ग़म का पैग़ाम बादे-सबा दे गई

गज़लः २६
हमने चाहा था क्या और क्या दे गई
ग़म का पैग़ाम बादे-सबा दे गई.

ुस्कराहट को होटों से दाबे रक्खा
मेरी नीची नज़र ही दग़ा दे गई.

ौत से कम नहीं तेरी चाहत, के जो
जीते रहने की हमको सज़ा दे गई.

आके इक मौज हल्की सी साहिल पे आज
आना वाला है तूफाँ पता दे गई.

म झुलसते रहे हिज्र की आग में
जिंदगी मुझको देवी सज़ा दे गई.

राग़े-दिल/ ५२

2 Comments

  1. December 10, 2007 at 8:47 am

    Aaderniye Devi jee
    ुस्कराहट को होटों से दाबे रक्खा
    मेरी नीची नज़र ही दग़ा दे गई.— bahut badiya sher

    subdar sher se saji sundar ghazal

    saadar
    hemjyotsana

  2. mehhekk said,

    December 11, 2007 at 4:43 am

    behad khubsurat nazm hai


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