ठहराव जिंदगी में दुबारा नहीं मिला

गज़लः २९
ठहराव जिंदगी में दुबारा नहीं मिला
जिसकी तलाश थी वो किनारा नहीं मिला.

वर्ना उतारते न समंदर में कश्तियां
तूफान आया जब भी इशारा नहीं मिला.

हम ने तो खुद को आप संभाला है आज तक
अच्छा हुआ किसी का सहारा नहीं मिला.

बदनामियां घरों में दबे पांव आ ईं
शोहरत को घर कभी भी, हमारा नहीं मिला.

खुशबू, हवा और धूप की परछाइयां मिलीं
रौशन करे जो शाम, सितारा नहीं मिला.

खामोशियां भी दर्द से ‘देवी’ पुकारतीं
हम-सा कोई नसीब का मारा नहीं मिला.

चराग़े-दिल/ ५५

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