रूठा वो बे सबब न था मुझसे.
मौन का अर्थ पूछता मुझसे.
नाता जिनका न था जुड़ा मुझसे.
खुद रिहाई था चाहता मुझसे.
किसने रक्खा है राब्ता मुझसे.
दिल की धड़कन हुई खफ़ा मुझसे.
December 26, 2007 at 4:13 pm (ग़ज़ल-देवी नागरानी, चराग़े-दिल संग्रह)
December 26, 2007 at 4:41 am (भाषा विमर्ष)
जोड़कर एक मुकमिल कदम उठा सकते हैं जिसे भाषा को पुख़्तगी मिल सके और एक महासागर का स्वरूप प्राप्त कर हो सके. साहित्य के माध्यम से ही हम एक दूसरे से जुड़ सकते है. यह मिलन आने वाली राहों को रौशन करता रहेगा.” लोकार्पण के समय के उपस्थित सभी लेखक और लेखिकायें तस्वीर में हैं
December 26, 2007 at 12:55 am (ग़ज़ल छंद शास्त्र)
“ग़ज़ल कहने के लिये हमें कुशल शिल्पी बनना होता है ताकि हम शब्दों को
तराश कर उन्हें मूर्त रूप दे सकें, उनकी जड़ता में अर्थपूर्ण प्राणों का संचार कर सकें तथा ग़ज़ल के प्रत्येक शेर की दो पंक्तियों (मिसरों) में अपने भावों, उद्गारों, अनुभूतियों आदि के उमड़ते हुए सैलाब को ‘मुट्ठी में आकाश, कठौती में गंगा, कूजे में दरिया, बूँद में सागर के समान समेट कर भर सकें। इसके लिये हमें स्वयं को सक्षम तथा लेखनी को सशक्त बनाना होता है। तब जाकर हम में वह सलीका, वह शऊर, वह सलाहियत, वह योग्यता एवं क्षमता उत्पन्न होती है कि हम ऐसे कलात्मक शेर सृजित करने में समर्थ होते हैं जो “लोकोक्ति” बन जाते हैं, और अक्सर मौकों पर हमारी ज़बान पर रवाँ (गतिशील) हो जाते हैं।” जैसेः
मैं जिसे ओढ़ता बिछाता हूँ
वो ग़ज़ल आपको सुनाता हूँ
–दुष्यंत कुमार
कहानी मेरी रूदादे-जहाँ मालूम होती है
जो सुनता है, उसीकी दास्ताँ मालूम होती है
-सीमाब अकबराबादी
इस संबंध में, श्री ज्ञानप्रकाश विवेक, ग़ज़ल के कला पक्ष को विशेष महत्व देते हुए कहते हैं
“ग़ज़ल की बुनियादी शर्त उसका शिल्प है। एक अनगढ़ ग़ज़ल एक अनगढ़ पत्थर की तरह होती है। संगतराश जिस प्रकार छेनी ओर हथोड़ी से पत्थर में जीवंतता ला देता है और तराशे गये पत्थर में उसका एहसास, उसकी अनुभूतियाँ और उसकी अभिव्यक्ति छुपी होती है, वो सब सजीव सी लगती हैं। इसी प्रकार क तराशी हुई ग़ज़ल का तराशा हुआ शेर, सिर्फ दो मिसरों का मिलाप नहीं होता, न उक्ति होती है, न सूक्ति, अपितु वह एक आकाश होता है -अनुभूतियों का आकाश! ग़ज़ल का एक-एक शेर कहानी होता है।” हिंदी में ग़ज़ल-दुष्यंत के बाद-एक पड़ताल, आरोह ग़ज़ल अंक से
