ग़म का पैग़ाम बादे-सबा दे गई

गज़लः २६
हमने चाहा था क्या और क्या दे गई
ग़म का पैग़ाम बादे-सबा दे गई.

ुस्कराहट को होटों से दाबे रक्खा
मेरी नीची नज़र ही दग़ा दे गई.

ौत से कम नहीं तेरी चाहत, के जो
जीते रहने की हमको सज़ा दे गई.

आके इक मौज हल्की सी साहिल पे आज
आना वाला है तूफाँ पता दे गई.

म झुलसते रहे हिज्र की आग में
जिंदगी मुझको देवी सज़ा दे गई.

राग़े-दिल/ ५२

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