ग़ज़लः ४०
रिश्ता तो सब ही जताते है
पर कुछ ही खूब निभाते है.
दुख दर्द हैं ऐसे महमां जो
आहट के बिन आ जाते है.
गर्दिश में सितारे है जिनके
वो दिन में भी घबराते है.
विश्वास की दौलत वालों को
रातों के अंधेरे भाते है.
ज़ंजीर में यादों की देवी
हम खुद को जकड़ते जाते है.




सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव said,
June 29, 2008 at 5:42 am
दुख दर्द हैं ऐसे महमां जो
आहट के बिन आ जाते है.
क्या बात कही है। अच्छी ग़ज़ल
Advocate Rashmi saurana said,
June 29, 2008 at 8:34 am
sundar rachna ko padhane ke liye aabar. jari rhe.
mahendra mishra said,
June 29, 2008 at 9:54 am
गर्दिश में सितारे है जिनके
वो दिन में भी घबराते है.
अच्छी ग़ज़ल.
Devi Nangrani said,
November 27, 2008 at 6:52 am
mera houla badane ke liye bahut bahut dhanywaad Rashmi ji, Mahendraji, satyendraji.
shybhkamnaon ke saath
Devi Nangrani