छवि १. कोई तो आएगा

छवि १. कोई तो आएगा

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सूनी सी पगडंडी पर,
इक आस
अभी भी साँस ले रही है
आँखो में निर्जीव सी आशा
बुझ कर फिर भी जल रही है
कोई तो आ॓एगा इस राह पर?
देखे हैं चिह्न मैंने जीवन के !
चिह्न कहो पदचिह्न कहो, या
साँसों की धीमी सी आहट
इंतजार में हवाओं के
सरसराहट सुन रही है
हाँ ! सुन रही है जिंदगी
“कोई तो आएगा”
ये सोच रही है.

***

चित्रावली 

छवि की आक्रतियाँ कलाकार की तूलिका से उतरकर लेखनी की नोक से स्याही में ढलकर एक अलग रूप धारण करती हैं, और सजीव होकर अपने भाव प्रकट करने की क्षमता रखती हैं. ऐसा एक सिसिला चला है हमारे चित्रकार कलाकार श्री विजेंद्र “विज” की इन अनुभूतियों का जिन में जिनके साथ उनमें जान फूंक कर पूरा इन्साफ किया है. अब कलम की नोक ने मेरे मन की भाननाओं को उजगार करते हुए कितना इन्साफ किया है यह आप पढ़े, परखें और…..


देवी नागरानी

ttp://photos.groups.yahoo.com/group/anubhuti-hindi/lst

 

तुझको अपना खुदा बनाया है

गजलः २३
तेरे क़दमों में मेरा सजदा है
तुझको अपना खुदा बनाया है.

जिसकीी ख़ातिर ख़ता हुई हमसे
वो ही इल्ज़ाम देने आया है.

ख़ुद की नज़रों से गिर गए हैं जो
हमने बढ़कर उन्हें उठाया है.

हौसला है बुलंद कुछ इतना
हमने तूफां में घर बनाया है.

हमको पूरा यकीन था जिसपर
तोड़कर उसने ही रुलाया है.

उसने धोका दिया हमें देवी
राज़े-दिल जिसको भी बताया है.
चराग़े-दिल/ ४९

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