कोई षडयंत्र रच रहा है क्या

ग़ज़लः३६

कोई षडयंत्र रच रहा है क्या
जन्मदाता बना हुआ है क्या?

राहगीरों को मिलके राहों पर
राह को घर समझ रहा है क्या?

रात दिन किस ख़ुमार में है तू
तुझ को अपना भी कुछ पता है क्या?

सुर्खियां जुल्म की हैं चेहरे पर
इस पे खुश होने में मज़ा है क्या?

दुष्ट देवीहो कोई तुमको क्या
छोड़ इस सोच में रखा है क्या?

चराग़े-दिल/ ६२

5 Comments

  1. mehhekk said,

    March 27, 2008 at 12:55 pm

    सुर्खियां जुल्म की हैं चेहरे पर
    इस पे खुश होने में मज़ा है क्या?

    दुष्ट ‘देवी’ हो कोई तुमको क्या
    छोड़ इस सोच में रखा है क्या?
    wah bahut khub

  2. समीर लाल said,

    March 27, 2008 at 1:24 pm

    वाह वाह
    !!!

    बहुत खूब, देवी जी!!

  3. divyabh said,

    March 27, 2008 at 4:11 pm

    बहुत दिनों बाद एक दार्शनिक चिंतन से निकला हुआ गज़ल पढ़ने को मिला है…
    बेहद खूबसूरती से सारे शब्दों को रखा गया है…।

  4. Isht Deo Sankrityaayan said,

    March 27, 2008 at 6:32 pm

    बहुत खूब!

  5. Devi Nangrani said,

    March 29, 2008 at 10:38 am

    Aap sabhi ka tahe dil se dhanyawaad aur housla banaye rakhne ke liye bhi
    ssneh
    Devi

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