यूँ तराशा है उनको शिल्पी ने
जान सी पड़ गई शिलाओं में
-देवी
सारा आकाश नाप लेता है
कितनी ऊँची उड़ान है तेरी
-देवी
(ये शेर महरिष जी को बहुत पसंद थे)
शेर को कहने व समझने के बारे में बकौल हज़त मुन्नवर लख़नवी साहब का शेर प्रस्तुत करते हैं –
शेर कहना यूँ तो मोती है मोी पिरोने का अमल
शेर कहने से भी बहतर है समझना शेर का।
इस फ़न के कद्रदान हज़रत अनवर साबरी के लफ्ज़ों में सुनियेः “ग़ज़ल को छोटी छोटी बहरों में ढालना तथा उसमें प्रयुक्त थोड़े से शब्दों में मन की बात कहना और वह भी सहजता से, यह भी एक कमाल की कला है।”
ग़ज़ल विधा को कलात्मक बनाने में सुलझी हुई भाषा का बहुत बड़ा हाथ है। जैसा कि पद्मश्री गोपालदास “नीरज” का कहना हैः “उर्दू शायरी की लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण है भाषा का सही प्रयोग। उर्दू में वाक्यों को तोड़-मरोड़ने बजाय, भाषा को उसके गद्यात्मक अनुशासन के साथ पेश किया जाय तो उसमें रस, अलंकार बरपूत आ जाते हैं”
शायर तो कोई शख़्स भी हो सकता है
फ़नकार मगर बनना बहुत मुश्किल है….बक़ौल डा॰ अल्लामी(रुबाई की अंतिम दो पंक्तियाँ)
अपने नये ग़ज़ल संग्रह चराग़े दिल में देवी नागरानी ग़ज़ल के विषय में क्या कहती हैः
“कुछ खुशी की किरणें, कुछ पिघलता दर्द आँख की पोर से बहता हुआ, कुछ शबनमी सी ताज़गी अहसासों में, तो कभी भँवर गुफा की गहराइयों से उठती उस गूँज को सुनने की तड़प मन में जब जाग उठती है तब कला का जन्म होता है। सोच की भाषा बोलने लगती है, चलने लगती है, कभी कभी तो चीखने भी लगती है।यह कविता बस और कुछ नहीं, केवल मन के भाव प्रकट करने का माध्यम है, जिन्हें शब्दों का लिबास पहना कर एक आकृति तैयार करते हैं, वो हमारी सोच की उपज होती है फिर चाहे रुबाई हो या कोई लेख, गीत हो या ग़ज़ल।”
और आगे बढ़ते हुए महरिष जी कहते है ग़ज़ल उर्दू के अतिरिक्त हिंदी, मराठी, गुजराती, पंजाबी, कशमीरी, भोजपुरी, छत्तीसगढ़ी, सिंधी तथा भारत की अन्य कुछ भाषाओं में लिखी जाती है। ज़रा मुलाइजा फरमाएँ कि “प्रोत्साहन” त्रैमासिक के प्रधान संपादक श्री जीवतराम सेतपाल अपने सम्पादकीय में ग़ज़ल के बारे में क्या कहते हैः
