बताऊँ तुम्हें क्या है दिल का लगाना

ग़ज़लः ३३
ख़ता अब बनी है सजा का फ़साना
बताऊँ तुम्हें क्या है दिल का लगाना.
हवा में न जाने ये कैसा नशा है
पिये बिन ही झूमे है सारा ज़माना.
यहां रोज सजती है खुशियों की महफ़िल
मचलता है लब पर खुशी का तराना.
सदा घूमते हैं सरे-आम खतरे
बहुत ही है दुश्वार खुद को बचाना.
करें कैसे अपने-पराये की बातें
दिलों ने अगर दिल से रिश्ता न माना.
चराग़े-दिल/ ५९

  • Blog Stats

  • Meta