चराग़े-दिलः श्री देवेंद्र नारायण दास की दृष्टि में
August 22, 2007 at 3:39 pm (समीक्षा)
देवी जी,
आपका गज़ल संग्रह चराग़े दिल मिला
उसे इश्क क्या है पता नहीं
कभी शम्अ पर जो जला नहीं.
वह परवाना नहीं जो शम्अ पर मिटता नहीं. मन की पीड़ा को आँधियाँ क्या बुझायेंगी! क्या कहूं, किस किस शेर के लिये कहूँ, आपके हर अश्यार में पीड़ा ही पीड़ा है. पीड़ा ही सहज है जो मानव मन में करुणा पैदा करती है.
मेरे दिल का साज़ बजा नही
“न बुझा सकेंगी ये आंधियां
ये चराग़े दिल है दिया नहीं”
जो मिटा दे ‘देवी’ उदासियां
कभी साज़े-दिल यूं बजा नहीं.
मन की उदासियां मिट नहीं पाती, जीवन में पीड़ा ही पीड़ा महादेवी वर्मा की तरह. आपकी पीड़ा ही गज़ल की शिल्पी है. ग़म पीने वाले ही जीवन के सुख का आनंद पाते हैं. पीड़ा और सजविता संप्रेषणयिता के कारण आपके गज़ल के हर शेर दिल को छू जाते हैं. मेरे गुरुदेव आर. पी. महरिष जी ने आपके संग्रह की भूमिका लिखी है. आप बहुत भाग्यवान है.
आपके हाइकू भी मिले पढ़ने को हाइकू दर्पन में.
घर घर में
वेदव्यास रचता
महाभारत.
लग रहा है
रिश्तों का मैदान
रणभूमि सा.
आस पास की बातों को शब्द बंध कर लेना आपकी पैनी द्रष्टी है. इसलिये मैं आपको कुशल सशक्त शब्द शिल्पी कहने में संकोच नही करता. एक बहुत अच्छे संग्रह के लिये आपको बहुत बधाई.
देवेंद्र नारायण दास
संपादकः अंकुर साहित्य मंच
Sadhna Kutir, Basna,
Chattis garh 493554.




paramjitbali said,
August 22, 2007 at 7:27 pm
अधिक विस्तृत जानकारी होती तो बेहतर समझ आती ।