“सुकुमार जूही की कली की भांति, मोंगरे की मदमाती सुगंध लेकर, गुलाबी अंगड़ाई लेती हुई, पदार्पण करने वाली ग़ज़ल, भारतीय वाङ्मय की काव्य विधा के उपवन में रात की रानी बन बैठी। अरबी साहित्य से निस्सृत, फ़ारसी भाषा में समादृत, उर्दू में जवान होकर, अपनी तरुणाई की छटा बिखेरने और हिंदी साहित्य के महासागर में सन्तरण करने आ गई है ग़ज़ल। कम शब्दों में गंभीरता पूर्वक बड़ी से बड़ी बात को भी, नियमों में बाँधकर बड़ी सफलता और सहजता से दोहों की भाँति गहराई से कह देने में समर्थ, गेय, अत्याधिक लयात्मक, काव्य विधा का मख़मली अंग है ग़ज़ल।“
हरियाणा के श्री निशांतकेतु एक जगह लिखते है- “शायरी एक मखमली चादर जैसी होती है, जिसे शाइर अपनी साँसों से बुनता है, जिस्म और रूह के बीच दिल की धड़कनों से सुनता है।”
प्रो॰ रामचन्द्र के शब्दों में “जब तक ग़ज़लकार अपने शेरों में सामूहिक सच्चाइयों के व्यक्तिगत भोग को आत्मसात कर, प्रस्तुत नहीं करता, तब तक उसके काफ़िये और रदीफ़ चाहे जितने सुंदर क्यों न हो, उसके शेर उसकी ग़ज़ल का सही अस्तित्व खड़ा नहीं कर सकता। ग़ज़लकार के अनुभव जब पाठकों के भागीदार बनते है तब जाकर ग़ज़ल की जान सामने आती है।”
ग़ज़ल के परिचय से वाकिफ़ कराते हुए आगे महरिष जी कहते हैं – “अच्छी ग़ज़ल के प्रत्येक शेर का पहला मिसरा कुछ इस प्रकार कहा जाता है कि श्रोता दूसरे मिसरे को सुनने के लिये उत्कंठित हो जाता है, और उसे सुनते ही चमत्कृत तथा आनन्द विभोर हो उठता है। “ग़ज़ल” के विचार काफ़ियों (तुकांत शब्दों) के इर्द गिर्द घूमते हैं। काफ़िया शेर का चर्मोत्कर्ष है, जिस पर आते ही और निहितार्थ या व्यंगार्थ को समझते ही श्रोता अथवा पाठक चमत्कृत एवं विमुग्ध हो उठते हैं। वास्तविकता यह है कि कथ्य और शिल्प के सुंदर तालमेल से ही एक सही ग़ज़ल जन्म लेती है। “ श्री दीक्षित दनकौरी द्वारा संपादित “ग़जल दुष्यंत के बाद” में लिखे महरिष जी के कुछ अंश है ये। अंत में स्वरचित ग़ज़ल की कुछ पँक्तियाँ प्रस्तुत हैं –
फूल खिले, गुंजार हुई है
एक ग़ज़ल साकार हुई है
झनके है शब्दों के नुपुर
अर्थ-भरी झंकार हुई है।
मन की कोई अनुभूति अचानक
रचना का आधार हुई है
बात कभी शबनम सी “महरिष”
और कभी अंगार हुई है।
(ग़ज़ल लेखन कला से)
कितना सत्य है उनके कहे इस शेर में
वो अल्फ़ाज़ मुँह बोले ढूँढती है
ग़ज़ल ज़िन्दादिल काफिए ढूँढती है।
आगे और तीसरा भाग
अगले भाग में श्री आर. पी. शर्मा ‘महरिष‘ से किये कुछ प्रश्नोत्तर सामने आयेंगे जिसमें ग़ज़ल क्या, कब, क्यों और कैसे लिखी जाती है उसके बारें में जानकारी होगी।
ग़ज़ल क्या, कब, क्यों और कैसे…..
