शिक्षयातन के प्रारंग में बाल दिवस

 

शिक्षायातन के प्रारंग में बाल दिवस

संस्कृति व सभ्यता का महा विश्वविद्यालय शिक्षायतन

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तारीख २, दिसम्बर २००७ शिक्षायतन की ओर से आयोजित किया गया 19 वां सांस्कृतिक संगीतमय बालदिवस Hindu Temple Society of North America, Flushing, NY में सम्पन हुआ। पूर्णिमा देसाई शिक्षयातन की निर्माता, निर्देशिका अध्यक्ष एवं संचालिका है, जिन्होंने बड़ी समर्थता के साथ संचालन की बागडोर संभाली. ज्ञानदीप को उज्वलित करने की विधा को सरस्वती वंदना की सुंदर स्तुति से किया जिसमें सृष्टि के आधार ब्रम्हा, विष्णु, महेश बालस्वरूप उपस्थित रहे. मुख्य मेहमान World Business Forum ke Chairman
श्री किरन मेहता व सभी श्रोताओं एवं कविगन का स्वागत स्वरमय सँगीत से किया गया. सिलसिले को आगे बढाते हुए अपने गुरुकुल में शिक्षा ले रहे सभी बचों को पेश किया एक रंगमय मंच पर जो गीत ग़ज़ल ओर शास्त्रीय संगीत से शुरू होकर वादन पर समाप्त हुआ. एक खास बात ध्यान देने योग्य यह थी जहाँ बालक बालिकाओं ने ” दीदी तेरा देवर दीवाना” कि धुन पर एक अद्भुत रचना गाई
” अ-आ-इ-ई-उ-ऊ-ऋ, ये है पहले स्वर हिंदी के
ए-ऐ-ओ-औ-और-अं-अः, ये है बाकी स्वर हिंदी के”
अंग्रेज़ी वातावरण में हिन्दी भाषा सीखने का ये एक अनुपम निराला ढंग है जिसमें स्वर और व्यंजन सुर ताल पर सीखने की प्रथा- जो पूर्णिमा जी ने शुरू की है, काबिले तारीफ है जिसके लिये वो बधाई की पात्र हैं. शिक्षा प्रदान का यह सिलसिला पिछले १८ साल से लगातार चल रहा है ओर यह तब तक चलता रहेगा जब तक शिक्षायतन के अपने प्रारंग में ये फूल नहीं महकते. यही पूर्णिमा जी की आशा है और उनका सपना भी.
शिक्षायतन के प्रारंग में आना एक अनुभूति रही और साथ में एक अनुभव भी. आज पहली बार इस समारोह में भाग लेते हुए यूँ लगा की जो बीज पूर्णिमा जी ने कल बोये थे वे इतने फले फूले है बस यूं कहिये एक महकता हुआ गुलिस्ताँ बन गए हैं. इस संगठन का विकास अनेक त्रिवेणियों के रूप में हो रहा है – हिन्दी भाषा का विकास, संगीत, नाट्य, वायलिन वादन,शास्त्रीय संगीत, और तबले पर युगलबंदी. यूँ लगता है अमरीका में यह एक अद्भुत महा विश्वविद्यालय है जहाँ पर वतन का दिल धड़क रहा है. एक मंच पर इस प्रतिभाशाली नव युग की पीढ़ी को विकसित होता देखकर यह महसूस हुआ कि हर युग में रविंद्रनाथ टैगोर का एक शंतिकेतन स्थापित हो रहा है. विश्वास सा बंधता चला जा रहा है की देश हमसे दूर नहीं है. जहाँ जहाँ इस तरह की संस्कृति पनपती रहेगी वहीं वहीं हिंदुस्तान की खुशबू फैलती रहेगी. पूर्णिमा देसाई व उनके कार्य कर्ता टीम का कार्य उलेखनीय है, जिनमें जी जान से से लगे हुए है श्री कमलाप्रसाद जी और पूर्णिमा जी की बेटी कविता देसाई। वे जिस दिशा में काम कर रहे हैं वह आम नहीं, यकीनन एक खास दिशा है जो आने वाली पीढ़ी के लिए एक नया रास्ता तय कर रही है. आज के सुकुमार मन विकसित होकर अपने देश की सौंधी मिटटी की महक यहाँ प्रवासी देश में फैलाने में कामयाब हो रहे हैं, और उसीकी गूँज भारत के हर कोने में भी पहुँच रही है. ये राष्ट्र प्रेम में भीने से लम्हें पुरानी यादें ताज़ा करते रहे जिसके सन्दर्भ में पूर्णिमा जी का कहना है ” जितना हर्ष भारत की आज़ादी के वक्त हुआ, अब प्रवासी देश में वहीं राष्ट्र भावना के बीज डालने वाले ये हमारे भविष्य के नेता है, जो हमारी पूँजी भी है और आने वाले कल की धरोहर भी.” अगर ऐसी सजीव आशाएं मन में संचार कर रही हों तो कौन कह सकता है कि हमारी मातृभाषा व राष्ट्रभाषा हिन्दी का भविष्य उज्वल नहीं है? उसीका भार हमें नव पीढ़ी के कांधों पर रखना होगा, चाहे वो साहित्य का हो या संस्कृति की दिशा में हो. कला की दृष्टि से निपुणता दिखाने में सबकी माहिरता सुनने व देखने योग्य थी पर खास उलेख मैं यहाँ क्रिस्टीन का करना चाहूंगी जो विदेशी होते हुए भी बढ़ी निपुणता एवं सुगमता के साथ राग बागेश्वरी को अलाप,व छोटी तान के साथ प्रस्तुत कर पायी, और जसबीर जिसने बड़ी ही सुंदर सलीकेदार ग़ज़ल सुनाई. बाकी सभी जो सारथी बन कर इस शिक्षायतन रथ को आगे बढ़ा रहे हैं वे हैं: राहुल, कविता, सुदीप्ता, शिवांगी, कुनल, यश, अन्विका, केवल, आकाश विरेन, युदित, कविता महावीर और सुदीप. वायलिन पर मुग्ध करने वाली धुन में श्री कमल जी ने तो कमाल ही कर दिया जिनके साथ तबले पर सांगत कि साजिब मोदक. पूर्णिमा जी ने भक्ति भाव से बड़े मन मोहक भजन गाये, तबले पर उनकी संगत कर रहे थे कुनाल नसीर और साजिब मोदक.
कार्यक्रम के अन्तिम चरण में आयोजित कवि गोष्टी में भाग लेने वाले थे श्री अशोक व्यास, देवी नागरानी, सरिता मेहता, बिन्देश्वरी अगरवाल, राम बाबू गौतन, नीना वही और आनंद आहूजा. मुख्य मेहमान श्री किरण मेहता के हाथों श्री पूर्णिमा देसाई की हाजरी में कवियों को “काव्य मणि” पुरुस्कार से सन्मानित किया गया। सुजलाम सुफलाम् माताराम वंदे मातरम !!!
प्रस्तुतकर्ता
नागरानी

