March 21, 2008 at 8:26 am (ग़ज़ल-देवी नागरानी, चराग़े-दिल संग्रह)
ग़ज़लः ३४
बहता रहा जो दर्द का सैलाब था न कम
आंखें भी रो रही हैं, ये अशआर भी है नम.
जिस शाख पर खड़ा था वो, उसको ही काटता
नादां न जाने खुद पे ही करता था क्यों सितम.
रिश्तों के नाम जो भी लिखे रेगज़ार पर
कुछ लेके आंधियां गईं, कुछ तोड़ते हैं दम.
मुरझा गई बहार में, वो बन सकी न फूल
मासूम-सी कली पे ये कितना बड़ा सितम.
रोते हुए-से जश्न मनाते हैं लोग क्यों
चेहरे जो उनके देखे तो, असली लगे वो कम.
चराग़े-दिल/ ६०
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March 21, 2008 at 8:18 am (समाचार)

न्यू जर्सी, अमेरिका की प्रवासी साहित्यकार देवी नागरानी को ग़ज़ल लेखन के लिए १६-१७ फरवरी को देश की महत्वपूर्ण साहित्यिक संस्था सृजन-सम्मान द्वारा सृजन-श्री से अलंकृत किया गया । उन्हें सम्मानित करते हुए धर्मयुग, नवभारत टाइम्स के पूर्व संपादक व वर्तमान में नवनीत के संपादक, विश्वनाथ सचदेव, वरिष्ठ आलोचक व प्रवासी साहित्य विशेषज्ञ कमलकिशोर गोयनका, तथा उत्तरप्रदेश के पूर्व विधानसभा अध्यक्ष व वरिष्ठ साहित्यकार केशरीनाथ त्रिपाठी.
http://srijansamman.blogspot.com/2008/03/blog-post_05.html
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