभी एक गिनती मगर.

    मुस्कराता था वो ऐसे अँदाज़ से
    जैसे ज़ख़्मों से उसका भरा हो जिगर.

    गजल के किस शेर को उदाहरण के लिए प्रस्तुत करूँ?
    सभी अशआर एक से बढ़कर एक है!

  2. vani geet said,

    दिसम्बर 14, 2009 at 2:41 पूर्वाह्न

    रोशन चेहरे में बसा अँधेरा हर कोई कहाँ देख पाता है …
    गहरी दृष्टि है आपकी कविता में …!!

  3. दिसम्बर 14, 2009 at 3:54 पूर्वाह्न

    मुस्कराता था वो ऐसे अँदाज़ से
    जैसे ज़ख़्मों से उसका भरा हो जिगर.

    -बहुत उम्दा रचना!! हमेशा की तरह!!

  4. दिसम्बर 14, 2009 at 5:26 पूर्वाह्न

    ज़िंदगी ने मुझे है बहुत जी लिया
    सीख पाई न उससे कभी ये हुनर.
    सुन्दर ……..

  5. दिसम्बर 14, 2009 at 12:51 अपराह्न

    यूँ तो जीते रहे रोज़ मर मर के हम
    कर रहे हैं अभी एक गिनती मगर.

    ज़िंदगी ने मुझे है बहुत जी लिया
    सीख पाई न उससे कभी ये हुनर.
    लाजवाब गज़ल है आपकी। विदेश मे रहते हिन्दी ब्लागर्ज़ मे स्त्रियों मे आप सब से अधिक चर्चित रही आक ही किसी ब्लाग पर ये खबर पढी बहुत बहुत बधाई

  6. Surinder said,

    जनवरी 27, 2010 at 5:39 अपराह्न

    Devi Ji, Namaste,

    Bahut sunder ghazal likhi hai aur mujhe yeh she’r bahut achche lage.

    Surinder

    कितने रौशन सभी के है चेहरे यहां
    मन में उनके बसा है अंधेरा मगर.

    दीन ईमान दुनियां में जाने कहां
    पांव इक है इधर, दूसरा है उधर.


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