ग़ज़लः ४०
रिश्ता तो सब ही जताते है
पर कुछ ही खूब निभाते है.
दुख दर्द हैं ऐसे महमां जो
आहट के बिन आ जाते है.
गर्दिश में सितारे है जिनके
वो दिन में भी घबराते है.
विश्वास की दौलत वालों को
रातों के अंधेरे भाते है.
ज़ंजीर में यादों की देवी
हम खुद को जकड़ते जाते है.



