गज़ल: 2
दीवारो-दर थे, छत थी वो अच्छा मकान था
दो चार तीलियों पे ही कितना गुमान था.
जब तक कि दिल में तेरी यादें जवांन थीं
छोटे से एक घर में ही सारा जहान था.
शब्दों के तीर छोडे गये मुझ पे इस तरह
हर ज़ख़्म का हमारे दिल पर निशान था.
तन्हा नहीं है तू ही यहां और हैं बहुत
तेरे न मेरे सर पे कोई सायबान था.
कोई नहीं था ‘देवी’ गर्दिश में मेरे साथ
बस मैं, मिरा मुक़द्दर और आसमान था.
चराग़े-दिल/28




बसंत आर्य said,
August 2, 2007 at 5:41 am
देवीजी, आपका चरागे-दिल जलता रहे और रोशनी होती रहे यही तमन्ना है. वरना तो दुनिया में हर तरह के लोग हैं. आपकी गजल पढ़ कर एक शेर दिमाग में आ रहा है.
देखा तो सब मेरे कद से भी छोटे निकले जिनके आसमान होने का मुझे गुमान था.
Devi Nangrani said,
August 8, 2007 at 4:56 pm
बसंत जी
आपकी शुभकामनाएं मेरी राह रौशन करती रहे, यही मेरे लिये यही भावना बहुत है.
ऊंची ऊंची इमारतें देखी
बौना कद आदमी का क्यों लगता?
मंगल कामनाओं के साथ
देवी नागरानी
महावीर said,
August 10, 2007 at 9:05 pm
शब्दों के तीर छोडे गये मुझ पे इस तरह
हर ज़ख़्म का हमारे दिल पर निशान था.
ख़यालों की गहराई को अल्फ़ाज़ में ढालने का कमाल है। बहुत अच्छी
लगी है ये ग़ज़ल!
महावीर शर्मा
hemjyotsana parashar said,
August 11, 2007 at 7:02 pm
पहला शेर बचपन के उस तीली से बनी झोपड़ी को याद दिला गया । और दुसरे शेर ने यादो के कई दबे तुफान जगा दिये। तीसरे ने जख्म हरे किये , चौथे ने तन्हा किया तो पाचँवे ने मुक़द्दर और आसमान का साथ याद कराया।
इतना सब कुछ था इस गजल में और बस 84 शब्द।
सच्च में……
वो अच्छा मकान था…………
Devi Nangrani said,
August 13, 2007 at 6:36 pm
महावीर जी
आपकी पारखी नज़र की दाद दूंगी जो गहराइयों से मोतियों को चुन कर सतह पर लाने में सदा कामयाब रहती है, ओर मुझे प्रोहसाहित करने में भी.
सादर देवी
Devi Nangrani said,
August 13, 2007 at 6:38 pm
पहला शेर बचपन के उस तीली से बनी झोपड़ी को याद दिला गया । और दुसरे शेर ने यादो के कई दबे तुफान जगा दिये। तीसरे ने जख्म हरे किये , चौथे ने तन्हा किया तो पाचँवे ने मुक़द्दर और आसमान का साथ याद कराया।
इतना सब कुछ था इस गजल में और बस 84 शब्द।
सच्च में……
वो अच्छा मकान था…………
हेम ज्योत्स्ना जी
दिवारो दर से क्या कभी हम घर बना सके?????
सस्नेह देवी