छवि ७. आईना अक्स
March 29, 2008 at 10:55 am (चित्रावली)
March 29, 2008 at 10:55 am (चित्रावली)
March 29, 2008 at 10:51 am (ग़ज़ल-देवी नागरानी, चराग़े-दिल संग्रह)
March 29, 2008 at 10:41 am (समाचार)
न्यू जर्सी, अमेरिका की प्रवासी साहित्यकार देवी नागरानी को ग़ज़ल लेखन के लिए १६-१७ फरवरी को देश की महत्वपूर्ण साहित्यिक संस्था सृजन-सम्मान द्वारा सृजन-श्री से अलंकृत किया गया । उन्हें सम्मानित करते हुए धर्मयुग, नवभारत टाइम्स के पूर्व संपादक व वर्तमान में नवनीत के संपादक, विश्वनाथ सचदेव, वरिष्ठ आलोचक व प्रवासी साहित्य विशेषज्ञ कमलकिशोर गोयनका, तथा उत्तरप्रदेश के पूर्व विधानसभा अध्यक्ष व वरिष्ठ साहित्यकार केशरीनाथ त्रिपाठी
March 27, 2008 at 12:24 pm (चित्रावली)
छवि ६. रूह के लिये
रूह के लिये कोई कै़द नहीं है
बस, इस पिंजर शरीर की सलाखें
उसे बाँधे हुए है बंधन में॥
मुक्त होने की छटपटाहट
पल पल महसूस होती है
रिहाई के तलबगार सभी हम,
पा सकते हैं अभी यहाँ
बस! उल्टे कुँए की गहराई से
पार होकर जाना है॥
वहीं पर, हाँ वहीं पर
इक नये सूरज की रौशनी
एक नहीं, अनेकों सूरज
चाँद, सितारे,
झिलमिलाती नूरानी वह ज्योति
जगमग जगमग जलकर
राह रौशन कर रही है,
अँधेरे को चीरकर
अभी उसी तक जाना
आगे जाकर पाना है॥
॰॰
छवि ६. वो मेरे अँदर है
पुखतगी से बंद कर
ठक ठक करता यह कभी
कभी करे है वह
पर मैं
दाँत भींचे शांत
गुम होना चाहती हूँ, यूँ
भनक पडे न किसको ये
मैं अदर रहती हूँ
रौशनदान कभी इक खोल
साँस मैं ले लेती हूँ
दुनिया के सब रंग देख
आँखें बंद करती हूँ
उम्र गुजारी ऐसा करते
पर अब
इसमें कोई शक नहीं
जो मैं बाहर ढूँढ रही हूँ
वो मेरे अंदर है॥
March 27, 2008 at 12:19 pm (ग़ज़ल-देवी नागरानी, चराग़े-दिल संग्रह)
ग़ज़लः३६
कोई षडयंत्र रच रहा है क्या
जन्मदाता बना हुआ है क्या?
राहगीरों को मिलके राहों पर
राह को घर समझ रहा है क्या?
रात दिन किस ख़ुमार में है तू
तुझ को अपना भी कुछ पता है क्या?
सुर्खियां जुल्म की हैं चेहरे पर
इस पे खुश होने में मज़ा है क्या?
दुष्ट ‘देवी’ हो कोई तुमको क्या
छोड़ इस सोच में रखा है क्या?
चराग़े-दिल/ ६२
March 26, 2008 at 5:51 am (चित्रावली)
छवि ५. हाइकू
१
श्रम दिव्य है
जीवन सुँदर ये
मँगलधाम
२
प्यास बुझाए
जीवन मरुथल
आँख का पानी
३.
सब पडाव
हार हो चाहे जीत
हमसफर
४
हमसफर
है मेरे सफर की
ये तन्हाइयाँ
५.
माया छळनी
पग पग मुझको
डँक लगाए
६.
पाप पुञ्य को
मजबूरी या मर्ज
न पहचाने
७.
बहरा गूँगा
शहर पत्थरों का,
सुनता कौन?
March 26, 2008 at 5:47 am (ग़ज़ल छंद शास्त्र)
March 25, 2008 at 5:45 am (ग़ज़ल-देवी नागरानी, चराग़े-दिल संग्रह)
बिना कुछ कहे बात आए समझ में
यही आशिकी है, यही आशिकी है.
कभी शांति में ख़ुश, कभी शोर में ख़ुश
यही बेदिली है, यही बेदिली है.
जो चाहा था वो सब न कर पाई ‘देवी’
यही बेबसी है, यही बेबसी है.
चराग़े-दिल/ ६१
March 25, 2008 at 5:41 am (चित्रावली)
दस्तक दे रहा है
वातावरण मौन
बाहर शोर
विपरीत उसके
वह लीन है
आँखें मूँदे बाहर
अंदर की वह खोल रहा है
कोशिश में वह डोल रहा है
पर
दस्तक फिर भी दे रहा है
हाँ!
दस्तक फिर भी दे रहा है॥
॰॰
छवि ४. एक आत्मपिंजर शरीर
पिघलती हुई भूख
ठंडी से ठिठुरकर
थम गई है
एक आस
तिनका तिनका
भूख प्यास
साँसों की सरगम बनकर
धौंकनी सी चल रही है
भूख से शरीर ठंडा हो सकता है
पर आत्मा नहीं
उसका विश्वास है
वह शरीर नहीं है
आत्मा है
परमात्मा की याद में
पडा पडा उसी में विलीन
होने का प्रयास करती
एक आत्मा
माध्यम शरीर॥
छवि ४. दोहेजीवन तो इक देन है, दौलत जिसकी साँस
काल शिकारी आएगा, बनके लुटेरा बाज॥
मायूसी मँडरा रही, मन भी बहुत उदास
घायल पँछी क्या करे, कैसे हो परवाज॥
खुश हो बोया कल उसे, पाना तुमको आज
लाठी उसकी से डरो, करे न वो आवाज॥
March 21, 2008 at 8:26 am (ग़ज़ल-देवी नागरानी, चराग़े-दिल संग्रह)
जिस शाख पर खड़ा था वो, उसको ही काटता
नादां न जाने खुद पे ही करता था क्यों सितम.
रिश्तों के नाम जो भी लिखे रेगज़ार पर
कुछ लेके आंधियां गईं, कुछ तोड़ते हैं दम.
मुरझा गई बहार में, वो बन सकी न फूल
मासूम-सी कली पे ये कितना बड़ा सितम.
रोते हुए-से जश्न मनाते हैं लोग क्यों
चेहरे जो उनके देखे तो, असली लगे वो कम.
चराग़े-दिल/ ६०