“चराग़े- दिल”- इला प्रसाद की दृष्टि में
August 30, 2007 at 10:00 pm (समीक्षा)
“चरागे- दिल”
चरागे दिल देवी नांगरानी का हिन्दी में पहला ही गजल संग्रह है जिसके माध्यम से उन्होंने बतला दिया है कि उनकी लेखनी का चराग बरसों बरस जलता रहने वाला है. उनकी सोच का फ़लक विस्तृत है और उनकी गजलें जीवन के तमाम पहलुओं को छूती हैं. उन्होंने औरों के काँधों पर चढ़कर विकास नहीं किया. वे अपने पैरों से चली हैं , जिन्दगी की धूप - बारिश झेली है और आग में तप कर निकली हैं. उन्हीं के शब्दों में
कोई नहीं था ‘देवी’ गर्दिश में मेरे साथ
बस मैं, मिरा मुकद्दर और आसमान था.
जब जीवन-डगर कठिन हो और मन सम्वेदनशील, तो अभिव्यक्ति का ज़रिया वह खुद ढूढ़ लेता है. इस संग्रह में ढेरों ऐसी गजले हैं जो पाठकों को अपनी अनुभूतियों के करीब लगेंगी. आज चाहे देवी जी कहती हों कि
“शोहरत को घर कभी भी हमारा नहीं मिला”
मैं समझती हूँ कि उनकी गजलों का यह संग्रह पाठकों की पसन्द बन कर रहेगा।
देवी जी को इस सुन्दर कृति के लिए बधाई !
इला प्रसाद
ila_prasad1@yahoo.com





समीर लाल said,
August 31, 2007 at 1:16 am
हमारी भी बधाई.
Devi Nangrani said,
August 31, 2007 at 2:44 am
समीर
अपनी बधाई अपने शब्दों में लिख दो.
पर ये भी मेरे आँचल को कबूल है.
सस्नेह
देवी
प्रत्यक्षा said,
August 31, 2007 at 4:37 am
बधाई !