छवि ५: मँजिल तेरी दूर

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मुसाफिर मंजि़ल तेरी दूर
जाना बहुत ज़रूर….मुसाफिर॥
लंबा रस्ता, कदम है भारी
तन है चकनाचूर…मुसाफिर॥
पाप की गठरी सिर पर भारी
फिर तू क्यों मग़रूर…मुसाफिर॥
आप किया है आप उठाना
खुद का तू मज़दूर…मुसाफिर॥
॰॰

छवि ५. हाइकू

श्रम दिव्य है
जीवन सुँदर ये
मँगलधाम

प्यास बुझाए
जीवन मरुथल
आँख का पानी
३.
सब पडाव
हार हो चाहे जीत
हमसफर

हमसफर
है मेरे सफर की
ये तन्हाइयाँ
५.
माया छळनी
पग पग मुझको
डँक लगाए
६.
पाप पुञ्य को
मजबूरी या मर्ज
न पहचाने
७.
बहरा गूँगा
शहर पत्थरों का,
सुनता कौन?

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