चोट ताज़ा कभी जो खाते हैं

ग़ज़लः २७
चोट ताज़ा कभी जो खाते हैं
ज़ख्मे-‍‌दिल और मुस्कराते हैं.

मयकशी से ग़रज़ नहीं हमको
तेरी आँखों में डूब जाते हैं.

जिनको वीरानियों ही रास आईं
कब नई बस्तियां बसाते हैं.

शाम होते ही तेरी यादों के
दीप आंखों में झिलमिलाते हैं.

कूछ तो गुस्ताख़ियों को मुहलत दो
अपनी पलकों को हम झुकाते हैं.

तुम तो तूफाँ से बच गई देवी
लोग साहिल पे डूब जाते हैं.

चराग़े-दिल/ ५३

 

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