यूं उसकी बेवफाई का मुझको

 ग़ज़लः३९

यूं उसकी बेवफाई का मुझको गिला न था

इक मैं ही तो नहीं जिसे सब कुछ मिला ना था.

लिपटे हुए थे झूठ से कोई सच्चा न था

खोटे तमाम सिक्के थे, इक भी खरा न था.

उठता चला गया मेरी सोचों का कारवां

आकाश की तरफ कभी, वो यूं उड़ा न था.

माहौल था वही सदा, फि़तरत भी थी वही

मजबूर आदतों से था, आदम बुरा न था.

जिस दर्द को छुपा रखा मुस्कान के तले

बरसों में एक बार भी कम तो हुआ न था.

ढ़ोते रहे है बोझ सदा तेरा जिंदगी

जीने में लुत्फ़ क्यों कोई बाक़ी बचा न था.

कितने नकाब ओढ़ के ‘देवी’ दिये फरेब

जो बेनकाब कर सके वो आईना न था.

चराग़े -दिल/ ६५

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