गज़ल
राज़ दिल में छिपाए है वो किस क़दर
सारी ख़ामोशियों की हदें पार कर
यूँ तो जीते रहे रोज़ मर मर के हम
कर रहे हैं अभी एक गिनती मगर
मुस्कराता था वो ऐसे अँदाज़ से
जैसे ज़ख़्मों से उसका भरा हो जिगर
ज़िंदगी ने मुझे है बहुत जी लिया
सीख पाई न उससे कभी ये हुनर
कितने रौशन सभी के है चेहरे यहां
मन में उनके बसा है अंधेरा मगर
दीन ईमान दुनियां में जाने कहां
पांव इक है इधर, दूसरा है उधर
तीर शब्दों के ऐसे निकलते रहे
छेदते ही रहे जो हमारा जिगर
ज़िंदगी को कभी भी न समझे थे हम
ख़्वाब थी, ख़्वाब ही में गई वो गुज़र
डर की आहट न देवी कभी सुन सकी
सामने मौत आई तो देखा था डर. ४२



