June 29, 2008 at 5:07 am (ग़ज़ल-देवी नागरानी, चराग़े-दिल संग्रह)
ग़ज़लः ४०
रिश्ता तो सब ही जताते है
पर कुछ ही खूब निभाते है.
दुख दर्द हैं ऐसे महमां जो
आहट के बिन आ जाते है.
गर्दिश में सितारे है जिनके
वो दिन में भी घबराते है.
विश्वास की दौलत वालों को
रातों के अंधेरे भाते है.
ज़ंजीर में यादों की देवी
हम खुद को जकड़ते जाते है.
चराग़ -दिल/ ६६
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June 17, 2008 at 4:06 pm (Uncategorized)
ग़ज़लः३९
यूं उसकी बेवफाई का मुझको गिला न था
इक मैं ही तो नहीं जिसे सब कुछ मिला ना था.
लिपटे हुए थे झूठ से कोई सच्चा न था
खोटे तमाम सिक्के थे, इक भी खरा न था.
उठता चला गया मेरी सोचों का कारवां
आकाश की तरफ कभी, वो यूं उड़ा न था.
माहौल था वही सदा, फि़तरत भी थी वही
मजबूर आदतों से था, आदम बुरा न था.
जिस दर्द को छुपा रखा मुस्कान के तले
बरसों में एक बार भी कम तो हुआ न था.
ढ़ोते रहे है बोझ सदा तेरा जिंदगी
जीने में लुत्फ़ क्यों कोई बाक़ी बचा न था.
कितने नकाब ओढ़ के ‘देवी’ दिये फरेब
जो बेनकाब कर सके वो आईना न था.
चराग़े -दिल/ ६५
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