
हेम ज्योत्स्ना पाराशर ‘दीप‘
देवी नागरानी जी का ग़ज़ल संग्रह “चराग़े-दिल” जब हाथ आया तो पढ़ने का सिलसिला रुकने का नाम ही न ले सका.समीक्षा करने की योग्यता तो नहीं है परन्तु जो इस गज़ल संग्रह को पढ़ कर लगा वही बता रही हूँ । एक के बाद एक बेहतरीन गज़ल पढ ने को मिली । हर गज़ल को पढ़ कर एक अलग ही ![]()
आनन्द प्राप्त हुआ।
देवी जी कहती हैं -
आस्माँ पर है चांद तारे सब ,
इस ज़मीं पर फक़त पडी हूँ मैं।
पर ये तो धरती की खुशनसीबी है कि देवी जी जैसे शाइर है यहाँ । देवी जी तो एक नायाब नगीना है जो देवी जी का ये शेर खुद बंया करता है-
मैं तो नायाब इक नगीना हूँ,
अपने ही सांस में जडी हूँ मैं।
जिन्दगी के हर पहलू को एक अलग ही अन्दाज़ में बँया करने का हुनर है देवी जी में-
कभी साहिलों से भी उठते है तूफाँ ,
कभी मौजे-तुफाँ में पाया किनारा।
तूफाँ में किनारा पाने वाली देवी जी कहती है -
विश्वास कर सको तो करो वरना छोड दो,
इस दम समय बुरा है मिला , मैं बुरा नहीं।
मेरी फितरत अजीब है ‘ देवी ‘
कोई तडपे तो मैं तडपती हूँ।
औरों के दर्द में तडपने वाली देवी जी के इस गज़ल संग्रह से बहुत कुछ मिलता है। गज़ले तो अच्छी हैं ही साथ ही उनमें छिपे संदेश ही अच्छे हैं जैसे -
मुश्किलें जब भी सामने आई,
जिन्दगी हौसला बढ़ाती है।
चिराग़े-दिल की गज़लें बार बार पढ़ने का दिल करता है -
फिक्र क्या बहर क्या, क्या गजल गीत क्या,
मैं तो शब्दों के मोती सजाती रही।
सच ही तो है चिराग़े-दिल सजे हुए शब्दों के मोती है।
सारा आकाश नाप लेता है ,
कितनी उँची उडान है तेरी ।
उनकी गज़लें पढ़ने के बाद अब तो उनसे रु-ब-रू सुनने की तमन्ना है।
फूल झड़ते है उनकी बातों से ,
लफ्ज़ जितने है सब सुनहरे है।
उम्मीद है देवी जी जल्द ही अपनी आवाज़ में अपनी कुछ गज़लें हम सभी तक पहुचायेंगी।
तुझको पढ़ते रहे , तभी जाना,
‘देवी’ दिलकश जुबान है तेरी।
सादर
हेम ज्योत्स्ना पाराशर ‘दीप’
http://hemjyotsana.wordpress.com