April 24, 2008 at 7:17 pm (ग़ज़ल-देवी नागरानी, चराग़े-दिल संग्रह)
ग़ज़लः ३८
कितने आफ़ात से लड़ी हूँ मैं
तब तेरे दर पे आ खड़ी हूं मैं.
वो किसी से वफ़ा नहीं करता
कहता है बेवफ़ा बड़ी हूं मैं.
आसमें पर हैं चांद तारे सब
इस ज़मीं पर फ़कत पड़ी हूं मैं.
कद में बेशक बड़ा है तू मुझसे
उम्र में चार दिन बड़ी हूं मैं.
मैं तो नायाब इक नगीना हूं
अपने ही सांस में जड़ी हूं मै.
नाम है ज़िंदगी मगर देवी
अस्ल में मौत की कड़ी हूं मैं.
चराग़े-दिल/ ६४
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April 24, 2008 at 7:12 pm (समाचार)
कुतुबनुमा एक दिशा सूचक साधन
अभिव्यक्ति की आज़ादी का पैरोकार पत्र है कुतुबनुमा. राजनीतिक बंटवारों और सरहदों के आर-पार गूंजती शायर- एक्टिविस्ट फ़ैज़ अहमद फै़ज़ की कालजयी ललकार जिसका प्रेरणा स्त्रोत्र है -
बोल कि लब आज़ाद है तेरे बोल
ज़बां अब तक तेरी है बोल, कि थोड़ा वक्त बहुत है.
ज़िस्म-ओ-ज़बां की मौत से पहले बोल
कि सच ज़ि्दा है अब तक बोल, जो कुछ कहना है वह कहले.
यहां देश की याद की जो कसक है वह सीने में सदा हरी भरी रहती है जो मेरी ग़ज़ल के इन अशयार से आवाज़ देती है हर दिल अज़ीज़ को.
शादाब मेरे दिल में इक याद है वतन की
तेरी भी याद उसमें, घुलमिल के आ रही है.
‘देवी’ महक है इसमें, मिट्टी की सौंधी सौंधी
मेरे वतन की खुशबू, केसर लुटा रही है.
कुतुबनुमा के पहले पन्ने पर साहिर लुधियानवी की यह रचना “जवाहरलाल नेहरू” की इस ललकारती नज़्म की दो शुरुवाती और दो आख़िरी पंक्तियां भी देश के अरमान जिँदा है इसीका ऐलान कर रही हैं-
जिस्म की मौत कोई मौत नहीं होती
जिस्म मिट जाने से इन्सान नहीं मर जाते
सांस थम जाने से ऐलान नहीं मर जाते
होंठ जम जाने से फ़रमान नहीं मर जाते.
इन्हीं सद भावनाओं की बुनियाद पर कुतुबनुमा के इस प्रवेशांक अंक, दिसंबर-फरवरी २००८ में अपने श्रेष्ट संपादन का सिक्का जमाया है डा॰ राजम नटराजन पिल्लै जी ने इसे राजनेता जवाहरलाल नेहरू को समर्पित करके, जिन्होने विश्व शक्ति के पथ पर अपने सिद्धांतो के बुनियादी पद चिन्ह छोड़े थे. राजम जी की निपुणता का परिचय देना सूरज को उंगली दिखाने के समान है. उनका संपादन ही उनका परिचय है और पहचान भी.


तस्वीर मे दायें से बायें -राजीव सारस्वत, अरविंद राही,मरियम गज़ाला, मा.ना. नरहरी, श्री आर. पी. शर्मा, अहमद वसी,राम गोविंद, माया गोविंद, राजम जी, निरालाप्रसाद जी.
चलते है इस सभा के परिचय के बाद इसी दिशा सूचक कुतुबनुमा की ओर से आयोजित काव्य गोष्टी रविवार दिनांक २९ मार्च, २००८ को वरिष्ट ग़ज़लकार व रचनाकार श्री खन्ना मुज़फ़्फ़रपुरी के निवास स्थान पर संपन्न हुई. वरिष्ट ग़ज़लकार श्री आर. पी. शर्मा “महर्ष” की अध्यक्षता तथा अनंत श्रीमाली के संचालन में आयोजित इस गोष्टी में पधारे अनेक शाइर व रचनाकार, मुख्य महमान माया गोविंद, राम गोविंद, के साथ साथ मा.ना. नरहरी, जनाब अहमद वसी, गीतकार शैलेन्द्र जी, निरालाप्रसाद जी व उनके सुपुत्र, मधुजी अरोड़ा, मरियम गज़ाला, रत्ना झा, रघुवंशी जी, देवमणी पांडेय, शबनम कपूर, राजीव सारस्वत, अरविंद राही, विजय, मैं- देवी नागरानी, राजम जी और स्वयं खन्ना साहब. सभी ने उत्तम रचनाओं का पाठ किया.


तस्वीर में हैं शबनम कपूर, गीतकार शैलेन्द्र जी,श्री आर. पी. शर्मा “महर्ष” , श्री खन्ना मुज़फ़्फ़रपुरी, अनंत श्रीमाली और देवी नागरानी,
कुतुबनुमा की संपादिका राजम नटराजन ने श्री आर. पी. शर्मा “महर्ष” जी का, माया गोविंद और देवी नागरानी जी का फूल व शाल के साथ सन्मान किया. महरिष जी ने अध्यक्षीय संबोधन में कवि गण की रचनाओं की पाठनीयता को सराहा और अपनी कुछ गज़ल सुनाकर सभी को आंनद विभोर कर दिया. अंत में खन्ना जी ने सभी अतिथि गण का सन्मान सहित आभार प्रकट किया.
मै अपनी दिली मुबारकबाद और शुभकामनायें राजम जी को इस दिशा सूचक “कुतुबनुमा” के लिये प्रेषित करती हूँ. जयहिंद
देवी नागरानी
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