छवि ६. रूह के लिये
March 27, 2008 at 12:24 pm (चित्रावली)
छवि ६. रूह के लिये
रूह के लिये कोई कै़द नहीं है
बस, इस पिंजर शरीर की सलाखें
उसे बाँधे हुए है बंधन में॥
मुक्त होने की छटपटाहट
पल पल महसूस होती है
रिहाई के तलबगार सभी हम,
पा सकते हैं अभी यहाँ
बस! उल्टे कुँए की गहराई से
पार होकर जाना है॥
वहीं पर, हाँ वहीं पर
इक नये सूरज की रौशनी
एक नहीं, अनेकों सूरज
चाँद, सितारे,
झिलमिलाती नूरानी वह ज्योति
जगमग जगमग जलकर
राह रौशन कर रही है,
अँधेरे को चीरकर
अभी उसी तक जाना
आगे जाकर पाना है॥
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छवि ६. वो मेरे अँदर है
पुखतगी से बंद कर
ठक ठक करता यह कभी
कभी करे है वह
पर मैं
दाँत भींचे शांत
गुम होना चाहती हूँ, यूँ
भनक पडे न किसको ये
मैं अदर रहती हूँ
रौशनदान कभी इक खोल
साँस मैं ले लेती हूँ
दुनिया के सब रंग देख
आँखें बंद करती हूँ
उम्र गुजारी ऐसा करते
पर अब
इसमें कोई शक नहीं
जो मैं बाहर ढूँढ रही हूँ
वो मेरे अंदर है॥




