हम दिलों में निवास करते हैं
November 14, 2007 at 10:51 pm (ग़ज़ल-देवी नागरानी, चराग़े-दिल संग्रह)
ग़ज़लः २४
दिल को हम कब उदास करते हैं
आज भी उनकी आस करते हैं.
हमको ढूँढो नही मकानों में
हम दिलों में निवास करते हैं.
पहले ख़ुद ही उदास रहते थे
अब वो सबको उदास करते हैं.
चढ़के काँधों पे हो गए ऊँचे
इस तरह भी विकास करते हैं.
इक्तिफा़कन निगाह उट्ठी थी
लोग क्या क्या क़यास करते हैं.
राग़े-दिल/ ५०