“अभिमत”

 

“अभिमत”

देवी नागरानी की गज़लें उनकी दिल की तलहटी से निकले कोमल हृदयोदगार हैं. यह कोमलता उनकी ग़ज़लों के शिल्प में तों प्रतिबिम्बित हैं लेकिन कथ्य में वे बहुत गहराई लिए हुए हैं. उनका आलोच्य vijaya.jpgग़ज़ल संग्रह ‘चरागे-दिल’ इस सत्य की बहुत शिद्दत से तस्कीद करता है. इस संग्रह की तमाम ग़ज़लों से गुज़रते हुए रदीफ़-काफिये की आश्चर्यजनक सादगी एवं उस सादगी में चम्कृत कर देने वाली छुपी हुई गहराई के दर्शन संग्रह के बहुत से स्थानों पर देखने को मिलती हैं.
हाल के वर्षों की प्रवासी हिन्दी ग़ज़ल यात्रा में जिन शायरों ने अपना मुकाम ख़ुद-ब-ख़ुद तैयार किया है, उनमें न्यू जर्सी में रह रही अनिवासी भारतीय गज़लकारा देवी नागरानी का नाम भी अदब से शुमार किया जाता है. उनके संग्रह ‘चरागे-दिल’ का समकालीन हिन्दी ग़ज़ल परिदृश्य में निश्चित तौर पर इस्तकबाल किया जाना लाज़मी है. उनकी गजलों से गुज़रते हुए यह सवाल हावी रहता है कि भले ग़ज़ल उनके दिल की तलहटी से उपजने पर भी महज़ भावुकता की दरिया की तरह न बहकर, एक सार्थक सँवाद (गुफ्तगू) सी करती है. ज़माने के दर्द के साथ हमसाया हो जाती हैं उनकी गज़लें और यही वो बात है जो देवी नागरानी की गज़ली शक्सियत को सर्वथा भिन कलेवर बख़ँशती है. ग़ज़ल के शास्त्रीय विधि विधानों से पूर्णत: अनुप्राणित उनकी गजलें ज़माने के दर्द को बखूबी ‘गागर में सागर सी’ भावामिव्यक्त करने की विपुल क्षमता लिए हुए हैं. उनकी ग़ज़लों में अशयार का प्रभावी संयोजन, शेर का अच्छा तासीर एवं समग्र तौर पर स्राजनात्मक प्रभावोत्त्पाद्कता झिलमिलाती है जो एक मुकमिल शायरी के बेशकीमती नगीने हैं. उनकी ग़ज़ल की विषयवस्तु काफी विस्तृत है, शालीन कटाक्ष एवं गहरी पीड़ा के ताने बाने में वे पूरी कायनात के दुःख-दर्द को पूरे इत्मिनान से आवाज़ देती है. उनके शेरों में आश्चर्यजनक रूप से स्वाभाविकता है जो उनके बहुत से शेरों को ‘आमद’ के ‘शेर’ बनाती है.
शमशेर के शब्दों में-
वही उम्र का एक पल कोई लाये
तड़पती हुई-सी ग़ज़ल कोई लाये.
देवी नागरानी की गज़ल्लियात से रूबरू होते हुए यह बात बार-बार उभरती है कि उनकी ग़ज़ल का सुभाव (मिजाज़) भाव-मंगिमा तथा शब्द-सौष्ह्तव सभी एक नई ज़मीन की तलाश करते हैं, एक मौलिक उर्वर ज़मीन जिसमें नई-नई दिशाओं रूपी कोंपलें उभरती दिखती हैं. उनकी गज़लें नई उर्जा और रचनात्मकता के साथ अपने सरोकारों को अभिव्यक्त कर रही है.
मैं उनके ग़ज़ल संग्रह की अप्पार लोकप्रियता की कामना करता हूँ. अंत में बशीर बद्र के शब्दों में:
“चमकती है कहीं सदियों में आंसुओं की ज़मीन
ग़ज़ल के शेर यहाँ रोज़-रोज़ होते हैं.”
पुन: असीम मंगलकामनाओं के साथ
विजय सिंह नहाता
B_92, scheme 10-B
Gopalpura Byepass
Jaipur 302018

 

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