छवि ३. सँगम

 

 

 

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“मौत की गोद
में ज़िंदगी आबाद
अब हो रही”

खोखला जिस्म
खोखली साँसें
पर, फिर भी रुक रुककर
चलने की चाह ज़िंदा है
शायद इसलिए ही
कच्ची उम्र की डोर
पीढी़ ढो रही है.
कदम लड़खडा़कर
सँभलने लगे है
ढलती उम्र है पर
सूर्यास्त शायद दूर.
सीने से लिपटी
हर खुशी दम तोड़ती है
हर आस रेत सी
क्यों हाथ से फिसलती है?
जीवन की गरमी
मौत की ठंडक
दोनों समुद्र के किनारे
पर मिलती हैं जब गले
हैरान होकर ज़िंदगी
पूछती है मौत से
“पहले क्यों ना तू मिला?
क्यूँ मिली थी ज़िंदगी?”
“ढळ गई थी उम्र पर
ढला न था सूरज तेरा ए जिँदगी!
चलो छोडो गिले शिकवे
जीवन है यतार्थ
जब तू मिली है मुझसे
और
मैं मिला हूँ तुझसे.”

**
छवि ३. रौशन मीनार

आस उम्मीद जिंदा मुझमें
और रहेगी तब तक
जब तक
चलती रहेगी, निडर हो
मेरी साँसें
सँग सँग मेरे
उस क्षितिज की ओर
जहाँ कल
उम्मीद का इक नया सूरज
फिर से उदय हो
मेरे वजूद का
रौशन मीनार कहलाएगा.
॰॰
छवि ३. ‍‍‍‍ ‍अः सच की सरहद

ज़िंदगी की शान है
सूरज अस्त होने तक
इन्सान की आन है
ज़िंदगी ढलने तक.
सच यह भी है
सच वह भी है
हर दौर से गुजर कर ज़िंदगी
हर पडा़व पर
ले साँसें, उनको सहलाती
सोच रही है
“जाना था सफ़र पर मुझे
क्यों मैं होश में बेहोश रही
क्यों ना भरम की हद को पार कर
सच की सरहद छू सकी
हाँ छू सकी!!!

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