November 27, 2008 at 7:04 am (ग़ज़ल-देवी नागरानी, चराग़े-दिल संग्रह)
ग़ज़लः३९
यूं उसकी बेवफाई का मुझको गिला न था
इक मैं ही तो नहीं जिसे सब कुछ मिला न था.
लिपटे हुए थे झूठ से कोई सच्चा न था
खोटे तमाम सिक्के थे, इक भी खरा न था.
उठता चला गया मेरी सोचों का कारवां
आकाश की तरफ कभी, वो यूं उड़ा न था.
माहौल था वही सदा, फि़तरत भी थी वही
मजबूर आदतों से था, आदम बुरा न था.
जिस दर्द को छुपा रखा मुस्कान के तले
बरसों में एक बार भी कम तो हुआ न था.
ढ़ोते रहे है बोझ सदा तेरा जिंदगी
जीने में लुत्फ़ क्यों कोई बाक़ी बचा न था.
कितने नक़ाब ओढ़ के ‘देवी’ दिये फरेब
जो बेनकाब कर सके वो आईना न था.
चराग़े-दिल/ ६५