December 26, 2007 at 12:41 am (ग़ज़ल छंद शास्त्र)
श्री आर.पी. शर्मा का जन्म ७ मार्च १९२२ ई को गोंडा में (उ.प्र.) में हुआ। शासकीय सेवा से सेवानिवृत्त श्री शर्मा जी का उपनाम “महरिष” है और आप मुंबई में निवास करते हैं। अपने जीवन-सफर के ८५ वर्ष पूर्ण कर चुके श्री शर्मा जी की साहित्यिक रुचि आज भी निरंतर बनी हुई है। ग़ज़ल रचना के प्रति आप की सिखाने की वृति माननीय है। विचारों में स्फूर्ति व ताज़गी बनी हुई है, जिसका प्रभाव आपकी ग़ज़लों में बखूबी देखा जा सकता है, तथा विचारों की यह ताज़गी आप की रोज़मर्रा की जिंदगी को भी संचालित करती रहती है। ग़ज़ल संसार में वे “पिंगलाचार्य” की उपाधि से सम्मानित हुए हैं, और मुझे फ़क्र है कि आज मैं उन्हें अपना गुरु मानती हूँ, शायद इस श्रद्धा और विश्वास का एक कारण यह भी है कि मैं बिलकुल थोड़े ही समय में बहुत कुछ सीख पाई, जो मुझे इस राह का पथिक होने का अधिकार देता है। गज़ल लेखन कला मेरे विचार में एक सफ़र है जिसकी मंज़िल शायद नहीं होती।
तवील जितना सफ़र ग़ज़ल का/ कठिन है मंज़िल का पाना उतना। देवी
आपकी प्रकाशित पुस्तकें इस प्रकार हैं
१. हिंदी गज़ल संरचना-एक परिचय (सन् १९८४ में मेरे द्वारा इल्मे- अरूज़ – उर्दू छंद-शास्त्र) का सर्व प्रथम हिंदी में रूपांतर,
२. गज़ल-निर्देशिका,
३. गज़ल-विद्या,
४. गज़ल-लेखन कला,
५. व्यहवारिक छंद-शास्त्र (पिंगल और इल्मे- अरूज़ के तुलनात्मक विश्लेषण सहित),
६. नागफनियों ने सजाईं महफिलें (ग़ज़ल-संग्रह),
७. गज़ल और गज़ल की तकनीक।
उनकी आने वाली पुस्तक है “मेरी नज़र में” जिसमें उनके द्वारा लिखी गईँ अनेक प्रस्तावनाएँ, समीक्षाएँ रहेंगी जो उन्होंने अनेक लेखकों, कवियों और ग़ज़लकारों पर लिखीं हैं और वो अनेक पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैँ। यह संग्रह एक अनुभूति बनके सामने आयेगा, जिसे पढ़ने वालों को जानने का एक सुअवसर मिलेगा कि कैसे महरिष जी सरलता और सादगी से अपनी पारखी नज़र अपनी अमूल्य राय के साथ साथ सुझाव भी देते है।
मेरे पहले गज़ल संग्रह चराग़े दिल के विमोचन के अवसर पर ग़ज़ल के विषय में श्री आर.पी.शर्मा ‘महरिष्‘ इस किताब में छपे अपनी प्रस्तावना स्वरूप लेख ‘देवी दिलकश ज़ुबान है तेरी‘ में क्या कहते हैं, अब सुनिये महरिष जी की ज़ुबानीः
“ग़ज़ल उर्दू साहित्य की एक ऐसी विधा है जिसका जादू आजकल सबको सम्मोहित किए हुए है। ग़ज़ल ने करोड़ों दिलों की धड़कनों को स्वर दिया है। इस विधा में सचमुच ऐसा कुछ है जो आज यह अनगिनत होंठों की थरथराहट और लेखनी की चाहत बन गई है। ग़ज़ल कहने के लिये हमें कुशल शिल्पी बनना होता है, ताकि हम शब्दों को तराश कर उन्हें मूर्त रूप दे सकें, उनकी जड़ता में अर्थपूर्ण प्राणों का संचार कर सकें तथा ग़ज़ल के प्रत्येक शेर की दो पंक्तियाँ या मिसरों में अपने भावों, उद्गारों, अनुभूतियों आदि के उमड़ते हुए सैलाब को ‘मुट्ठी में आकाश, कठौती में गंगा, कूजे में दरिया, बूँद में सागर के समान समेट कर भर सकें।”
