यही रौशनी है, यही रौशनी है.

ग़ज़लः ३५
बुझे दीप को जो जलाती रही है
यही रौशनी है, यही रौशनी है.
जो बेलौस अपने ख़ज़ाने लुटा दे
यही सादगी है,यही सादगी है.
रहे दूर सुख मेँ, मगर पास दुख में
यही दोस्ती है, यही दोस्ती है.
पिया हो मगर प्यास फिर भी हो बाक़ी
यही तिशनगी है, यही तिशनगी है.

बिना कुछ कहे बात आए समझ में
यही आशिकी है, यही आशिकी है.

कभी शांति में ख़ुश, कभी शोर में ख़ुश
यही बेदिली है, यही बेदिली है.

जो चाहा था वो सब न कर पाई ‘देवी’
यही बेबसी है, यही बेबसी है.

चराग़े-दिल/ ६१

छवि ४. दस्तक दे रहा है

chavi-4.jpg

दस्तक दे रहा है

वातावरण मौन
बाहर शोर
विपरीत उसके
वह लीन है
आँखें मूँदे बाहर
अंदर की वह खोल रहा है
कोशिश में वह डोल रहा है
पर
दस्तक फिर भी दे रहा है
हाँ!
दस्तक फिर भी दे रहा है॥
॰॰
छवि ४. एक आत्मपिंजर शरीर
पिघलती हुई भूख
ठंडी से ठिठुरकर
थम गई है
एक आस
तिनका तिनका
भूख प्यास
साँसों की सरगम बनकर
धौंकनी सी चल रही है
भूख से शरीर ठंडा हो सकता है
पर आत्मा नहीं
उसका विश्वास है
वह शरीर नहीं है
आत्मा है
परमात्मा की याद में
पडा पडा उसी में विलीन
होने का प्रयास करती
एक आत्मा
माध्यम शरीर॥

छवि ४. दोहेजीवन तो इक देन है, दौलत जिसकी साँस
काल शिकारी आएगा, बनके लुटेरा बाज॥

मायूसी मँडरा रही, मन भी बहुत उदास
घायल पँछी क्या करे, कैसे हो परवाज॥

खुश हो बोया कल उसे, पाना तुमको आज
लाठी उसकी से डरो, करे न वो आवाज॥

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