छवि ६. रूह के लिये

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ि. रूह के लिये

रूह के लिये कोई कै़द नहीं है

बस, इस पिंजर शरीर की सलाखें

उसे बाँधे हुए है बंधन में॥

मुक्त होने की छटपटाहट

पल पल महसूस होती है

रिहाई के तलबगार सभी हम,

पा सकते हैं अभी यहाँ

बस! उल्टे कुँए की गहराई से

पार होकर जाना है॥

वहीं पर, हाँ वहीं पर

इक नये सूरज की रौशनी

एक नहीं, अनेकों सूरज

चाँद, सितारे,

झिलमिलाती नूरानी वह ज्योति

जगमग जगमग जलकर

राह रौशन कर रही है,

अँधेरे को चीरकर

अभी उसी तक जाना

आगे जाकर पाना है॥

 

॰॰

 

छवि ६. वो मेरे अँदर है

पुखतगी से बंद कर

ठक ठक करता यह कभी

कभी करे है वह

पर मैं

दाँत भींचे शांत

गुम होना चाहती हूँ, यूँ

भनक पडे न किसको ये

मैं अदर रहती हूँ

रौशनदान कभी इक खोल

साँस मैं ले लेती हूँ

दुनिया के सब रंग देख

आँखें बंद करती हूँ

उम्र गुजारी ऐसा करते

पर अब

इसमें कोई शक नहीं

जो मैं बाहर ढूँढ रही हूँ

वो मेरे अंदर है॥

कोई षडयंत्र रच रहा है क्या

ग़ज़लः३६

कोई षडयंत्र रच रहा है क्या
जन्मदाता बना हुआ है क्या?

राहगीरों को मिलके राहों पर
राह को घर समझ रहा है क्या?

रात दिन किस ख़ुमार में है तू
तुझ को अपना भी कुछ पता है क्या?

सुर्खियां जुल्म की हैं चेहरे पर
इस पे खुश होने में मज़ा है क्या?

दुष्ट देवीहो कोई तुमको क्या
छोड़ इस सोच में रखा है क्या?

चराग़े-दिल/ ६२

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