यहाँ मैं ग़ज़ल के मिज़ाज के बारे में भी कुछ कहना चाहूँगा। ग़ज़ल कोमल भी है और कठोर भी। उसका लहज़ा कभी नर्म तो कभी तीखे तेवर लिये होता है, तो कभी दोनों का मणि कांचन संयोग कुछ और ही लुत्फ़ पैदा कर देता है,
चटपटी है बात लक्षमण – सी मगर/अरथ में रघुवीर- सी गंभीर है
सुनके ‘महरिष‘ यूँ लगा उसका सुख़न/ चाप से अर्जुन के निकला तीर है।
हरियाणा के प्रख़्यात उस्ताद शाइर सत्यप्रकाश शर्मा ‘तफ़्ता ज़ारी‘ (कुरुक्षेत्र) ने तो ग़ज़ल से संबोधित एक अनूठी बात कही है, वे फर्माते है:
सुलूक करती है माँ जैसा मुब्तदी से ग़ज़ल/मगर एक अग्नि-परीक्षा है मुन्तही के लिये।
कहने का मतलब यह कि नवोदतों के लिये तो ग़ज़ल माँ जैसा व्यवहार करती है परन्तु इस विधा में पारंगत व्यक्तियों को भी कभी अग्नि-परीक्षा से गुज़रना पड़ता है।
“बात बनाये भी नहीं बनती” जैसी कठिन परिस्थिति इनके सामने उत्पन्न हो जाती है। इस शेर पर मेरी तज़्मीम भी है, -
निसार करती है उस पर ये ममता के कंवल
उसी के फिक्र में रहती है हर घड़ी, हर पल
मसाइल उसके बड़े प्यार से करती है ये हल
सुलूक करती है माँ जैसा मुब्तदी से ग़ज़ल
मगर इक अग्नि-परीक्षा है मुन्तही के लिये।
प्रख्यात शाइर श्री क्रष्ण बिहारी ‘नूर‘ के एक मशहूर शेर :
“चाहे सोने के फ़्रेम में जड़ दो
आईना झूठ बोलता ही नहीं।“
इस शेर पर मैंने अपनी ओर से तीन मिसरे लगाये हैं:
“तुम जो चाहो तो ये भी कर देखो
हर तरह इसका इम्तिहां ले लो
लाख लालच दो, लाख फुसुलाओ
चाहे सोने के फ़्रेम में जड़ दो
आईना झूठ बोलता ही नहीं।”
यह तज़्मीन श्री तर्ज़ साहिब को सादर समर्पित है।
अब मैं आपको एक पद्यात्मक रचना सुनाना चाहूँगा, मौके की चीज़ है, समाअत फ़रमाएँ:
आशीर्वाद श्रीमती देवी नागरानी जी को ‘चराग़े-दिल‘ के विमोचन के अवसर पर
“किस कदर रौशन है महफ़िल आज की अच्छा लगा
इस ‘चराग़े-दिल‘ ने की है रौशनी अच्छा लगा।
आप सब प्रबुद्ध जन को है मेरा सादर नमन
आप से इस बज़्म की गरिमा बढ़ी अच्छा लगा।
कष्ट आने का किया मिल जुल के बैठे बज़्म में
भावना देखी जो ये सहयोग की अच्छा लगा।
इस विमोचन के लिये ‘देवी‘ बधाई आपको
आरज़ू ये आपकी पूरी हुई अच्छा लगा।
इक ख़ज़ना मिल गया जज़्बातो-एहसासात का
हम को ये सौग़ात गज़लों की मिली अच्छा लगा।
आपको कहना था जो ‘देवी‘ कहा दिल खोलकर
बात जो कुछ भी कही दिल से कही अच्छा लगा।
भा गया है आपका आसान अंदाज़े-बयां
आपने गज़लों को दी है सादगी अच्छा लगा।
हर तरफ बिखरी हुई है आज तो रंगीनियाँ
रंग बरसाती है गज़लें आपकी अच्छा लगा।
ज़ायका है अपना अपना, अपनी अपनी है मिठास
चख के देखी हर गज़ल की चाशनी अच्छा लगा।
यूँ तो ‘महरिष‘ और भी हमने कहीं गज़लें बहुत
ये जो ‘देवी‘ आप की ख़ातिर कही अच्छा लगा।“
क्रमशः –