ठहराव जिंदगी में दुबारा नहीं मिला

गज़लः २९
ठहराव जिंदगी में दुबारा नहीं मिला
जिसकी तलाश थी वो किनारा नहीं मिला.

वर्ना उतारते न समंदर में कश्तियां
तूफान आया जब भी इशारा नहीं मिला.

हम ने तो खुद को आप संभाला है आज तक
अच्छा हुआ किसी का सहारा नहीं मिला.

बदनामियां घरों में दबे पांव आ ईं
शोहरत को घर कभी भी, हमारा नहीं मिला.

खुशबू, हवा और धूप की परछाइयां मिलीं
रौशन करे जो शाम, सितारा नहीं मिला.

खामोशियां भी दर्द से ‘देवी’ पुकारतीं
हम-सा कोई नसीब का मारा नहीं मिला.

चराग़े-दिल/ ५५

5 Comments

  1. mehhekk said,

    December 25, 2007 at 5:10 am

    wah खुशबू, हवा और धूप की परछाइयां मिलीं
    रौशन करे जो शाम, सितारा नहीं मिला.
    behad sahi mayne hai es sher ke..nazm ke liye tariff karne ke liye lafz hi nahi koi.lajawab.

  2. paramjitbali said,

    December 25, 2007 at 7:29 am

    बहुत बढिया!!!

  3. neeraj said,

    December 25, 2007 at 1:10 pm

    दीदी
    हम ने तो खुद को आप संभाला है आज तक
    अच्छा हुआ किसी का सहारा नहीं मिला.

    बदनामियां घरों में दबे पांव आ ईं
    शोहरत को घर कभी भी, हमारा नहीं मिला

    कितनी सादा जबान में आप इतनी गहरी बात कर जाती हैं की बरबस मुह से वाह वा निकलती है…लफ्जों और एहसास का इतना खूबसूरती से इस्तेमाल करती हैं की देखते ही बनता है. बहुत …बहुत….बहुत….बहुत…बढ़िया रचना.
    नीरज

  4. December 25, 2007 at 1:42 pm

    bahut badiya ghazal…. najar hat hi nhi rhi….
    sach main bahut badiya ghazal ….. dil main utar gya har sher
    Sadar
    hemjyotsana

  5. December 26, 2007 at 4:03 pm

    सभी सद्सयों को मेरी नये सााल की शुभकामनाएं
    ठहराव की तलाश में भटक भी कहाँ रहे हैजीवन की सइरा में. कितने निस्हाय है हम, आप और जाने कौन कौन.चंद बातें अच्छी लगी७सके लिये धन्यवाद
    देवी


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